होर्मुज में ईरान की मनमर्जी पर लगेगी लगाम, अगर सऊदी, UAE समेत अरब देश कर लें सिर्फ एक काम

तेल के कुएं, रेत, शेख… ये अरब रीजन की पहचान है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, बहरीन जैसे देशों की इकोनॉमी में बहुत बड़ा हाथ तेल और गैस का ही है. ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ बंद होने से इन देशों के ऑयल और गैस ट्रेड पर बुरा असर पड़ा है. सऊदी अरब और UAE तो पाइपलाइन के जरिए थोड़ा-बहुत तेल बेच भी रहे हैं, लेकिन कतर, कुवैत और बहरीन की हालत पतली है. होर्मुज पर एक तरफ अमेरिका की नाकाबंदी और दूसरी तरफ ईरान की पाबंदी ने खाड़ी देशों की मुसीबत बढ़ा दी है. अब करें तो करें क्या? वो ही, जो ये देश पहले करते थे. बस, अपनी इगो साइड में रखनी होगी.

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ बंद है, तो तेल-गैस का ट्रांसपोर्ट करने के लिए अलग से जुगाड़ करना होगा. इसमें पाइपलाइन बड़ा रोल अदा कर सकती हैं. अमेरिका-इजरायल और ईरान की जंग ने खाड़ी देशों का सुख-चैन छीना, तो उन्होंने फौरी राहत के लिए हाथ-पैर मारने शुरू किए. समुद्री रास्ते के बजाय पाइपलाइन से तेल भेजा गया. लेकिन जितनी तादाद में समुद्र से तेल और गैस जाता है, उतना पाइपलाइन से नहीं भेजा गया. इतनी कैपेसिटी ही नहीं है.

होर्मुज के बंद होने से खाड़ी देशों को तगड़ा सबक मिल गया है. उन्हें अहसास हो गया है कि मिल-जुलकर काम करना होगा. पुरानी बंद बड़ी पाइपलाइन खोलनी होगी. एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना होगा. उसकी कैपेसिटी बढ़ानी होगी. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि इसे लेकर कदम भी उठाए जा रहे हैं.
UAE बेस्ड बिजनेसमैन और देश के ‘व्यापार एवं परोपकार मामलों के विशेष दूत’ बदर जाफर फाइनेंशियल टाइम्स में लिखते हैं,

“मैंने पिछला एक महीना, सैकड़ों बिजनेस लीडर्स और खाड़ी देशों के सीनियर सरकारी अफसरों के साथ इस संकट और इसके बाद के हालातों पर चर्चा करते हुए बिताया है. बातचीत का रुख अब बदल चुका है. तत्काल संकट से निपटने के बजाय, अब उन सिस्टम को फिर से डिजाइन करने पर जोर दिया जा रहा है, जिनकी वजह से (खाड़ी देशों की) यह कमजोरी (Vulnerability) शुरू में पैदा हुई थी.”

बदर जाफर ने आगे लिखा,
“इस संकट से वो हो रहा है, जो सालों के शिखर सम्मेलन भी नहीं कर सके. माने, ऐसे हालात बनाना, जिससे असल में रीजन के देशों के बीच आर्थिक एकीकरण हो सके. जिन देशों के रिश्ते कुछ हफ्ते पहले तक खराब थे, वे अब (साथ आने की) एक कॉमन वजह ढूंढ रहे हैं. ट्रेड को एक ही चोकपॉइंट (होर्मुज) से हटाकर दूसरी तरफ ले जाने से ना सिर्फ इस रीजन की अर्थव्यवस्थाओं, बल्कि ग्लोबल सप्लाई चेन का भी रिस्क कम होगा.”

ईरान ने दशकों से ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बंद करने की धमकी दी, लेकिन कभी किया नहीं. अब कर दिया. 28 फरवरी को अमेरिका-इजरायल के ईरान पर सैन्य हमले के कारण. होर्मुज के इतर दूसरे ऑप्शन पर कमोडिटी मार्केट एनालिटिक्स फर्म केप्लर की सीनियर ऑयल एनालिस्ट विक्टोरिया ग्रेबेनवोगर ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया,

“होर्मुज स्ट्रेट पर निर्भरता को और कम करने के लिए कई पाइपलाइन ऑप्शन को बढ़ाया जा सकता है, फिर से चालू किया जा सकता है, या नया बनाया जा सकता है. हालांकि, इन सभी के लिए काफी मोटा पैसा और इसे पूरा होने में कई साल लगेंगे.”

होर्मुज बंद होने से फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी पर कई ऑयल टैंकर और मालवाहक जहाज फंसे हैं. ऐसे में सऊदी अरब फारस की खाड़ी के पास ऑयल फील्ड से शुरू होकर लाल सागर के यानबू पोर्ट तक जाने वाली 1,200 किलोमीटर लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, और UAE हबशान ऑयल फील्ड को ओमान की खाड़ी में फुजैरा पोर्ट से जोड़ने वाली अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (ADCOP) से तेल की सप्लाई कर रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि वेस्ट एशिया में पहले तेल एक्सपोर्ट पाइपलाइन नहीं थीं. पुरानी पाइपलाइनों का जिक्र करते हुए गल्फ रिसर्च सेंटर में एनर्जी स्टडीज के सीनियर एडवाइजर नाजी अबी-आद ने एक एनालिसिस में लिखा,
“इस इलाके की हर लाइन कम से कम एक बार बंद हुई है, और उनमें से ज्यादातर आज भी बंद हैं. खाड़ी में कई एक्सपोर्ट पाइपलाइनों के बंद होने के बड़े कारण तेल-गैस पैदा करने वाले देशों या ट्रांजिट देशों के अंदर राजनीतिक झगड़े और देशों के बीच झगड़े हैं. असल में, देशों की सीमाओं को पार करने वाली ज्यादातर पाइपलाइनें किसी ना किसी समय रीजन की राजनीतिक दुश्मनी और झगड़ों का शिकार हुई हैं.”

अब इन्हें दोबारा खोलने या इनमें सुधार करने का वक्त आ गया है. सऊदी अरब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन और UAE अपनी ADCOP पाइपलाइन की कैपेसिटी को बढ़ा सकते हैं. इनके साथ-साथ नई पाइपलाइन भी बना सकते हैं.

खाड़ी देश के पास क्या ऑप्शन हैं?

केप्लर ऑयल एनालिस्ट ग्रैबेनवोगर समेत कई एनालिस्ट्स ने सऊदी अरब, UAE, कुवैत, बहरीन, कतर के अलावा इराक को भी सप्लाई चेन में सुधार के सुझाव दिए हैं. इनमें बड़े सुधार ये हो सकते हैं-

इराक–तुर्की पाइपलाइन (किर्कुक से सेयहान)

इसमें सुधार होने से इराक का तेल खाड़ी को बायपास कर सकता है. इससे इराक के ऑयल एक्सपोर्ट को वैकल्पिक रास्ते मिल सकते हैं.

बसरा–अकाबा (इराक–जॉर्डन) पाइपलाइन

फिलहाल, इस प्रोजेक्ट पर काम बंद है. उम्मीद है कि इस पर दोबारा काम चालू किया जा सकता है.

IPSA पाइपलाइन (इराक–सऊदी अरब)

1990 के दशक से बंद है. फिर से चालू करने के लिए तकनीकी सुधार और राजनीतिक तौर पर साथ आना जरूरी है. अगर ये चालू हो गई, तो यह ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ को बायपास करने का बड़ा विकल्प बन सकती है.

किर्कुक–सीरिया (बनियास) और इराक–सीरिया–लेबनॉन पाइपलाइनें

ज्यादातर पाइपलाइन युद्ध और राजनीतिक तनाव के कारण बंद हैं, समय-समय पर इन्हें दोबारा चालू करने की बात होती है.

कुवैत, कतर, बहरीन जैसे छोटे देशों के लिए क्या?

उनके पास जियोग्राफिक रूप से ऑप्शनल पाइपलाइन कम हैं. अल्टरनेटिव्स की बजाय, स्टोरेज बढ़ाने और रिस्क मैनेजमैंट पर ध्यान देना उनके लिए जरूरी और ज्यादा बेहतर हो सकता है.

इराक की दिक्कतें

इराक के पास सीमित स्टोरेज और रिफाइनिंग कैपेसिटी है. इसकी वजह से यह देश लगातार एक्सपोर्ट करते रहने पर बहुत ज्यादा निर्भर है. पुरानी स्ट्रेटेजिक पाइपलाइन को फिर से बनाना आर्थिक रूप से महंगा तो है, लेकिन लॉन्ग-टर्म में इसका फायदा उठाया जा सकता है. अगर अरब देश अपने एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर कर लेते हैं (जिसमें काफी पैसा और कई साल लगेंगे), तो अमेरिका और ईरान का समझौता हो या नहीं, ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ की अहमियत पहले जैसी नहीं रहेगी.

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