राजनीति का अपना एक गणित होता है । यह तो कम पढ़ा-लिखा आदमी भी जानता है। पिछले विधानसभा चुनाव में हम सबने देखा था कि गणित कैसे काम करता है।
वर्तमान समय में कांग्रेस एक नया अवतार लेकर मध्य प्रदेश में शोर मचा रही है। सब नौजवान हैं, जिन्होंने अभी राजनीति का ककहरा नहीं पढ़ा है , इस उम्र और जोश में न पढ़ने का समय होता है।
वैसे तो अभी विधानसभा चुनाव में काफी लंबा समय है। लेकिन एक सवाल ज़हन में पैदा होता है कि मानलो एक बार फिर वही गणित विधानसभा सभा चुनाव के बाद उभरता है और सत्ता की चाबी सिंधिया के हाथ में चली जाती है , सिंधिया अपने घर वापिसी का मन बनाते हैं । ऐसी स्थिति में क्या कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व आज इस बात का दावा कर सकता है कि किसी भी स्थिति में किसी भी बाहर से आने वाले व्यक्ति को पुनः कांग्रेस में प्रवेश नहीं मिलेगा।
लेकिन राजनीति तो एक वेश्या की तरह है। जिसके दरवाजे सबके लिए हमेशा खुले रहते हैं।
राजनीति में आचरण और चरित्र नाम की कोई चीज बची ही नहीं है। एकबार वेश्या पर विश्वास किया जा सकता है लेकिन राजनीतिक लोगों पर नहीं।
पिछले समय में हम सबने देखा था , जीते हुए जनप्रतिनिधि हांसिए पर चले गए और चुनाव में हार कर भी सिंधिया केंद्र में मंत्री बन कर प्रदेश की सत्ता पर हावी रहे।
यह कमाल केवल सिंधिया जैसे आभा मंडल वाला व्यक्ति ही कर सकता है। यह आभा मंडल किसी और के चेहरे पर तो झलकता नहीं है।
सिंधिया जैसे उर्जावान व्यक्तित्व की अनदेखी कांग्रेस की सबसे बड़ी भूल थी।आज के समय में सिंधिया जैसे सक्रिय जनप्रतिनिधि की देश प्रदेश और क्षेत्र को ज़रूरत है ।
क्षेत्र की जनता से सतत संपर्क और विकास में रूचि केवल सिंधिया के हाथों से ही संभव है। क्षेत्रीय समस्याओं की जानकारी उन्हें है। किसी और को समझने में एक अरसा बीत जाएगा।
यह भी देखने में आ रहा है भीतर ही भीतर महल की ड्योढ़ी से राजनीति शुरू करने वाले लोग सिंधिया के खिलाफ साजिश रच रहे हैं । भूल जाते हैं यही वो दरवाजा है जहां कभी भिखारी बन कर कटोरा लिए खड़े रहते थे और उन्हें जो भी राजनीति में हासिल है,यही वो दरवाजा है।
और भूल जाते हैं आज की जो भाजपा है , उसकी नींव में राजमाता विजयाराजे सिंधिया, अटलजी और आडवाणीजी का समूचा जीवन लगा हुआ है।
अटलजी और आडवाणीजी ने हमेशा सिंधिया परिवार को यथोचित सम्मान और राजनीति में स्थान दिया। लेकिन आजकल कल की राजनीति में लोग भूल जाते हैं। भाजपा सिंधिया परिवार की मातृ संस्था है।
दूसरी बात सिंधिया परिवार का वर्चस्व पूरे प्रदेश में है। सिंधिया को जनता पसंद करती है। लेकिन यहां सिंधिया को इस बात पर मंथन करना होगा उनके द्वारा भेजे गए उम्मीदवार पांच साल में चुनाव क्यों हार जाते हैं और जनता की कसौटी पर खरे क्यों नहीं उतरते हैं?
सिंधिया जनाधार वाले लीडर हैं यह सब जानते हैं। सिंधिया के समकक्ष प्रदेश में केवल शिवराज सिंह चौहान का ही कद राजनीति में नजर आता है और तो कोई दिखाई देता नहीं । दोनों को मध्यप्रदेश की जनता पसंद करती है।
अब कांग्रेस की बात कर लेते हैं कांग्रेस कभी भी अपने वादे पर खरी नहीं उतरती है। सिंधिया के साथ की गई वादा खिलाफी सभी को मालूम है।
भाजपा इस मामले में खरी उतरती है जो वादा बाहर से आने वाले लोगों से करती है उसे पूरा करती है।
इस छल कपट की राजनीति का कारण कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं का पुत्र मोह है। इसका ताजा उदाहरण गुना जिला कांग्रेस कमेटी में आम कार्यकर्ता की अभी से अवहेलना कर मनमानी की गई।
दूसरे कांग्रेस के द्वारा शिवपुरी गुना से वीरेन्द्र रघुवंशी जैसे सक्रिय व्यक्ति को वादा कर टिकट न देना और बार बार अपमानित कर घर बैठने पर मजबूर कर देना मंहगा पड़ेगा।
कांग्रेस के क्षेत्रीय दिग्गज अच्छे तरीके से जानते हैं वीरेंद्र रघुवंशी की ताकत को अगर राजनीति में फिर से स्थापित किया गया तो क्षेत्र में बहुत से लोगों की राजनीति हांसिए पर चली जाएगी।
रघुवंशी समाज की बार बार अनदेखी दोनों दलों को चुनाव के समय मंहगी पड़ सकती है।
कांग्रेस को पुनर्जीवित करने में जीतू पटवारी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।लेकिन कांग्रेस का इतिहास विश्वासघात का है,इस पर विश्वास करना मुश्किल है कि जीतू पटवारी को इसका उचित फल मिलेगा की नहीं।
बड़े बड़े घाघ लोग चुप बैठे हैं और इसी चुप्पी में राज है।
बिहार चुनाव इसका ताजा उदाहरण है बड़ी बड़ी मछलियां धनबल का सहारा लेकर टिकट हासिल करने में सफल रही हैं। और एक मछली सारे तालाब को गन्दा करने को काफी होती है।
कोइसा दल हो टिकट वितरण के समय हर दल की तासीर बदल जाती है और चुनाव के बाद तस्वीर।
फिर शुरू होता है गणित का खेल और परिणाम आप सब जानते हैं। जिसको मैथेमेटिक्स की समझ है राजा वही बनता है और मलाई राजा के आसपास जो चमचे रहते हैं वही खाते हैं।
बेचारे तन मन धन से मेहनत करने वाले जिन्होंने अपने जीवन के कई साल राजनीति को कुर्बान कर दिये टापते रह जाते हैं।
यही है गणित का खेल।
-ओम रघुवंशी
शिवपुरी
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