आप अगर कभी प्रयागराज संगम आए होंगे, तो देखा होगा कि गंगा तीन धारों से होकर संगम तक पहुंचती है। गंगा के बीच में ही टापू बन जाते हैं। अब तक इसका कोई इस्तेमाल नहीं हो पाता था, लेकिन इस कुंभ में सिंचाई विभाग ने IIT गुवाहाटी की मदद ली। सर्वे हुआ, समुद्र में खुदाई करने वाली मशीनों से इसे हटाया गया और गंगा की धारा को एक कर दिया गया।
न सिर्फ धारा एक हुई, बल्कि मेले का क्षेत्र भी बढ़ गया। करीब 87 बीघा जमीन पहले डूबी रहती थी। इस बार मेले के लिए यूज की जाएगी। यह मेले की सबसे प्राइम जगह होगी। यह सब कुछ कैसे हुआ? कितना वक्त लगा? क्या चुनौती आई? इन सारे सवालों का जवाब
जहां पहले गंगा जी वहां अब सपाट मैदान हम प्रयागराज के सिविल लाइंस से कुंभ मेला क्षेत्र के लिए निकले। परेड ग्राउंड से होते हुए आगे बढ़े। संगम एरिया में प्रवेश करते ही पहले बाईं तरफ गंगा नदी नजर आ जाती थी, लेकिन इस बार करीब 500 मीटर तक खाली मैदान नजर आ रहा। इस पर मेला प्रशासन बालू को व्यवस्थित करके मेले का विस्तार कर रहा है। हम आगे बढ़े। देखा, एक ड्रेजर मशीन नदी के बीच टापू बने हिस्से को काटकर बाहर फेंक रही थी।


हम कटर ड्रेजर मशीन के पास पहुंचे। इसे चला रहे रवि चौहान से बात की। रवि कहते हैं- यहां से पहले हम गुजरात, केरल, ओडिशा, बंगाल जैसी जगहों पर समुद्र में काम करते थे। वहां जब कोई जहाज फंस जाता, तो निकालने के लिए इसी ड्रेजर मशीन से जगह बनानी होती थी। वहां हमें 5 से 10 मीटर तक का स्पेस बनाना होता था, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। यहां हमें गंगा की 3 धाराओं को एक करना था। बीच में जो टापू है, उसे हटाना है। यहां गहराई से कोई मतलब नहीं।
हमने रवि से पूछा कि एक घंटे में कितनी बालू निकाल लेते हैं? वह कहते हैं कि यह नीचे पड़ी मिट्टी के हार्ड या सॉफ्ट होने पर डिपेंड करता है। एक घंटे में 3 ट्रक मिट्टी तो आराम से निकल जाती है। यहां एक समस्या यह है कि गंगा नदी में पानी की धारा बहुत तेज है। जैसे ही हमारा ड्रेजर अंदर की बालू निकालकर बाहर फेंक रहा, वैसे ही आसपास की बालू उसमें समा जा रही है। इससे मुश्किल तो आती है, लेकिन हमने गंगा नदी की धारा का एक चैनल बना दिया है।
6 करोड़ रुपए का बजट लगा गंगा नदी में धार की वजह से बने यह टापू प्रशासन के लिए चुनौती थे। कुंभ तो गंगा की तराई में ही लगता है, लेकिन गंगा के बीच जो स्थान टापू बन जाते हैं, उनका उपयोग नहीं हो पाता। डर रहता है कि कहीं नदी में पानी का जलस्तर बढ़ा तो कोई अनहोनी न हो जाए। साथ ही वहां तक पहुंचने की भी एक चुनौती होती है। IIT, गुवाहाटी की एक टीम ने सर्वे करने के बाद एक प्रोजेक्ट सिंचाई विभाग के सामने रखा। सिंचाई विभाग ने इस भागीरथ प्रोजेक्ट को स्वीकार कर लिया।

