जज साहब का फैसला ही नहीं पलटा जांच भी बिठा दी गई, क्यों इस कदर नाराज हुआ MP हाई

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भूमि संबंधी मुआवजा मामले में लोअर कोर्ट के आदेश को रहस्यमयी करार दिया। कोर्ट ने आदेश पारित करने वाले जज के खिलाफ रिपोर्ट मांगा है। साथ ही निर्देश दिया कि उक्त जज द्वारा पिछले 5 सालों में विभिन्न पदों पर रहते संभाली गई फाइलों का निरीक्षण तीन महीने में किया जाए।

हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक अग्रवाल ने जिला जज (निरीक्षण) को सिंगरौली जिले के देवसर में पदस्थ चतुर्थ जिला जज दिनेश कुमार शर्मा पर 90 दिनों के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पिछले पांच सालों में विभिन्न पदों पर रहते हुए शर्मा द्वारा संभाली गई फाइलों का निरीक्षण तीन महीने में किया जाए।

जस्टिस अग्रवाल ने कहा कि विद्वान चतुर्थ जिला जज (भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार) अधिनियम की धारा 64 में निहित प्रावधान को पढ़ने में विफल रहे हैं। उन्होंने एक रहस्यमयी आदेश पारित किया है। उन्होंने गुरुवार को अदालत के आदेश में कहा कि यदि चतुर्थ जिला जज ने 2013 के अधिनियम की धारा 64 के तहत प्रावधानों को पढ़ने का प्रयास किया होता तो ऐसा रहस्यमयी आदेश पारित नहीं किया जाता।
हाई कोर्ट ने कहा, “इसके अनुसार 3 अगस्त 2024 का विवादित आदेश, जो कि रहस्यमय है, रद्द किया जाता है। मामले को संबंधित जिला जज को 30 दिनों की अवधि के भीतर आवेदन पर अपने गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने के लिए भेजा जाता है। सिंगरौली जिले के गोडवाली गांव के निवासी मंगल शरण के स्वामित्व वाली 0.01 हेक्टेयर भूमि का एक टुकड़ा ललितपुर-सिंगरौली रेल लाइन परियोजना के लिए अधिग्रहित किया गया था।
याचिकाकर्ता शरण के वकील नित्यानंद मिश्रा ने पीटीआई को बताया कि याचिकाकर्ता इस बात से दुखी हैं कि अधिकारियों ने मुआवजे के लिए जमीन पर विचार किया, लेकिन उस पर बने घर पर नहीं। नियमों के अनुसार, याचिकाकर्ता ने सिंगरौली कलेक्टर के समक्ष एक आवेदन दायर कर घर के लिए भी मुआवजा मांगा, लेकिन अधिकारी ने कोई कार्रवाई नहीं की।

वकील ने बताया कि इसके बाद याचिकाकर्ता ने राहत के लिए जिला न्यायाधीश की अदालत का रुख किया। मिश्रा ने बताया कि 3 अगस्त 2024 को न्यायाधीश शर्मा ने याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज कर दी, जिसके बाद उसने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी।

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