नई दिल्लीः भारत-अमेरिका के बीच रोज-ब-रोज तल्खी बढ़ती जा रही है। यह तनाव पाकिस्तान के साथ सीजफायर को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बड़बोलेपन से शुरू होकर टैरिफ वॉर से होते हुए भारत की जाति व्यवस्था तक पहुंच चुका है। कुछ भारतीय विश्लेषकों का तो यहां तक मानना है कि अमेरिका भारतीय अवाम को सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश कर रहा है। व्हाइट हाउस के ट्रेड एडवाइजर पीटर नवारो ने रूस से कच्चा तेल खरीदने के मसले में जाति का उल्लेख किया, जो खतरे की घंटी है। याद कीजिए बांग्लादेश में अमेरिकी हस्तक्षेप से भारत के पड़ोसी देश में अराजकता फैल गई है।
भारत में अशांति पैदा करने की कोशिश?
इंडिया टुडे में लिखे एक लेख में इस बात की तरफ इशारा किया गया है कि नोबेल पुरस्कार के लिए भारत की तरफ से ट्रंप का नाम नहीं लिए जाने की वजह से अमेरिका कहीं बांग्लादेश की तरह भारत में भी अशांति पैदा करने की कोशिश तो नहीं कर रहा। पीटर नवारो ने फॉक्स न्यूज को दिए इंटरव्यू में सीधे कहा है कि ‘ब्राह्मण’ भारतीय जनता की कीमत पर मुनाफाखोरी कर रहे हैं और इसे ‘रोकने’ की जरूरत है।गौरतलब है कि सरकारें नीतिगत मामलों पर आपस में बात करती हैं। लेकिन एक सीनियर अफसर भारत के लोगों को संबोधित कर रहा है, सरकार को नहीं। यह ट्रंप प्रशासन की गलत मंशा को दिखाता है। भारत के लोगों को सीधे संबोधित करके, ट्रंप प्रशासन भारत में लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमजोर कर रहा है।
अमेरिका से रिश्ते बेहतर बनाने की कोशिश
भारतीय नेताओं मसलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ने भारत-अमेरिका संबंधों को बेहतर बनाने के लिए काम किया है। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में जो शुरू हुआ, उसे मनमोहन सिंह ने आगे बढ़ाया। उन्होंने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के लिए अपनी सरकार को खतरे में डाल दिया। मोदी ने 2019 में ‘अब की बार ट्रंप सरकार’ नारे के साथ ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के लिए समर्थन भी किया था।
ट्रंप प्रशासन आखिर किस बात से खफा है?
मगर ट्रंप प्रशासन हर हफ्ते भारत के खिलाफ तल्खी को हवा दे रहा है। इसकी असली वजह यह है कि भारत ने ट्रंप की नोबेल शांति पुरस्कार की उम्मीदों का समर्थन नहीं किया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहले पीएम मोदी को यह झूठा दावा करके कमजोर करने की कोशिश की कि उन्होंने मई में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराया था। फिर उनके प्रशासन ने रूस-यूक्रेन संघर्ष को ‘मोदी का युद्ध’ बताकर सरकार और लोगों के बीच फूट डालने की कोशिश की।
…खामियाजा भारतीयों को भुगतना पड़ रहा
ट्रंप प्रशासन ने रूसी कच्चे तेल के साथ व्यापार करने पर दंडात्मक शुल्क और जुर्माना लगाया। अमेरिकी सरकार की कार्रवाइयों का खामियाजा भारतीयों को भुगतना पड़ रहा है, जिससे ‘भारत के कुछ अमीर परिवारों’ को फायदा हो रहा है। ट्रंप और उनके साथियों ने जाति और वर्ग को लाकर इसे और भी बदतर बना दिया है, और भारतीयों को सीधे संबोधित कर रहे हैं।
अमेरिकी टैरिफ का रूसी तेल से कोई लेना-देना नहीं
न्यूयॉर्क टाइम्स ने सार्वजनिक रूप से पुष्टि की है कि भारत पर लगाए गए 50% के रिकॉर्ड- टैरिफ का रूसी तेल से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि इसका कारण भारत द्वारा ट्रंप के झूठ का पर्दाफाश करना है। ट्रंप और उनकी कैबिनेट खुले तौर पर उनके लिए नोबेल शांति पुरस्कार की पैरवी कर रहे हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच मई में युद्धविराम कराने का उनका दावा उस पुरस्कार के लिए मुख्य आधार होता। पीएम मोदी उन झूठों का समर्थन करने से दूर रहे, लेकिन पाकिस्तान ने “डैडी” के नोबेल के सपनों का समर्थन किया। भारत पर 50% शुल्क लगाया गया है; पाकिस्तान 19% के साथ बच गया है।
अमेरिका का अराजकता फैलाने का इतिहास
अमेरिका का देशों में अराजकता फैलाने का इतिहास रहा है। अफ्रीका से लेकर मध्य पूर्व तक और भारत के पिछवाड़े तक, CIA के शासन परिवर्तन में हस्तक्षेप के उदाहरण कोई रहस्य नहीं हैं। ट्रंप पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर को देश के नागरिक नेतृत्व के खिलाफ बढ़ावा दे रहे हैं, जबकि अमेरिका ने बांग्लादेश में शेख हसीना विरोधी आंदोलन को हवा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि उसने उन्हें भारत समर्थक और डीसी के रणनीतिक हितों के लिए हानिकारक माना। अब, बांग्लादेश पूरी तरह से अराजकता में डूब गया है, अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं और राजनीतिक हिंसा जारी है जिसके कारण दर्जनों मौतें हो रही हैं।
भारतीयों को सावधान रहने की जरूरत?
अमेरिका का उन राजनीतिक प्रतिष्ठानों को कमजोर करने की कोशिश करने का इतिहास रहा है जो झुकने से इनकार करते हैं। मोदी सरकार ने ट्रंप के दावों को खारिज करके अमेरिका का विरोध किया है। जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ने व्यक्तिगत रूप से लिया है। नवारो का बयान एक खतरनाक पैटर्न की तरफ इशारा है कि अमेरिका भारत में आंतरिक विभाजन पैदा करने की कोशिश कर रहा है। भारतीयों को सावधान रहने की जरूरत है।
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