पेट्रोल में अब तक जितना इथेनॉल नहीं मिला, उससे कहीं ज्यादा बयान मिल गए हैं. कभी कहा गया कि अगर E20 से एक भी गाड़ी खराब हुई है तो नाम बताइए. फिर कहा गया कि इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है. उसके बाद पुराने वाहनों के रबर पार्ट्स बदलने की सलाह भी आ गई. और अब संसद में यह भी मान लिया गया कि E20 से माइलेज 2% से 6% तक घट सकता है.
यानी कहानी ऐसी है कि गाड़ी से ज्यादा लोगों का दिमाग ओवरहीट हो गया है. सवाल सिर्फ E20 का नहीं है. सवाल यह है कि जब देश का सबसे बड़ा चेहरा किसी नीति का सबसे बड़ा प्रचारक भी हो और बाद में उसी मुद्दे पर अलग-अलग मंचों से अलग-अलग बातें कहे, तो आम आदमी किस बात पर भरोसा करे. आखिर E20 पेट्रोल सच में कितना फायदेमंद है, क्या इससे गाड़ियों को नुकसान है? अगर है तो इसकी जवाबदेही किसकी होगी? ऐसे ही तमाम सवालों से घिरा आम आदमी ये ख़बर पढ़ने के बाद भी फ्यूल स्टेशन पर E20 पेट्रोल भराता नज़र आएगा.
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी लंबे समय तक इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल के सबसे बड़े समर्थकों में रहे हैं. उन्होंने कई मंचों से E20 के फायदे गिनाए और इसके विरोध करने वालों को खुली चुनौती तक दी. लेकिन बदलती स्थितियों के साथ उनके बयान भी बदलते गए. आज हम यहां पर उन्हीं बातों की चर्चा करेंगे-
“फ्यूचर का फ्यूल”
पिछले साल अगस्त में पुणे में प्राज इंडस्ट्रीज द्वारा आयोजित वर्ल्ड बायोफ्यूल डे इन इंडिया कार्यक्रम में बोलते हुए, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि, “इथेनॉल हमारे लिए एक शुरुआत है, ये कोई अंत नहीं है. ये फ्यूचर का फ्यूल है. अभी पेट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग हो रही है और आने वाले समय में डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग की जाएगी. इस पर शोध चल रहा है.”
“E20 से एक भी गाड़ी खराब हुई है तो नाम बताइए”
E20 को लेकर जब लगातार सवाल उठ रहे थे, तब नितिन गडकरी ने इसके आलोचकों को खुली चुनौती देते हुए कहा था कि अगर E20 पेट्रोल से एक भी गाड़ी खराब हुई है तो उसका नाम बताइए. उनका कहना था कि इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल से वाहनों को कोई नुकसान नहीं होता और इसके खिलाफ फैलाई जा रही कई बातें तथ्यों पर आधारित नहीं हैं. E20 और मेरे खिलाफ सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाया जा रहा है.
इस दौरान जब सोशल मीडिया पर E20 फ्यूल को लेकर लोगों ने शिकायत करना शुरू किया तब, सरकार ने देश के प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों (टोयोटा, मारुति सुजुकी, बजाज ऑटो और टीवीएस) के अधिकारियों का एक पैनल बैठाया. जिन्होंने ये कहा कि, इथेनॉल ब्लेंडेड फ्यूल से वाहनों को कोई नुकसान नहीं है. बल्कि इससे फायदा ही फायदा है.
“E20 से लेना-देना नहीं”
इसके बाद एक अदालत में सुनवाई के दौरान नितिन गडकरी का बयान सामने आया कि, “E20 से उनका कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा कि यह विषय उनके मंत्रालय के दायरे में नहीं आता. इसका संबंध पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय से है.”
कानूनी रूप से यह बात सही भी है कि देश में इथेनॉल ब्लेंडिंग की पॉलिसी तैयार करना और फ्यूल की सप्लाई तय करना पेट्रोलियम मंत्रालय की जिम्मेदारी है. जबकि सड़क परिवहन मंत्रालय वाहनों और उनके तकनीकी मानकों से जुड़ा काम देखता है. लेकिन जनता के बीच यह बयान इसलिए चर्चा में आया क्योंकि E20 के प्रचार में नितिन गडकरी सबसे प्रमुख चेहरों में रहे हैं. ऐसे में उनके इस बयान ने लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए.
