क्या खत्म होगी ट्रंप की बेताबी? बर्थडे पर मिलेगा तोहफा या मलते रह जाएंगे हाथ

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आज 80 साल के हो गए हैं. आमतौर पर जन्मदिन पर लोग केक काटते हैं, परिवार के साथ वक्त बिताते हैं और खुशियां मनाते हैं. तोहफे कुबूल करते हैं. लेकिन ट्रंप की नजर शायद किसी और तोहफे पर टिकी है. वह तोहफा है ईरान के साथ एक पीस डील.
पिछले कई दिनों से ट्रंप लगातार दावा कर रहे हैं कि अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने वाला समझौता लगभग तैयार है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि समझौते के सभी पहलुओं पर सहमति बन चुकी है और बस साइनिंग बाकी हैं. ट्रंप को उम्मीद थी कि रविवार, यानी उनके जन्मदिन के दिन, दुनिया को यह ऐतिहासिक तस्वीर देखने को मिलेगी. लेकिन जन्मदिन आ गया, और डील अब भी कागजों पर नहीं उतरी.
यहीं से सवाल उठने लगे हैं. क्या ट्रंप फिर से पहले ही जश्न मनाने लगे? क्या ईरान आखिरी समय में नई शर्तें रख रहा है? या फिर यह पूरा मामला ट्रंप की उस पुरानी छवि का हिस्सा है जिसमें वह किसी समझौते को तय होने से पहले ही जीत का ऐलान कर देते हैं? इस कहानी को समझने के लिए हमें पिछले कुछ महीनों का रिकॉर्ड देखना होगा.

मार्च से शुरू हुई ‘डील बस होने वाली है’ वाली कहानी

जंग के बीच मार्च में राष्ट्रपति ट्रंप ने पहली बार दावा किया था कि ईरान के साथ बातचीत बेहद पॉजिटिव तरीके से आगे बढ़ रही है. उस वक्त उन्होंने कहा था कि लगभग सभी बड़े मुद्दों पर सहमति बन चुकी है. इसके बाद अप्रैल, मई, और फिर अब इस महीने जून तक ट्रंप बार-बार यही बात दोहराते रहे कि समझौता बेहद करीब है. व्हाइट हाउस की तरफ से भी संकेत दिए जाते रहे कि कुछ ही दिनों में बड़ी घोषणा हो सकती है. लेकिन अप्रैल में सीजफायर तो हो गया लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका.

जब बातचीत की जगह बमों ने ले ली

पिछले हफ्ते हालात ऐसे हो गए कि अमेरिका ने खुली धमकियां देना शुरू कर दिया. ट्रंप ने कहा कि ईरान सिर्फ बातें कर रहा है और कार्रवाई नहीं कर रहा. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने तो यहां तक कह दिया कि अमेरिका “बमों के जरिए बातचीत” करने को तैयार है.
ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट और इंटरव्यू में भी यही आक्रामक रुख दिखाई दिया. उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका ईरान के तेल और गैस ढांचे को निशाना बना सकता है. एक समय तो ऐसा लग रहा था कि दोनों देशों की बातचीत अब खत्म और अब फिर से ऑल आउट वॉर शुरू हो जाएगा.
राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बीच शुक्रवार को ऐलान कर दिया कि समझौते का मसौदा तैयार हो चुका है. उनका दावा था कि सभी पक्षों ने न सिर्फ मूल सिद्धांतों पर बल्कि बारीक मुद्दों पर भी सहमति दे दी है. व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि उन्हें कल्पना भी नहीं हो सकती कि यह समझौता विफल हो सकता है. उनके शब्दों में अगर कहें तो उनका कहना था, “वे इस समझौते पर उतना ही हस्ताक्षर करने को बेताब हैं जितना मैं हूं, शायद उससे भी ज्यादा.”

ईरान की शर्तें क्यों बढ़ा रही हैं तनाव?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस बीच कहा कि सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई समझौते के पक्ष में हैं. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने कुछ ऐसी शर्तें फिर दोहराई कि जिससे पूरा समीकरण को और मुश्किल हो गया. ईरान चाहता है कि इजरायल लेबनान से पीछे हटे.
ईरान यह भी चाहता है कि होर्मुज स्ट्रेट में नियंत्रण उसकी शर्तों के मुताबिक चले. जहाजों के पासेज के लिए थोड़ी फीस वसूले. इसके अलावा क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी तेहरान की अपनी मांगें हैं. यानी ट्रंप जिस समझौते को लगभग तय मान रहे हैं, उसके रास्ते में अभी भी कई बड़े सवाल खड़े हैं.

