महाराष्ट्र में नासिक के टीसीएस बीपीओ कैंपस में महिलाओं के साथ हुए अभद्र व्यवहार ने कॉरपोरेट की गंदगी को लेकर बहस छेड़ दी है. लेकिन, टीसीएस का ये मामला किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं है, यह उस सिस्टम का छोटा सा हिस्सा है, जहां बहुत कुछ लंबे समय से गलत चल रहा है, लेकिन दिखाई कम देता है. ऑफिस के अंदर होने वाला उत्पीड़न, चाहे वो महिलाओं के खिलाफ हो या पुरुषों के खिलाफ अब कोई दुर्लभ घटना नहीं रही. ये हर एक कंपनी का हिस्सा बन गया है. वहीं, महिलाएं वर्क प्लेस पर असुरक्षा का सबसे बड़ा बोझ झेलती हैं.
कई रिपोर्ट में सामने आया है कि एक ओर अधिक महिलाएं कर्मचारी यौन उत्पीड़न की रिपोर्ट करने के लिए आगे आ रही हैं, लेकिन इन शिकायतों का समाधान उस स्पीड से नहीं हो रहा है. इससे पेंडिंग केस काफी बढ़ रहे हैं. कुछ महीनों पहले ही फोर्ब्स इंडिया ने प्राइमइन्फोबेस के डेटा के आधार पर लिखा था कि वर्कप्लेस पर उत्पीड़न के केस लगातार बढ़ रहे हैं और पेंडिंग केस भी बढ़ रहे हैं.
भारत की सभी लिस्टेड कंपनियों में दर्ज यौन उत्पीड़न की शिकायतों की संख्या साल 2024 में बढ़कर 2,777 हो गई, जो 2023 में 2,026 थीं. इससे पहले 2022 में यह संख्या 1,313 ही थी. यह बढ़ोतरी POSH केस के आधार पर देखी गई है. Posh में लगातार केस दर्ज किए जा रहे हैं और हर साल इनकी संख्या बढ़ रही है.
वहीं पेंडिंग केस तीन साल से तीन गुना हो गए हैं. साल 2022 में जो पेंडिंग केस 174 थे, वो 2024 में बढ़कर 455 हो गए. वहीं, एनएसई 500 कंपनियों में पेंडिंग केस 162 से बढ़कर 428 हो गए.
इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सबसे ज्यादा पेंडिंग केस फाइनेंशियल कंपनियों में हैं, जबकि उसके बाद आईटी आदि का नंबर है. वैसे POSH का डेटा देखें तो टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो आदि कंपनियों में भी ऐसे केस आ रहे हैं.
आईटी में करीब 20 लाख से अधिक महिलाएं कार्यरत हैं और कुल वर्कफोर्स का एक तिहाई से अधिक हिस्सा महिलाओं का है. इसलिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि सभी आईटी कंपनियां यह सुनिश्चित करें कि उनके पास शिकायत निवारण के लिए उचित माध्यम हों और सभी शहरों में शिकायतों के समाधान के लिए सक्रिय आंतरिक समितियां हों.
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