शुरू में खुशी, आखिर में गम… हर बदलते घंटे के साथ बदलते गए TMC के लिए नतीजों के मायने

4 मई का दिन उम्मीद के मुताबिक ही शुरू हुआ. पोस्टल बैलेट खोले गए. रुझानों में भारतीय जनता पार्टी आगे चल रही थी. उत्सुकता के साथ कई अधिकारी कुछ सफ़ेद वर्दी में और कुछ खाकी वर्दी में बार-बार यह देखते रहे कि रुझान क्या संकेत दे रहे हैं. 30 साल की उम्र के आस-पास के एक पुलिस अधिकारी ने मज़ाकिया लहजे में कहा, “बीजेपी आखिर तक अपनी बढ़त बनाए रखेगी.” मैंने पूछा, “अगर ऐसा नहीं हुआ तो?” उन्होंने कहा, “पश्चिम बंगाल एक अंधेरे भविष्य की ओर बढ़ जाएगा. हम पहले ही बहुत कुछ खो चुके हैं. झारखंड और बिहार के पुलिस अधिकारियों की हालत देखिए. वे हमसे कहीं बेहतर हैं.” उनका दर्द निजी लग रहा था. यह सरकारी कर्मचारियों को महंगाई भत्ता (DA) न मिलने की आम शिकायत से कहीं बढ़कर था.

सफ़ेद वर्दी पहने एक अन्य पुलिस अधिकारी ने कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट तक गए, हमारे डीए को मंज़ूरी देने के निर्देशों के बावजूद, हमें बस सितंबर तक मंज़ूरी मिलने का आश्वासन दिया गया है.”
नेताजी इंडोर स्टेडियम में तैनात इन सभी अधिकारियों के पास टीएमसी सरकार के खिलाफ आम या निजी शिकायतों की एक लंबी लिस्ट थी. उन्होंने दावा किया कि टीएमसी सरकार के पिछले पंद्रह सालों में टीएमसी के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उन पर हावी होने या उन्हें दबाने की कोशिश की. तीसरे अधिकारी ने मुझे सुबह 11 बजे बताया, जब पूर्वी राज्य में बीजेपी भारी बहुमत की ओर बढ़ रही थी, “हमें उनके कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज करने की इजाजत नहीं दी जाती थी, तब भी नहीं जब हमारे जवानों की जान जोखिम में होती थी.”

टीएमसी का रंग क्यों पड़ा फीका?

उत्तरी बंगाल में चुनाव के दौरान ही मैंने सरकारी कर्मचारियों के बीच नाराज़गी महसूस कर ली थी. उस वक्त इन सरकारी कर्मचारियों ने ममता बनर्जी सरकार के प्रति अपनी निराशा और बदलाव की चाहत के बारे में बात की थी. किसी ने सही पोस्टिंग न मिलने की शिकायत की, तो किसी ने ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ का सामना करने की. जब तक बंगाल ने ‘भगवा रंग’ अपनाया, तब तक ये आवाज़ें ज्यादा बुलंद और साफ हो चुकी थीं. भर्ती योजनाओं से जुड़े विवाद, सरकारी नौकरी पाने वालों के लिए कानूनी मुश्किलें और स्कूल शिक्षकों की अनदेखी जैसे मुद्दे इस लिस्ट में सबसे ऊपर थे.
पोस्टल बैलट्स मौजूदा सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ इसी असंतोष का एक आईना थे. जब पश्चिम बंगाल में सियासी सरगर्मी बढ़ी और सबका ध्यान भवानीपुर मतगणना केंद्र पर केंद्रित हो गया, तब नेताजी इंडोर स्टेडियम टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच शुरुआती झड़पों में से एक का गवाह बना. मैं चुनावी रुझानों को देखने में व्यस्त था, तभी एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने मुझे काउंटिंग सेंटर के पास हो रहे हंगामे के बारे में आगाह किया. इसके बाद मैंने देखा कि कुछ युवक ईंटें तोड़ रहे थे और पत्थरबाज़ी पर उतर आए थे. अचानक, काउंटिंग सेंटर के बाहर का वह इलाका, जो कुछ देर पहले तक वीरान सा दिख रहा था, एक वॉर-ज़ोन में तब्दील हो गया.