ट्रंप को क्यों सता रहा इतिहास?

वॉशिंगटन में कई विश्लेषक इस पूरे मामले की तुलना अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर से कर रहे हैं. 1979 में ईरान में इस्लामी क्रांति के दौरान अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया गया था और दर्जनों अमेरिकी बंधक बना लिए गए थे. करीब 444 दिन तक यह संकट चला था. कार्टर महीनों तक कोशिश करते रहे कि उनके कार्यकाल में बंधकों की रिहाई हो जाए. लेकिन ईरान ने उन्हें तब तक नहीं छोड़ा जब तक कार्टर व्हाइट हाउस से विदा नहीं हो गए.
20 जनवरी 1981 को रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के कुछ ही समय बाद बंधकों को रिहा किया गया. अमेरिका में आज भी इसे कार्टर की सबसे बड़ी कूटनीतिक हार माना जाता है. अब कुछ लोग पूछ रहे हैं कि कहीं ट्रंप के साथ भी वैसा ही तो नहीं होने जा रहा?

राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले कई महीनों में दर्जनों बार कह चुके हैं कि समझौता बस होने वाला है. अगर अब यह डील टूट जाती है तो विपक्ष उन्हें झूठे वादे करने वाला नेता बताएगा. युद्ध के 100 दिन पूरे होने के बाद उनकी लोकप्रियता पहले ही घट गई है.  महंगाई, टैरिफ, वैश्विक व्यापार और युद्ध की लागत जैसे मुद्दे अमेरिकी राजनीति में बहस का मुद्दा बना हुआ है.
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ट्रंप के लिए व्यक्तिगत विश्वसनीयता का सवाल

ईरान समझौता ट्रंप के लिए सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं रह गया है. यह उनकी व्यक्तिगत विश्वसनीयता का सवाल भी बन चुका है. लेकिन क्या समझौता होने से सब ठीक हो जाएगा? मान लीजिए अगले कुछ दिनों में समझौते पर हस्ताक्षर हो भी जाते हैं. तब भी कई सवाल बने रहेंगे. क्या ईरान वास्तव में अपने परमाणु कार्यक्रम पर नई सीमाएं स्वीकार करेगा? क्या इजरायल इस समझौते को मानेगा, जो पहले ही सीजफायर के समझौतों को नकार चुका है?  क्या लेबनान और क्षेत्रीय संघर्षों का समाधान निकलेगा? और सबसे बड़ा सवाल, क्या यह समझौता लंबे समय तक टिकेगा?
याद रखने वाली बात यह है कि ट्रंप ने 2015 में बराक ओबामा के दौर में हुए परमाणु समझौते को खुद खत्म कर दिया था. दिलचस्प बात यह है कि आज जिन प्रतिबंधों और शर्तों की बात हो रही है, उनमें से कई पहले से उस समझौते का हिस्सा थीं. अब हालात ऐसे हैं कि ईरान ने उन परमाणु साइट्स को भी सील कर दिया है और माइनिंग कर दी है, जहां अमेरिका-इजरायल ने हमले किए थे.
इस हालात में उस जगह से यूरेनियम को बाहर निकालना भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती साबित होगी. यहां एक आशंका और बढ़ गई है कि कहीं ईरान अब ये न कह दे कि यूरेनियम के कुछ हिस्से को निकालना नामुमकिन है. अगर ऐसा होता है तो इजरायल का वो शक बना रहेगा कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है और ऐसे हालात में ईरान पर जंग के बाद छाए रह सकते हैं.

जन्मदिन का सबसे बड़ा इंतजार ‘पीस डील’

फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या ट्रंप अपने 80वें जन्मदिन पर वह तस्वीर हासिल कर पाएंगे जिसका वह महीनों से इंतजार कर रहे हैं. व्हाइट हाउस को अब भी लग रहा है कि ईरान के साथ डील साइन हो ही जाएगी. ट्रंप अब भी भरोसा जता रहे हैं. लेकिन ईरान अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ दिखाई देता है. इजरायल भी पूरी तरह साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा.
यानी कागज पर डील भले तैयार दिखाई दे, लेकिन जमीन पर अभी भी कई गांठें खुलनी बाकी हैं. इसलिए ट्रंप के जन्मदिन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उन्हें ईरान से शांति समझौते का तोहफा मिलेगा, या फिर उनका यह खास दिन भी डील-डील-पीस डील करते निकल जाएगा?

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