“बदलने पड़ सकते हैं कुछ पार्ट्स”
बीते बुधवार को राज्यसभा में नितिन गडकरी ने कहा कि, “2005 से 2016 के बीच बने BS-III वाहनों को E20 पेट्रोल पर चलाने के लिए कुछ रबर के पार्ट्स और गास्केट बदलने की जरूरत पड़ सकती है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि उपलब्ध स्टडीज़ में E20 का गाड़ी की परफॉर्मेंस पर कोई बड़ा नकारात्मक असर नहीं पाया गया है.” गडकरी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर यूजर्स ने वो पुराने वीडियो शेयर करना शुरू कर दिया, जिसमें गडकरी वाहनों के खराब न होने का दावा कर रहे थे.
दरअसल, पुराने वाहनों में इस्तेमाल होने वाले कुछ रबर और प्लास्टिक के पार्ट्स हाई इथेनॉल वाले फ्यूल के साथ लंबे समय तक पूरी तरह कंपैटिबल नहीं होते. ऐसे में समय के साथ उनमें घिसावट या खराबी आने की संभावना बढ़ जाती है. यही कारण है कि, हाल ही में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने एक ऐसे ही कन्वर्जन किट की टेस्टिंग की है. जिसका इस्तेमाल पुराने वाहनों में किया जा सकेगा.
“E20 से 6% तक घट सकता है माइलेज”
इसके एक दिन बाद संसद में नितिन गडकरी ने स्वीकार किया कि E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने पर गाड़ियों की फ्यूल एफिशिएंसी यानी माइलेज 2% से 6% तक कम हो सकता है. उन्होंने साफ कहा कि यह कमी हर वाहन में एक जैसी नहीं होगी. यह वाहन की कैटेगरी, इंजन तकनीक और उसकी उम्र पर निर्भर करेगी.
असल में इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी रेगुलर पेट्रोल से कम होती है. इसलिए समान मात्रा में फ्यूल जलाने पर थोड़ी कम दूरी तय हो सकती है. यही कारण है कि कई एक्सपर्ट पहले से ही E20 पर हल्की माइलेज गिरावट की बात करते रहे हैं.
आखिर E20 पर इतना भ्रम क्यों?
असल समस्या E20 नहीं, बल्कि अलग-अलग संदर्भों में दिए गए बयानों की है. जब सरकार E20 के फायदे बताती है तो उसका फोकस पर्यावरण, विदेशी तेल आयात में कमी और किसानों को फायदा पहुंचाने पर होता है. जब अदालत में जिम्मेदारी की बात आती है तो मंत्रालयों के अधिकार क्षेत्र की चर्चा होती है. जब संसद में तकनीकी सवाल पूछे जाते हैं तो पुराने वाहनों, माइलेज और इंजीनियरिंग से जुड़े तथ्य सामने आते हैं. यानी हर बयान अलग संदर्भ में दिया गया है. लेकिन आम लोगों तक केवल बयान पहुंचते हैं, उनका पूरा संदर्भ नहीं. यही वजह है कि भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है.
पुराने वाहनों का क्या होगा?
सरकार ने भी अब स्पष्ट कर दिया है कि, 2005 से 2016 के बीच बने BS-III वाहनों में रबर पाइप, सील और गास्केट जैसे पार्ट्स पर E20 पेट्रोल का असर पड़ सकता है. यानी ऐसे वाहनों के पार्ट्स का समय के साथ डैमेज होना संभव है. ऐसे में सरकार का ये बयान पुराने वाहन मालिकों के लिए चिंता का विषय है. हालांकि सरकारी नियमों के अनुसार 15 साल से पुराने पेट्रोल वाहन और 10 साल पुराने डीजल वाहन वैसे ही स्क्रैप कैटेगरी में आते हैं.
लोगों को साफ जानकारी कौन देगा?
शुरुआत में E20 को लेकर सरकार का मोटिव क्लीयर नज़र आ रहा था. लेकिन अब बयानों में बदलाव लोगों के बीच संदेह पैदा कर रहा है. जनता को अब भी एक ऐसी आधिकारिक और स्पष्ट गाइडलाइन का इंतजार है जिसमें यह बताया जाए कि, क्या E20 पेट्रोल उनकी गाड़ी के लिए मुफीद है. क्या उन्हें भविष्य में ऐसी गाड़ी खरीदनी चाहिए जो समय के साथ बदलती फ्यूल पॉलिसी और ब्लेंडिंग के लिहाज से सही रहे. जब तक ऐसी स्पष्ट जानकारी हर वाहन मालिक तक नहीं पहुंचती, तब तक E20 को लेकर सवाल और भ्रम बना रहेगा.
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