‘मैं यह नहीं कर रहा कि यह अच्छा है या बुरा… मैं बस यह अनुमान लगा रहा हूं कि क्या होने वाला है और मुझे लगता है कि आने वाले समय में कुछ बड़ा होने वाला है.’ यह कहना है भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर का. जयशंकर पिछले हफ्ते म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के बाद दिल्ली स्थित थिंकटैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की तरफ से आयोजित एक चर्चा में बोल रहे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा के कुछ ही दिन बाद जयशंकर ने अगले 2 सालों में होने वाले कुछ बदलावों की एक साफ तस्वीर पेश की.
विदेश मंत्री की इन बातों से तो यही लगता है कि भारत पूरी दुनिया में चीन के बढ़ते दबदबे और आक्रामकता को कम करने के लिए एक व्यापक सहमति बनाने की कोशिश कर रहा है, उन्होंने कहा, ‘नियमों पर आधारित व्यवस्था हो या बहुपक्षीय संगठन, चीन इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा उठा रहा है. इस बात पर हम सब सहमत हैं. हम ये भी कहते हैं कि हमें इसकी काट करनी चाहिए, क्योंकि दूसरा विकल्प और भी बुरा है. लेकिन मैं सोच रहा हूं कि आखिर करें तो क्या करें.’
चीन का दबदबा कैसे होगा कम?
एशिया में चीन के दबदबे को कम करने का एक तरीका तो यही है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दी जाए. भारत दशकों से इसके लिए प्रयास कर रहा है, लेकिन चीन लगातार इसमें अड़ंगा लगाता रहा है. UNSC के पांच में से चार स्थायी सदस्य भारत की दावेदारी का समर्थन कर चुके हैं. अगर ऐसा होता है तो एशिया में चीन के दबदबे को कम करने में मदद मिलेगी.
लेकिन जब तक ऐसा होता है, भारत QUAD को और अधिक सक्रिय देखना चाहेगा. यह क्वाड ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका का एक कूटनीतिक और सैन्य समूह है, जिसका मुख्य मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव और आक्रामकता को रोकना है.
70 वर्षीय जयशंकर ने कहा, ‘मुझे ये देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि इस सरकार (डोनाल्ड ट्रंप) ने अपनी पहली विदेश नीति की शुरुआत क्वाड के साथ की.’ उन्होंने कहा, ‘क्वाड की सबसे अच्छी बात क्या है? इसमें किसी तरह का कोई खर्चा नहीं है… हर कोई आता है, अपना बिल भरता है, सब बराबर हैं. अगर हम एक अलग तरह की संरचना, अमेरिका की शक्ति के एक अलग अर्थ को देख रहे हैं.’
नाटो और क्वाड में फर्क
जयशंकर यहां शायद उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के मॉडल से इसकी तुलना कर रहे थे. NATO यूरोप और उत्तरी अमेरिका के 32 देशों का एक सैन्य गठबंधन है, जिसका दो-तिहाई वार्षिक बजट अमेरिका ही देता है.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप NATO के सालाना बजट का एक बड़ा हिस्सा अमेरिका की तरफ दिए जाने की नीति के कटु आलोचक रहे हैं. नाटो के सदस्य देशों में शामिल जर्मनी और पोलैंड जैसे देशों ने अपने रक्षा खर्च में वृद्धि की है, वहीं कई अन्य यूरोपीय देशों ने सकल घरेलू उत्पाद का न्यूनतम 2% भी नहीं दिया है, जो कि 2019 में हुए नए लागत-साझाकरण फॉर्मूला के अनुसार सैन्य गठबंधन द्वारा अनिवार्य किया गया था.
क्वाड पर फोकस बढ़ाएंगे ट्रंप!
जयशंकर के अनुसार, अमेरिका में प्रभावशाली समूहों के बीच यह आम राय बनती जा रही है कि अगर अमेरिका अपनी विदेशी प्रतिबद्धताओं और रिश्तों से खुद को मुक्त कर ले तो उसके हित में ही होगा. इसलिए, जयशंकर का उदाहरण शायद यह संकेत दे रहा है कि चीन के प्रति आक्रामक रुख रखने वाले ट्रम्प, QUAD पर अपना ध्यान बढ़ा सकते हैं, जो कि अमेरिका में जो बाइडन प्रशासन के तहत थोड़ा ठहरा हुआ था.
पिछले हफ्ते अपनी मुलाकात में ट्रंप और मोदी ने 2035 तक के लिए एक नई रक्षा साझेदारी रूपरेखा बनाने पर भी सहमति व्यक्त की. इस समझौते को इस साल के अंत तक अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है. जहां एक तरफ दोनों देश टैरिफ के पेचीदा मुद्दे पर बातचीत कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ चीन की बढ़ती ताकत दोनों देशों के लिए एक साझा चिंता का विषय है. इसीलिए भारत और अमेरिका को वैश्विक मंच पर एक साथ आने की जरूरत है.
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