भोपाल। लोकसभा चुनाव को लेकर मध्य प्रदेश कांग्रेस ने लंबे समय तक खामोशी ओढ़े रखी, जबकि भाजपा ने अपने सारे घोड़े पहले ही खोल दिए। चुनावी जंग में उतरने के लिए योद्धा भी कमर कसकर तैयार हैं। चुनावी मुद्दे भी लगभग स्पष्ट हैं और जमावट का असर भी दिखने लगा है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की बेचैनी साफ झलक रही है।
शिवराज जहां सबसे ज्यादा वोटों से जीतने के लिए जी-तोड़ मेहनत में जुट गए हैं, तो पिछला अनुभव सिंधिया को बेचैन कर रहा है। गुना-शिवपुरी सीट से बतौर कांग्रेस प्रत्याशी वह पराजित हुए थे। ऐसे में चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही उनके माथे की लकीरें पढ़ी जा सकती हैं। वह हार का कलंक मिटाने के लिए टेंशन में हैं। दोनों ही प्रदेश की राजनीति में खुद को टाइगर कहते हैं। अब देखना है कि दोनों टाइगर की बेचैनी क्या रंग लाती है।
इस जंगल में हम दो शेर
शिवराज सिंह चौहान विदिशा लोकसभा सीट से लगभग 20 वर्ष बाद प्रत्याशी हैं, तो सिंधिया एक बार पराजय झेलने के बाद गुना सीट से ही फिर किस्मत आजमा रहे हैं। इनकी बेचैनी देखते हुए दिलीप कुमार और राजकुमार की फिल्म ‘सौदागर’ का गाना ‘इमली का बूटा बेरी का पेड़, इमली खट़ठी मीठे बेर, इस जंगल में हम दो शेर, चल घर जल्दी हो गई देर…’ याद आ जाता है, क्योंकि शिवराज और सिंधिया खुद को टाइगर बताते हुए कहते रहे हैं कि टाइगर अभी जिंदा है। चुनाव में जाने की इनकी छटपटाहट भी घर जाने जैसी ही है।
शिवराज के राजनीतिक जीवन में आए कई उतार-चढ़ाव
प्रदेश की विदिशा लोकसभा सीट से प्रत्याशी शिवराज सिंह चौहान पहचान के मोहताज नहीं हैं। लगभग 17 वर्ष तक चार बार मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाली। ‘मामा’ और भैया के रूप में देश में जाना जाता है।
यूं तो शिवराज का राजनीतिक सफर बचपन से ही आरंभ हो गया था, लेकिन औपचारिक रूप से 1990 में उन्होंने बुदनी विधानसभा क्षेत्र से पहला चुनाव जीता था। 1991 में जब अटल बिहारी वाजपेयी ने विदिशा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर इस्तीफा दिया, तो उपचुनाव जीतकर शिवराज लोकसभा पहुंच गए। इसके बाद चौहान 1996, 1998, 1999 में भी सांसद बने। वर्ष 2005 में पहली बार वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 2018 तक लगातार सीएम रहने के बाद 15 महीने विपक्ष में भी रहे।
हिन्दुस्तान में सबसे बड़ी जीत का लक्ष्य
मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने शिवराज को सीएम नहीं बनाया। पिछले कई महीने से वे बिना किसी पद के रहे। अब पार्टी ने लोकसभा चुनाव में उतारा तो उन्होंने आठ लाख वोट से जीत का लक्ष्य रखा है। पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी जीत छह लाख 89 हजार की रही है। इसके लिए शिवराज ने आक्रामक प्रचार भी आरंभ कर दिया है। अपनी लोकसभा सीट के गंजबासौदा कस्बे में जाने के लिए लोकल ट्रेन का इस्तेमाल किया। जहां रास्ते में उन्होंने हर स्टेशन पर अपनी छाप छोड़ते हुए लोगों से मेल-मुलाकात की। लाड़ली बहनों से चुनाव लड़ने के लिए चंदा भी एकत्र किया। चौहान अपनी विदिशा सीट के आधे से ज्यादा क्षेत्र का भ्रमण कर चुके हैं। उनकी सीट में आठ विधानसभा क्षेत्र आते हैं, जिनमें से एक मात्र में कांग्रेस विधायक है, शेष भाजपा के पास हैं।
सिंधिया पराजय का कलंक मिटाने में जुटे
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब बयान दिया था कि टाइगर अभी जिंदा है, तो कई दिनों तक मध्य प्रदेश में जुबानी जंग चलती रही। कांग्रेस नेता कमल नाथ बोले ये सर्कस या कागज के टाइगर हैं। अब यही टाइगर फिर उसी लोकसभा चुनाव मैदान में हैं, जहां से पिछली बार पराजय का स्वाद चख चुके थे, बस अंतर इतना सा है कि वे पिछली बार कांग्रेस प्रत्याशी थे और इस बार भाजपा से हैं। संसदीय क्षेत्र के इतिहास में लगभग पूरे कालखंड में यहां ग्वालियर राजपरिवार का कब्जा रहा है। दल कोई भी हो, लेकिन यहां से सिंधिया राजघराने का सदस्य या उनका कोई खास समर्थक ही लोकसभा की सीढ़ियां चढ़ सका है। वर्ष 2019 में यहां जो उलटफेर हुआ, वह भी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं, लेकिन इसका भी नाता महल से ही है।
अब तक 14 चुनाव सिंधिया घराने ने जीते
अब तक यहां 16 लोकसभा चुनाव हुए, यहां से राजमाता विजयाराजे सिंधिया पहले कांग्रेस फिर जनसंघ और बाद में भाजपा से चुनाव लड़ीं और सांसद चुनी गईं। बीच में कुछ मौके ऐसे आए, जब उन्होंने सीट छोड़ी तो उनके बेटे माधवराव सिंधिया ने गुना सीट का प्रतिनिधित्व किया। माधवराव ने गुना से चुनाव नहीं लड़ा तो अपने समर्थक महेंद्रसिंह कालूखेड़ा को चुनाव लड़ाकर सांसद बनाया। इधर, माधवराव सिंधिया की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने गुना संसदीय सीट पर कब्जा जमाया और चार बार सांसद चुने गए। पहला अवसर 2019 मेंं आया था कि इस सीट से 14 चुनाव जीतने वाला सिंधिया घराना भाजपा से यहां हार गया था।
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