13 हजार हमलों के बाद 21 घंटे की बातचीत भी बेनतीजा, वेंस की वापसी के बाद ट्रंप के पास क्या विकल्प?

दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि क्या अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग अब रुक जाएगी? लेकिन खबर अच्छी नहीं है. अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरान के बीच करीब 21 घंटे तक मैराथन बातचीत चली, लेकिन नतीजा निकला शून्य. अमेरिका को लग रहा था कि भीषण बमबारी और 13 हाजर ठिकानों को तबाह करने के बाद ईरान बात मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. वेंस इस्लाबाद से खाली हाथ वापस लौट आए हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब आगे क्या? क्या फिर से बम बरसेंगे या बातचीत का कोई और रास्ता निकलेगा?

असल में सारा मामला वहीं आकर अटक गया है जहां फरवरी में अटका था. वेंस ने ईरान के सामने साफ कह दिया कि यह हमारा आखिरी ऑफर है, इसे मानो या छोड़ दो. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपना परमाणु प्रोग्राम हमेशा के लिए बंद कर दे. लेकिन ईरान ने दो टूक कह दिया कि उन्हें यह मंजूर नहीं है. वेंस ने पत्रकारों से कहा, हमने अपनी लक्ष्मण रेखा (Red Lines) साफ कर दी थी, लेकिन उन्होंने हमारी शर्तें मानने से इनकार कर दिया.
इस बातचीत के फेल होने के बाद अब ट्रंप प्रशासन के सामने बहुत ही कम विकल्प बचे हैं. ट्रंप ने फिलहाल फ्लोरिडा में एक फाइटिंग चैंपियनशिप मैच (UFC) देखने गए हुए हैं और वहीं से वे बताएंगे कि अमेरिका का अगला कदम क्या होगा. ट्रंप को लगता था कि 38 दिनों की भीषण बमबारी और 13 हजार ठिकानों को तबाह करने के बाद ईरान डर जाएगा और उनकी बात मान लेगा, लेकिन ईरान ने साफ कर दिया कि चाहे कितना भी बारूद क्यों न बरस जाए, वो झुकने वाला नहीं हैं.

साख और संकट के बीच फंसे ट्रंप
अब ट्रंप के सामने जो रास्ते हैं, वे बड़े पेचीदा हैं. एक रास्ता है कि वे ईरान के साथ फिर से वैसी ही लंबी बातचीत शुरू करें जैसी ओबामा के दौर में हुई थी. आपको बता दें कि उस समय एक डील होने में पूरे 2 साल लग गए थे. ट्रंप को ऐसी लंबी बातें पसंद नहीं हैं, उन्हें लगता है कि वे यह जंग जीत चुके हैं और ईरान को बस उनके सामने घुटने टेक देने चाहिए. लेकिन हकीकत यह है कि 38 दिन की जंग ने ईरान के इरादों को और मजबूत कर दिया है. ईरान का कहना है कि उन्होंने अपने बड़े बुजुर्गों और देशवासियों को इस जंग में खोया है, इसलिए अब वे अपने हक से पीछे नहीं हटेंगे.
दूसरा बड़ा खतरा तेल और महंगाई का है. दुनिया के कुल तेल का 20% हिस्सा जहां से गुजरता है, उस होर्मुज की खाड़ी पर अब ईरान ने अपनी पकड़ मजबूत करने की ठान ली है. युद्ध की वजह से पहले ही पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं, खाद से लेकर कंप्यूटर चिप बनाने वाली गैस तक की कमी हो गई है. अगर ट्रंप फिर से हमला शुरू करते हैं, तो शेयर बाजार गिर जाएगा और महंगाई इतनी बढ़ जाएगी कि आम जनता का जीना मुश्किल हो जाएगा.

सबसे बड़ी टेंशन की तारीख है 21 अप्रैल. इसी दिन दो हफ्ते का युद्ध विराम खत्म हो रहा है. ईरान चाहता है कि अमेरिका उस पर लगे पुराने प्रतिबंध हटाए और युद्ध में हुए नुकसान का हर्जाना दे. अमेरिका हर्जाना देने को तैयार नहीं है और प्रतिबंध भी धीरे-धीरे हटाना चाहता है. यानी दोनों तरफ से कोई भी झुकने को तैयार नहीं है. अमेरिका को लगता है कि उसने बम गिराकर अपनी ताकत दिखा दी, तो ईरान को लगता है कि वह इतने हमलों के बाद भी बच गया, तो वह असली सिकंदर है. अब देखना होगा कि 21 अप्रैल के बाद मिसाइलें चलती हैं या फिर से बातचीत की मेज सजती है.
अल्पसंख्यक नेतृत्व के एकीकरण को लेकर कांग्रेस में तनाव बढ़ गया है. कहा जा रहा है कि पार्टी हाईकमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के करीबी नेताओं की पार्टी विरोधी गतिविधियों से नाराज है. ऐसे में इन नेताओं पर पार्टी आलाकमान जल्द कोई एक्शन भी ले सकता है.
हाल ही में अल्पसंख्यक कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष ने इस्तीफा दिया था. अब मुख्यमंत्री के राजनीतिक सचिव नजीर अहमद को पद छोड़ने के लिए कहा गया है. शनिवार को सिद्धामैया और हाईकमान के बीच देर रात तक कई दौर की बातचीत हुई.   हाईकमान ने निर्देश दिया है कि दावणगेरे दक्षिण में पार्टी के खिलाफ काम करने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए. सिद्धारमैया के करीबी सहयोगी और पूर्व जद(एस) नेता जमीर अहमद खान भी इस जांच के घेरे में आ गए हैं. 
इंटेलिजेंस विंग और AICC सचिव अभिषेक दत्त की दो अलग-अलग रिपोर्टों में जब्बार, नजीर अहमद और जमीर को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल पाया गया. उनपर आरोप हैं कि उन्होंने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों का समर्थन किया. इसके साथ ही उनके कंपेन के लिए फंडिंग की और चुनाव में भी मदद की.

वित्तीय रूप से SDPI की मदद
पार्टी को शक है कि इनमें से कुछ नेताओं ने वित्तीय रूप से SDPI की मदद की होगी, जो कांग्रेस के लिए किसी बड़ी राजनीतिक चुनौती से कम नहीं है. इंटेलिजेंस इनपुट्स ने दावणगेरे दक्षिण में एक SDPI उम्मीदवार के समर्थन से जुड़े वित्तीय लेनदेन को ट्रैक किया है.

तीनों नेताओं ने एक अल्पसंख्यक उम्मीदवार, सादिक पहलवान के लिए भी पुरजोर दबाव बनाया था. इसके बाद सिद्धारमैया को आंतरिक असंतोष को शांत करने के लिए सेकेंड लाइन मुस्लिम नेताओं रिजवान अरशद और सलीम अहमद को आगे लाना पड़ा.
जब्बार और नजीर अहमद के खिलाफ कार्रवाई करने के बाद, सीएम अब जमीर अहमद खान को कैबिनेट से हटाने पर विचार कर रहे हैं. 

Loading

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *