ईरान की सेना, खासकर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने पिछले कई सालों में बहुत सारे अंडरग्राउंड बेस बनाए हैं. इन्हें मिसाइल सिटीज़ या शहरों मोशकी कहा जाता है. ये बेस पहाड़ों और जमीन के अंदर गहरे खोदे गए हैं. यहां ड्रोन (जैसे शाहेद-136), बैलिस्टिक मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें और अन्य हथियार रखे जाते हैं.
ईरान इन्हें हवाई हमलों से बचाने के लिए बनाता है. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में कई ऐसे बेसों पर हमला हुआ, लेकिन सब पूरी तरह नष्ट नहीं हुए. ईरान कहता है कि ये बेस पूरे देश में फैले हैं और 500 मीटर तक गहरे हैं. लेकिन सटीक संख्या और लोकेशन गुप्त हैं.
ईरान के मुख्य अंडरग्राउंड ड्रोन और मिसाइल बेस कहां-कहां हैं?
ईरान ने कई बार स्टेट टीवी पर वीडियो दिखाकर इन बेसों का खुलासा किया है. कुछ ज्ञात जगहें हैं…
शिराज (फार्स प्रांत): ज़ाग्रोस पहाड़ों में एक बड़ा अंडरग्राउंड UAV (ड्रोन) बेस है. यहां शाहेद जैसे ड्रोन रखे जाते हैं. इजरायल ने 2023 में इसका वीडियो जारी किया था.
खोर्रमाबाद (लोरिस्तान प्रांत): यहां सबसे ज्यादा मिसाइल साइलो हैं. ड्रोन और मिसाइल दोनों स्टोर होते हैं.
केनेश्ट कैन्यन (केरमानशाह प्रांत): IRGC का बड़ा अंडरग्राउंड बेस, उत्तर में स्थित है. यहां ड्रोन और मिसाइल लॉन्च सिस्टम हैं.
कोहजीर और परचिन (तेहरान के पास): मिसाइल प्रोडक्शन और टेस्टिंग के लिए मशहूर है. यहां ड्रोन भी बनते और स्टोर होते हैं. परचिन में हाल में मरम्मत हुई है.
हरमोजगान, सेमनान, केरमानशाह और शिराज क्षेत्र: ईरान ने 2025-26 में चार नए मिसाइल सिटीज बनाए. हर एक 500-700 मीटर लंबा है. यहां ड्रोन, फाइटर जेट और एंटी-B2 सिस्टम भी हैं.
दक्षिणी तट (पर्सियन गल्फ): IRGC नेवी का अंडरग्राउंड नेवल बेस, जहां मिसाइल वाली स्पीडबोट्स और ड्रोन हैं.
ये बेस पूरे ईरान में फैले हैं – पश्चिम (केरमानशाह, लोरिस्तान), दक्षिण (शिराज, हरमोजगान), मध्य (इस्फहान, कोम) और तेहरान के आसपास. ईरान कहता है कि हर प्रांत में ऐसे बेस हैं.
कितने सीक्रेट बेस हैं जहां से ड्रोन अटैक हो रहे हैं?
सटीक संख्या गुप्त है. IRGC कमांडर अमीर अली हाजीज़ादेह ने कहा था कि ईरान ने सभी प्रांतों और शहरों में अंडरग्राउंड बेस बनाए हैं. अनुमान से 20-30 मुख्य मिसाइल सिटीज़ हैं, जिनमें से कई ड्रोन भी रखते हैं. 2025 में IRGC ने तीन बड़े बेस दिखाए. 2026 में चार नए बनाए गए. कुल मिलाकर दर्जनों ऐसे बेस हैं.
ईरान के ड्रोन अटैक (जैसे इजरायल, गल्फ देशों पर) मोबाइल लॉन्चर और अंडरग्राउंड बेस से होते हैं. शाहेद ड्रोन सस्ते और आसानी से लॉन्च हो जाते हैं. लेकिन अमेरिका-इजरायल ने 2025-26 के हमलों में कई बेसों को निशाना बनाया, जैसे शिराज, केरमानशाह, खोर्रमाबाद. फिर भी कई बेस बचे हुए हैं.
अमेरिका और इजरायल इन बेस को पूरी तरह क्यों नहीं ढूंढ या नष्ट कर पा रहे?
ये बेस बहुत गहरे (500 मीटर तक) और पहाड़ों में बने हैं. वजहें…
गहराई और मजबूती: बेस रॉक और कंक्रीट से बने हैं. अमेरिका के पास GBU-57 मैसिव ऑर्डनेंस पेनेट्रेटर (बंकर बस्टर) है, जो B-2 बॉम्बर से गिराया जाता है. लेकिन कुछ बेस इतने गहरे हैं कि पूरी तरह नष्ट नहीं होते. 2025 के हमलों में फोर्डो, नतांज जैसे न्यूक्लियर साइट्स पर भी सिर्फ ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ.
छिपाव और धोखा: ईरान डेकॉय (नकली) बेस बनाता है, मोबाइल लॉन्चर इस्तेमाल करता है. सैटेलाइट से ढूंढना मुश्किल. कई बेस रिमोट इलाकों में हैं.
इंटेलिजेंस की कमी: अमेरिका-इजरायल के पास सैटेलाइट, जासूस और साइबर टूल हैं, लेकिन ईरान ने बेस छिपाने में महारत हासिल की है.
भौगोलिक चुनौती: ईरान का इलाका पहाड़ी है, जो बेस को प्राकृतिक सुरक्षा देता है. ऑपरेशन एपिक फ्यूरी में B-2 बॉम्बर, टोमाहॉक मिसाइल और LUCAS ड्रोन से हमले हुए, लेकिन कई अंडरग्राउंड बेस बच गए. ईरान का दावा है कि उसके बेस सेकंड स्ट्राइक के लिए बने हैं, यानी हमले के बाद भी जवाब दे सकते हैं.
यह स्थिति बहुत गंभीर है. अगर युद्ध जारी रहा तो ईरान के बचे बेस से और ड्रोन-मिसाइल अटैक हो सकते हैं. अमेरिका-इजरायल को इन बेस को पूरी तरह खत्म करने के लिए लंबी जंग और ज्यादा ताकत की जरूरत है.
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