किसी के पिता मरीन कमांडो, किसी का पति ACP… CJP प्रोटेस्ट में हिंसा का दर्द सुनाने आए ये 4 लोग कौन

दिल्ली में 20 जुलाई को हुए ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी पीड़ा सामने रखी. उन्होंने कहा कि अब तक पूरे घटनाक्रम में पुलिस पर कथित ज्यादती के आरोपों की चर्चा ज्यादा हुई है, लेकिन ड्यूटी के दौरान घायल हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के दर्द पर संसद में भी चर्चा होनी चाहिए.

कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक एसीपी की पत्नी, एक एएसआई की पत्नी और दो घायल पुलिस अधिकारियों के बच्चों ने उस दिन की घटनाओं और उसके बाद परिवारों पर पड़े मानसिक दबाव को साझा किया.
एसीपी की पत्नी उपनीत कौर ने अपने पति के घायल होकर घर लौटने की रात को याद करते हुए इसे अपने और अपनी दो साल की बेटी के लिए बेहद डरावना अनुभव बताया. उन्होंने कहा कि पुलिस लगातार भीड़ से शांत रहने की अपील कर रही थी, लेकिन इसके बावजूद पुलिसकर्मियों पर बोतलें, पत्थर, चप्पल और दूसरी चीजें फेंकी गईं.

पुलिसकर्मियों का भी परिवार होता है’

उन्होंने कहा, “हर वर्दी के पीछे सिर्फ एक पुलिस अधिकारी नहीं होता, उसके पीछे पत्नी, बच्चे, माता-पिता और पूरा परिवार होता है.” परिवारों का कहना था कि वे छात्रों को दोषी नहीं ठहरा रहे, लेकिन भीड़ में शामिल कुछ असामाजिक तत्वों पर हिंसा भड़काने का आरोप जरूर लगा रहे हैं.
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दिखाई गई तस्वीरों और प्रस्तुति में परिवारों ने दावा किया कि हिंसा में 250 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए. उनके मुताबिक, 110 से अधिक बैरिकेड, 300 बॉडी प्रोटेक्टर, 350 हेलमेट, 20 लाउडहेलर, 10 हैंड-हेल्ड मेटल डिटेक्टर और एक एक्स-रे बैगेज स्कैनर को नुकसान पहुंचा. 25 से ज्यादा सरकारी वाहनों और निजी संपत्ति में तोड़फोड़ का भी दावा किया गया.

एएसआई की पत्नी सीमा ने बताया कि उनके पति करीब 33 साल पहले दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के तौर पर भर्ती हुए थे. 20 जुलाई को सुबह करीब 11 बजे उन्होंने फोन कर बताया था कि भीड़ काफी बड़ी है और प्रदर्शनकारी संसद की तरफ मार्च की तैयारी कर रहे हैं. कुछ घंटे बाद उन्हें जानकारी मिली कि उनके पति को एलएनजेपी अस्पताल ले जाया गया है.
सीमा के मुताबिक, उनके पति ने बताया कि भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों पर पत्थरों, गमलों, चप्पलों और जूतों से हमला किया. इसके बाद उनके फोन की बैटरी खत्म हो गई और परिवार की चिंता और बढ़ गई. रात करीब 11 बजे जब वह घर लौटे तो उनका सुरक्षा हेलमेट टूटा हुआ था.

उन्होंने कहा कि अगर हेलमेट टूटने के बाद कोई और पत्थर सिर पर लगता तो स्थिति जानलेवा हो सकती थी. उनका सवाल था कि जब पुलिस पर कार्रवाई और कथित बर्बरता की चर्चा हो रही है, तो घायल पुलिसकर्मियों की स्थिति और उनके परिवारों के अनुभवों पर संसद में बात क्यों नहीं होनी चाहिए?

मरीन कमांडो रहे पिता को बताया गया अपराधी- छात्रा

 दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा कुंजल ने अपने पिता की हालत का जिक्र करते हुए बताया कि उनके पिता सब-इंस्पेक्टर हैं और इससे पहले 15 साल तक भारतीय नौसेना में मरीन कमांडो रह चुके हैं. उन्होंने दावा किया कि जंतर-मंतर पर उनके पिता को भीड़ ने मंच के पास खींच लिया और उनके साथ गंभीर मारपीट हुई, जिसके बाद उन्हें आरएमएल अस्पताल में भर्ती कराया गया.

कुंजल ने बताया कि 25 जुलाई को जंतर-मंतर के पास भीड़ ने उनके पिता को जबरन खींच लिया और उनकी मॉब लिंचिंग करने की कोशिश की, जिससे वे लगभग 4 घंटे तक अस्पताल में बेहोश रहे. जब उनके सहकर्मी रात को उन्हें घर लाए, तो उनकी पूरी यूनिफॉर्म खून से सनी हुई थी. कुंजल ने सोशल मीडिया के एकतरफा रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब मैंने सोशल मीडिया खोला, तो मेरे पिता को पहले ही एक अपराधी के रूप में दिखाया जा चुका था. आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, तो क्या एक नागरिक के नाते हमें न्याय मांगने का अधिकार नहीं है?”

घायल एसीपी के बेटे और छात्र लक्ष्य सिंह ने बताया कि जब उन्होंने अपने पिता को सिर पर टांके और कटे हुए बालों के साथ अस्पताल में देखा, तो वे पूरी तरह सहम गए थे. लक्ष्य ने कहा कि उनके पिता ने बताया था कि विरोध प्रदर्शन में कई लोग आए थे, लेकिन कुछ उपद्रवियों का मकसद सिर्फ अराजकता फैलाना था. 

दोनों पक्षों को सुना जाए

लक्ष्य ने निराशा जताते हुए कहा, “यह देखकर बहुत दुख होता है कि जब भी मैं ऑनलाइन जाता हूं, तो हर जगह सिर्फ पुलिस को अपराधी की तरह पेश किया जा रहा है. संसद में भी घायल पुलिसकर्मियों पर कोई चर्चा नहीं हो रही है. हम बस इतना चाहते हैं कि देश हमारा पक्ष भी सुने.”
पुलिसकर्मियों के परिजनों ने साफ किया कि उनका मकसद छात्रों के आंदोलन को निशाना बनाना नहीं है. उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि 20 जुलाई की हिंसा को दोनों पक्षों के नजरिए से देखा जाए. उनका कहना है कि अगर छात्रों की चोट, उनकी परेशानी और कथित पुलिस कार्रवाई पर संसद में चर्चा हो सकती है, तो घायल पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों की पीड़ा को भी उसी गंभीरता से सुना जाना चाहिए.

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