1 अक्टूबर, 2024 से गंगा में 3 ड्रेजर मशीनें लग जानी थीं, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 15 अक्टूबर से काम शुरू हो गया। 3 बड़ी कटर ड्रेजर मशीन झूंसी पुल के नीचे टापू बने हिस्से को काटने के लिए लगा दी गईं। कुछ वक्त के बाद चौथी ड्रेजर मशीन भी लगा दी गई। सिंचाई विभाग के अधिकारी लगातार इसकी निगरानी में लगे रहे।
ड्रेजर मशीन के सुपरवाइजर विकास कुमार ऑफ कैमरा बताते हैं- यहां नदी की धारा तेज है। हमने कांटे वाले एंकर नदी में डाले, जिससे मशीन नदी में स्थिर हुई। हमने कहा कि जहां आपने नदी से बालू निकाली, वहां फिर से टीले बन गए। विकास कहते हैं- नदी की धारा इतनी तेज है कि वह यहां अचानक अपना रूप बदल देती है। इसकी वजह से दूसरी साइड थोड़ा-बहुत टापू बन गई है। हालांकि जब पानी थोड़ा भी बढ़ेगा तो वह टापू हट जाएगा।
गंगा के दूसरी तरफ भी एक मशीन लगी है। उसके इंचार्ज शुभम कुमार बताते हैं- शुरुआत में चुनौती बड़ी थी, क्योंकि जो टापू थे वह बेहद मजबूत थे। इसी के चलते एक ड्रेजर का स्पंड यानी समर्थन पिन खराब हो गया।
4 मशीनों में 600 लीटर तेल प्रति घंटा लग रहा इन मशीनों को हैंडल करने वालों से बात करने पर जो जानकारी मिली, उसके मुताबिक एक मशीन एक घंटे में करीब 100 लीटर डीजल की खपत करती है। जहां नदी में बहाव न हो और नीचे बालू मुलायम हो, वहां एक घंटे में 10 ट्रक तक बालू निकाली जा सकती है।
नदी के दोनों तरफ अब तक करीब 5 लाख मीट्रिक टन बालू निकालकर किनारे लगाई जा चुकी है। जेसीबी और ट्रैक्टर के जरिए यहां की जमीन को सपाट बनाया जा रहा है। बालू अधिक है, इसलिए ट्रक के जरिए यहां से दूसरी जगह भी भेजा जा रहा है।
जितना अनुमान था उससे ज्यादा जमीन रिक्लेम की इस पूरे प्रोजेक्ट और अब तक हुए काम की जानकारी के लिए हम संगम के पास ही मौजूद सिंचाई विभाग के ऑफिस पहुंचे। वहां के सारे अफसर फील्ड में थे। हमने फोन के जरिए असिस्टेंट इंजीनियर दिनेश त्रिपाठी से बात की। पूछा कि IIT गुवाहाटी के इस प्रोजेक्ट का कितना बजट था?
दिनेश कहते हैं, गंगा में घाट बनाने से लेकर कटान रोकने तक का कुल बजट 18-19 करोड़ का था। इसमें मैकेनिकल और सिविल दोनों शामिल थे। मैकेनिकल का काम ड्रेज करके मटेरियल उपलब्ध करवाना था। सिविल के जिम्मे उसे फैलाना था। जियो ट्यूब वगैरह लगाकर कटान को रोकना था।
IIT गुवाहाटी की टीम को लेकर वह कहते हैं, उनकी टीम ने फाफामऊ से लेकर छतनाग तक गंगा का सर्वे किया। फिर उन्होंने ही पूरे प्रोजेक्ट को रिकमेंड किया। इसके बाद सिंचाई विभाग ने काम शुरू किया। हमने 99% सफलता हासिल भी कर ली है। 1% जो बचा है, उसमें संगम नोज है उसे भी हम रिक्लेम करने में जल्द सफल हो जाएंगे। गुवाहाटी की टीम ने जितना अनुमान लगाया था, सिंचाई विभाग ने उससे भी ज्यादा रिक्लेम कर लिया है।
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