बीजेपी कार्यकर्ताओं ने टीएमसी के लोगों पर अपने कार्यकर्ताओं के साथ हाथापाई करने का आरोप लगाया. उनका कहना था कि उनके कार्यकर्ता तो बस अपनी जीत का जश्न मना रहे थे. अर्धसैनिक बलों के जवानों को बुलाया गया. टीएमसी कार्यकर्ताओं को उनके कैंप के अंदर धकेल दिया गया और बीजेपी समर्थकों को वहां से हट जाने के लिए कहा गया. हालांकि, कोलकाता के आस-पास मौजूद टीएमसी के कई कैंप और अधिकारी इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से बच नहीं पाए. यह वही कल्चर है, जिसे पश्चिम बंगाल ने ‘वामपंथियों’ के वर्चस्व वाले दिनों से ही देखा और भोगा है.
इस बीच, भवानीपुर काउंटिंग सेंटर पर पश्चिम बंगाल का भविष्य लिखा जा रहा था. कोलकाता की सड़कें, जो 2011 से काउंटिंग के दिन दोपहर बाद तक हरे रंग में रंग जाती थीं, वे सब भगवा रंग में रंगी हुई थीं. बीजेपी समर्थक पहले से ही अपने कमांडर के लिए नारे लगा रहे थे, जिन्होंने सीएम ममता बनर्जी को दो बार सीधे-सीधे चुनौती दी थी. ‘जय श्री राम’ के नारों ने कोलकाता की सड़कों पर कब्ज़ा कर लिया था. और ‘जय बांग्ला’ के नारे लगाने वाले कार्यकर्ता अचानक हवा में गायब हो गए थे.

बीजेपी कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि निवर्तमान सीएम ममता बनर्जी के खिलाफ दो सफल अभियानों के लिए सुवेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. कई लोगों ने बंगाल में दो-तिहाई बहुमत के साथ बीजेपी की जीत का क्रेडिट उन्हें ही दिया. टीएमसी ने सत्ता-विरोधी लहर और युवा मतदाताओं से दूरी को कम करके आंका.

तृणमूल कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों ने मुझे बताया था कि वे करीब 180 सीटों के साथ सत्ता में वापसी कर रहे हैं. पार्टी के दूसरे गुट ने इससे भी ज़्यादा सीटों का दावा किया था, लगभग 200 सीटें. जब उनसे सत्ता-विरोधी लहर के असर के बारे में पूछा गया, तो टीएमसी के एक सीनियर लीडर ने इसका जवाब देते हुए कहा, “2024 के लोकसभा चुनावों में करीब 100 विधानसभा क्षेत्रों में टीएमसी की बढ़त 20 हजार वोटों से ज़्यादा थी. और यह तब था जब बीजेपी प्रधानमंत्री के नाम पर वोट मांग रही थी.”
लेकिन, वोटरों में जो आम निराशा थी, वह अब अंदर तक बैठ चुकी थी. वोटिंग के दोनों दिनों में मुझे ऐसे वोटर मिले जो ‘उन्नयन’ (विकास) की ज़रूरत के बारे में बात कर रहे थे, उन्हें नौकरियां चाहिए थीं, न कि कोई आर्थिक मदद. टीएमसी ने आरजी कर रेप-मर्डर की भयानक घटना के असर को कम करके दिखाने की भी कोशिश की. वहीं, बीजेपी ने पीड़ित की मां रत्ना देबनाथ को चुनाव में उतारा और महिला वोटरों का ध्रुवीकरण किया. नतीजों को देखकर शायद टीएमसी के कुछ नेताओं को अपनी गलती का एहसास हो गया होगा.

खास बात यह है कि पश्चिम बंगाल में युवा वोटर अब ममता बनर्जी की लीडरशिप से खुद को जोड़ नहीं पा रहे थे. टीएमसी के ही एक गुट ने इस बात को माना भी. “हमें यह एहसास हो गया है कि ‘दीदी’ अब युवा वोटरों का ध्यान अपनी तरफ खींच पाने में नाकाम रही हैं. उनकी सियासी बातें कभी-कभी युवा पीढ़ी को रास नहीं आतीं. इसीलिए, आजकल कुछ खास मुद्दों पर अभिषेक बनर्जी खुद कमान संभाल रहे हैं.”
लेकिन, शायद यह एहसास बहुत देर से हुआ. बीजेपी ने अब अपना सबसे बड़ा मिशन पूरा कर लिया है यानी उस सूबे को जीत लेना, जहां उसके संस्थापक का जन्म हुआ था.

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *