घूसखोर पंडत’ पर SC ने मेकर्स से कहा, ‘बदला हुआ नाम बताओ, तभी रिलीज को मंजूरी’

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेटफ्लिक्स और फिल्ममेकर नीरज पांडे की फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के टाइटल पर सख्त रुख अपनाते हुए इसे बदलने का निर्देश दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि ऐसा शीर्षक किसी खास समुदाय को “बेइज्जत” करता हुआ प्रतीत होता है और इसे मौजूदा रूप में मंजूरी नहीं दी जा सकती। यह निर्देश उस पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (PIL) पर सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें फिल्म की रिलीज और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

दोपहर 12:30 बजे तक नया नाम बताने का आदेश

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की अगुवाई वाली बेंच ने मेकर्स और नेटफ्लिक्स को निर्देश दिया कि वे दोपहर 12:30 बजे तक कोर्ट को बताएं कि फिल्म के लिए कौन सा नया टाइटल प्रस्तावित किया जा रहा है। अदालत ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि विवादित नाम अक्सर पब्लिसिटी हासिल करने के लिए चुने जाते हैं ताकि चर्चा और विवाद खड़ा हो।बेंच ने खुली अदालत में कहा कि रचनात्मक स्वतंत्रता (Creative Freedom) संविधान के तहत संरक्षित है, लेकिन यह असीमित नहीं है। इसे सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) की कीमत पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

“किसी भी हिस्से की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं”

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा, ‘आप किसी की बेइज्जती क्यों करेंगे? यह नैतिकता और पब्लिक ऑर्डर के खिलाफ है।’ उन्होंने आगे कहा कि संविधान निर्माताओं ने देश की विविधता नस्ल, जाति और समुदाय को ध्यान में रखते हुए ‘भाईचारे’ की अवधारणा दी थी। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग समाज के किसी भी वर्ग को अपमानित करने के लिए किया जाता है तो अदालत इसकी अनुमति नहीं दे सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक टाइटल नहीं बदला जाता, फिल्म को मौजूदा नाम से रिलीज़ नहीं होने दिया जाएगा।

PIL में क्या कहा गया?

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि ‘घूसखोर पंडित’ शीर्षक हिंदू पुजारियों, विशेषकर ब्राह्मण समुदाय की छवि को नुकसान पहुंचाता है और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है। याचिका में यह भी कहा गया कि फिल्म जाति और धर्म के आधार पर स्टीरियोटाइपिंग को बढ़ावा देती है, जो सामाजिक और सांप्रदायिक तनाव का कारण बन सकता है। PIL में फिल्म की रिलीज़ और ऑनलाइन स्ट्रीमिंग पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई थी।

हाई कोर्ट में भी हुई सुनवाई

इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट में भी इसी मुद्दे पर सुनवाई हुई थी। नेटफ्लिक्स ने हाई कोर्ट को बताया था कि मेकर्स फिल्म का नाम बदलने को तैयार हैं और इससे जुड़ा सारा प्रमोशनल मटीरियल सोशल मीडिया से हटा लिया गया है। इस बयान को रिकॉर्ड में लेते हुए हाई कोर्ट ने कहा था कि आगे कोई आदेश देने की जरूरत नहीं है और मामले को सुलझा हुआ मान लिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए नए टाइटल की स्पष्ट जानकारी रिकॉर्ड में लाने का निर्देश दिया।

मेकर्स का पक्ष

सुनवाई के दौरान फिल्म निर्माताओं के वकील ने कहा कि फिल्म का नाम अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है और मामला हाई कोर्ट में भी लंबित है। उन्होंने फिल्म को एक पुलिस ड्रामा बताया और कहा कि इसमें एक पुजारी का किरदार है। इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है और यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत दी गई सीमाओं के भीतर ही मान्य है। अदालत ने दोहराया कि किसी भी समुदाय की बेइज्जती की अनुमति नहीं दी जा सकती।

अगली सुनवाई 19 फरवरी को

सुप्रीम कोर्ट ने रेस्पॉन्डेंट्स को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि वे नए टाइटल के साथ एक एफिडेविट दाखिल करें और यह भी बताएं कि आदेश के अनुपालन में और क्या बदलाव किए जा रहे हैं। मामले की अगली सुनवाई 19 फरवरी को तय की गई है। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि समयसीमा का सख्ती से पालन किया जाएगा और इस मामले में अनावश्यक देरी या बार-बार तारीख नहीं दी जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर कोई हंगामा नहीं होना चाहिए और इसे कानूनी दायरे में शांतिपूर्वक निपटाया जाना चाहिए।

फिल्म के बारे में

‘घूसखोर पंडित’ में मनोज बाजपेयी मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म का निर्देशन नीरज पांडे कर रहे हैं और इसे नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ किया जाना प्रस्तावित था। हालांकि, मौजूदा विवाद और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद फिल्म के टाइटल में बदलाव लगभग तय माना जा रहा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मेकर्स कौन सा नया नाम सुझाते हैं और क्या इससे विवाद पूरी तरह शांत हो पाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि रचनात्मक आजादी महत्वपूर्ण है, लेकिन सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मर्यादा उससे भी ऊपर है।

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