आज देश अपने लोकतंत्र की स्थापना की सालगिरह मना रहा है. इस रोज देश अपने उन मंसूबो को पूरा करने मे कितना कामयाब हुआ इस बात के आकालन का भी दिन होता है तब ऐसी तस्वीरें सुकून देती है.
आज़ादी की लड़ाई का मकसद सबको बराबरी का हक देने का था. जाति, धर्म, पंथ और लिंग से अलग हटकर. स्वतंत्रता पूर्व देश इसी भेदभाव के भंवर जाल मे फंसा था. नारी को नौकरी तो दूर उनके लिए शिक्षा देना – दिलाना भी अलिखित अपराध जैसा था. हालांकि महात्मा फुले और ज्योतिबा फुले मे तमाम यातनाओ के बावजूद इस दिशा मे प्रयास शुरू किये थे लेकिन लम्बी गुलामी ने सोच को रक्त मे ही भेदभावपूर्ण घोल रखा था. आज़ादी की लड़ाई बराबरी के अधिकार के लिए लड़ी गयीं और महिला और पुरुषो द्वारा इसमें बराबरी का ही योगदान है. पहली चर्चित और गर्वित वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई बनी. यही बजह है कि 15 अगस्त 1947 को हमारी स्वतंत्रता की भव्य ईमारत इसी की बुनियाद पर रखी गई.
संविधान भी सबको सामान अधिकार पर आधारित बना. वक व्यक्ति… एक वोट. सबको एक जैसे अधिकार.
आज ये तस्वीर हमें बताती है कि देश अपने लक्ष्य के एक गौरवशाली मुकाम तक पहुंचा है. चित्र ग्वालियर के एसएएफ मैदान का है. यहाँ स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन हुआ. चित्र मे ग्वालियर कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान है जो इस समारोह की आयोजक है और साथ खड़े है इनके पति भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी शैलेन्द्र सिंह चौहान जो इस समय एसएएफ के कमांडेंट है. मैदान इसी बटालियन का है. सो वे कलेक्टर के भी होस्ट हैँ. दोनों मैदान मे मिले तो ये शानदार दृश्य उभरकर सामने आया तो लोकतंत्र खिलखिला उठा.
स्त्री – पुरुष की यह बराबरी हमें स्वतंत्रता के कारण और संविधान के जरिये मिली बरना स्वतंत्रता पूर्व ऐसी तस्वीरें भला कहाँ संभव थी.
जय हिन्द
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