BJP का बढ़ता वर्चस्व, ठाकरे ब्रांड पर संकट… महाराष्ट्र निकाय चुनाव की बड़ी बातें

महाराष्ट्र के 29 नगर निगमों के चुनाव नतीजों ने राज्य की राजनीति में सिर्फ सत्ता का संतुलन नहीं बदला है, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा भी काफी हद तक साफ कर दी है. मुंबई महानगरपालिका (BMC) में भाजपा और उसके सहयोगियों की बढ़त ने यह संदेश दे दिया है कि शहरी महाराष्ट्र की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है.

इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) अब महाराष्ट्र की निर्विवाद रूप से नंबर 1 पार्टी बनकर उभरी है. हिंदुत्व और विकास के कॉम्बो ने युवा मतदाताओं को अपनी ओर जबरदस्त तरीके से आकर्षित किया है. ‘डबल इंजन’ से आगे बढ़कर अब ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार का नैरेटिव शहरी वोटर में पैठ बना चुका है. देवेंद्र फडणवीस एक बार फिर खुद को राज्य के ‘नंबर 1 नेता’ और भाजपा की अगली पीढ़ी के सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित करने में सफल रहे हैं.

ठाकरे ब्रांड पर मंडराता संकट

इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू ‘ठाकरे ब्रांड’ का कमजोर पड़ना है. मुंबई, जहां पिछले 25 वर्षों से ठाकरे परिवार का एकछत्र राज था, वहां भाजपा और शिंदे गुट की बढ़त ने ‘ठाकरे दुर्ग’ को ढहा दिया है. राज ठाकरे की ‘बाहरी बनाम स्थानीय’ वाली राजनीति को युवाओं ने सिरे से नकार दिया है. मुंबई की बदलती जनसांख्यिकी अब शिवसेना (UBT) के पक्ष में नहीं दिखती. मराठी वोटों का विभाजन और उत्तर भारतीय वोटों का भाजपा के पक्ष में एकतरफा ध्रुवीकरण जीत का बड़ा कारण बना.

पवार परिवार और कांग्रेस के लिए भी झटका

पवार परिवार के गढ़ पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में ‘पवार बनाम पवार’ की जंग ने यह संकेत दिया है कि अब यहां भी ‘लॉ ऑफ डिमिनिशिंग रिटर्न्स’ (घटते प्रतिफल का नियम) लागू हो गया है. कांग्रेस की स्थिति और भी चिंताजनक है; शहरी इलाकों में उसका आधार लगातार खिसक रहा है और वह दहाई के आंकड़ों तक सिमट कर रह गई है.
भाजपा को सबसे बड़ा फायदा एक बिखरे हुए विपक्ष से मिला है. महाविकास आघाड़ी में स्पष्ट नेतृत्व की कमी और आपसी खींचतान ने भाजपा के लिए राह और आसान कर दी. मुंबई की बदलती जनसांख्यिकी भी अब शिवसेना के अनुकूल नहीं रही. मराठी वोट जहां बंटा हुआ दिखा, वहीं उत्तर भारतीय वोट का भाजपा के पक्ष में एकजुट होना निर्णायक साबित हुआ.

गेमचेंजर साबित हुईं महिला केंद्रित योजनाएं

राज ठाकरे की बाहरी विरोधी राजनीति का असर खासकर युवाओं में कमजोर पड़ता दिखा. इसके उलट भाजपा की महिला-केंद्रित योजनाएं एक बार फिर चुनावी गेमचेंजर साबित हुईं. हालांकि, इन सबके बीच राज्य चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर उठते सवाल इस चुनाव की सबसे बड़ी संस्थागत चुनौती बने हुए हैं.

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