नई दिल्ली: कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां देश में बैलेट पेपर से चुनाव कराने की वकालत करती रहती हैं. कांग्रेस इससे दो कदम आगे निकलते हुए EVM वोटिंग पर लगातार सवाल खड़ा कर रही है. लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी खुद कई बार चुनाव आयोग पर ‘वोट चोरी’ जैसे आरोप लगा चुके हैं. इसी कड़ी में हाल ही में कर्नाटक कैबिनेट ने आगामी पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर और बैलेट बॉक्स से वोटिंग को मंजूरी दी थी. हालांकि कर्नाटक कांग्रेस में ही इसका विरोध होने लगा था. वहीं अब झारखंड के निकाय चुनाव में बैलेट पेपर से चुनाव हुए हैं और रिजल्ट ने कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया है. हालांकि झारखंड का निकाय चुनाव दलिय नहीं था लेकिन यहां पार्टियों ने प्रत्याशियों को समर्थन दिया था. इस हिसाब से समीकरण लगाएं तो यहां भी 48 सीटों में भाजपा समर्थित 12 प्रत्याशियों ने जीत हासिल की है. वहीं कांग्रेस समर्थित दो प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की. रिजल्ट से साफ है कि बैलेट पेपर में भी कांग्रेस मुकाबले में नहीं रही. तो ऐसे में सवाल उठने लगना है कि क्या अब कर्नाटक में सिद्दारमैया सरकार अपना फैसला बदलेगी.
बता दें कि झारखंड के नगर निकाय चुनाव भले ही गैर-दलीय थे, लेकिन राजनीतिक दलों के समर्थन से मैदान में उतरे उम्मीदवारों के परिणामों ने बड़ा सियासी संदेश दिया है. बैलेट पेपर के जरिए मतदान होने के बावजूद भाजपा समर्थित उम्मीदवारों का प्रदर्शन मजबूत रहा, जबकि कांग्रेस और सहयोगी दल पीछे रह गए. ऐसे में अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या कर्नाटक की सिद्दारमैया सरकार पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर लागू करने के अपने फैसले पर दोबारा विचार करेगी.
झारखंड रिजल्ट का क्या होगा असर
• झारखंड निकाय चुनाव के नतीजों में भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने 48 में से 12 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि झामुमो समर्थित उम्मीदवार छह और कांग्रेस समर्थित केवल दो सीटों पर जीत सके. इन परिणामों ने उस राजनीतिक नैरेटिव को चुनौती दी है इसमें EVM को भाजपा की जीत का कारण बताया जाता रहा है. बैलेट पेपर से चुनाव होने के बावजूद विपक्ष अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाया, इससे चुनावी रणनीति और दावों पर बहस शुरू हो गई है.
• कर्नाटक सरकार ने पंचायत चुनाव बैलेट पेपर से कराने का फैसला EVM की पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच लिया था. ग्रामीण विकास एवं पंचायत राज मंत्री प्रियांक खड़गे ने बताया कि कर्नाटक ग्राम स्वराज (संशोधन) विधेयक 2026 को बजट सत्र में पेश किया जाएगा. सरकार का दावा है कि इससे मतदान और मतगणना प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनेगी, लेकिन पार्टी के भीतर ही इस फैसले को लेकर असहमति सामने आने लगी है.
झारखंड चुनाव परिणाम इतने अहम क्यों माने जा रहे हैं?
क्योंकि यह चुनाव बैलेट पेपर से कराए गए थे और लंबे समय से विपक्ष EVM पर सवाल उठाता रहा है. ऐसे में बैलेट पेपर के बावजूद विपक्षी दलों का कमजोर प्रदर्शन राजनीतिक बहस को नया आयाम देता है. इससे यह तर्क कमजोर हुआ है कि हार का कारण केवल EVM हो सकती है.
कर्नाटक सरकार बैलेट पेपर क्यों लागू करना चाहती है?
राज्य सरकार का कहना है कि जनता के बीच EVM की विश्वसनीयता को लेकर शंकाएं बढ़ी हैं. इसलिए पंचायत चुनावों में बैलेट पेपर अपनाकर पारदर्शिता बढ़ाने और भरोसा मजबूत करने की कोशिश की जा रही है. सरकार इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक सहभागी बनाने का कदम बता रही है.
कांग्रेस के भीतर विरोध क्यों हो रहा है?
पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि बैलेट पेपर सिस्टम चुनावी प्रक्रिया को पीछे ले जा सकता है. उनका तर्क है कि इससे मतगणना में देरी, विवाद और संभावित हेरफेर की पुरानी समस्याएं फिर सामने आ सकती हैं. इसी वजह से पार्टी के भीतर मतभेद दिख रहे हैं.
चुनाव आयोग का इस पर क्या रुख है?
चुनाव आयोग का कहना है कि वह एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और चुनाव किस प्रणाली से कराए जाएं, इसका निर्णय परिस्थितियों के अनुसार लिया जाता है. आयोग के मुताबिक बैलेट पेपर अभी भी कई विकसित देशों में इस्तेमाल होने वाली मान्य प्रणाली है.
बैलेट बनाम EVM: आगे क्या होगी सियासत?
झारखंड के नतीजों के बाद अब राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है. एक ओर विपक्ष चुनावी पारदर्शिता की बात कर रहा है तो दूसरी ओर परिणाम यह संकेत दे रहे हैं कि चुनावी जीत-हार केवल मतदान प्रणाली पर निर्भर नहीं होती. ऐसे में कर्नाटक सरकार के सामने अब राजनीतिक और व्यावहारिक दोनों तरह की चुनौती खड़ी हो गई है कि वह अपने फैसले पर कायम रहती है या नई परिस्थितियों के अनुसार बदलाव करती है.
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