असम में बांग्लादेशी हिंदू को नहीं है CAA पर भरोसा, कहा- नागरिकता की लड़ाई लड़ते-लड़ते थक गया हूं

भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू हो चुका है. दावा किया जाता है कि यह कानून 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर यहां रहने वाले हजारों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाइयों को भारत की नागरिकता दिलाएगा, लेकिन असम के बराक घाटी के बीच स्थित सिलचर इलाके के अजीत दास की कहानी अलग है. उन्हें इस कानून पर इतना भरोसा नहीं है.

दरअसल, अजीत दास पिछले 10 साल से ही अपनी नागरिकता साबित करने की जंग लड़ रहे हैं. 2014 में उन्हें पहली बार नोटिस मिला कि उनकी नागरिकता की जांच चल रही है. तब से लेकर अब तक वह अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. तीन महीने तक वह पुलिस हिरासत में भी रहे. 2021 में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की ओर से उन्हें विदेशी घोषित कर दिया गया.

शरणार्थी प्रमाण पत्र को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ने किया खारिज

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दास का कहना है कि उनके पिता और दादा 1956 में पूर्वी पाकिस्तान से भागकर असम आ गए थे. उन्होंने असम के हैलाकांडी जिले के मोनाचेर्रा में एक शरणार्थी शिविर में कुछ महीने बिताए थे. यहां उन्हें शरणार्थी प्रमाणपत्र दिया गया, जो दास के पास उनके पिता का एकमात्र दस्तावेज था, लेकिन फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में 6 नंबर को हुई सुनवाई में इसे वैलिड नहीं माना गया और कहा कि सरकार के पास कोई संबंधित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है.

सीएए के तहत आवेदन करने से बच रहे हैं कई लोग

दास का कहना है कि उन्होंने सुना है कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू हो गई है और इससे उनके जैसे परिवारों को लाभ होगा, लेकिन अब वह थक चुके हैं. उन्होंने कहा, “मेरे दो बेटे हैं और मैं अपना नाम साफ करने के लिए बेताब हूं, क्योंकि अगर मैं ऐसा नहीं करूंगा तो यह बोझ उन पर पड़ जाएगा.”

दास ने फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ गुवाहटी हाई कोर्ट में अपील कर रखी है. वह कहते हैं कि 10 वर्षों के संघर्ष के बाद भी वह अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाए हैं. उनका मामला हाई कोर्ट में है. अब सीएए के तहत अप्लाई करने का मतलब है कि सबूतों का एक नया बोझ उठाना. उन्हें फिर से सबूत के जुगाड़ में जुटना पड़ेगा. इससे उनके पिछले मामले पर भी असर पड़ेगा.

सीएए का नियम क्या है?

सीएए में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को बांग्लादेश, अफगानिस्तान या पाकिस्तान का नागरिक साबित करने के लिए आवेदक को सीएए नियमों की अनुसूची 1ए के तहत कम से कम एक दस्तावेज़ की आवश्यकता होगी. इसमें पासपोर्ट, जन्म प्रमाण पत्र, शिक्षा प्रमाण पत्र, पहचान दस्तावेज, भूमि या किरायेदारी रिकॉर्ड या उस देश की सरकार का कोई ऐसा दस्तावेज जो साबित करे कि आवेदनकर्ता का वहां से कनेक्शन है. 

गर आवेदनकर्ता के पास अपना कोई कागज नहीं है तो वह अपने माता-पिता, दादा-दादी या परदादा में से किसी एक के कागज को दिखा सकता है, जिसमें उनकी नागरिकता उस देश की हो, लेकिन अजीत दास के साथ ऐसा नहीं है. वह यहीं पले और बढ़े हैं ऐसे में उनके पास बांग्लादेश का कोई कागज नहीं है. मेरे पास मेरे दादा का सिर्फ शरणार्थी पेपर है, जिसे खारिज किया जा चुका है.

नतीजों का करेंगे इंतजार, फिर चुनेंगे विकल्प

दास कहते हैं कि वह इंतजार करेंगे और नतीजों को देखने के बाद तय करेंगे कि कौन सा विकल्प चुना जाए. वह कहते हैं, “मैं इस बारे में बहुत स्पष्ट नहीं हूं कि अगला कदम क्या होना चाहिए. अच्छी बात यह है कि इसमें मैं अकेला नहीं हूं, एक ही नाव पर लाखों लोग सवार हैं. मैं कुछ लोगों के सीएए के तहत आवेदन करने का इंतजार करूंगा और देखूंगा कि उनका अनुभव क्या है. मेरा इस प्रक्रिया पर बहुत कम भरोसा बचा है.

पीएम मोदी से की है सीएए में इस पॉइंट पर संशोधन की मांग

ऑल असम बंगाली हिंदू असोसिएशन के अध्यक्ष बासुदेब शर्मा कहते हैं कि एक बार जब हमने नियमों का विश्लेषण किया, तो एक बात जो स्पष्ट हो गई वह यह है कि आवेदकों को पूर्वी पाकिस्तान या बांग्लादेश से एक दस्तावेज की आवश्यकता होगी और उन्हें अपने प्रवेश की तारीख बताना होगा, लेकिन यह सही नहीं है. यहां रह रहे लोग वो हैं जो बिना किसी तैयारी के भाग गए और किसी तरह भारत पहुंच गए. कोई भी प्लानिंग करके और अपने कागज लेकर यहां नहीं आया था. वह कहते हैं कि हमने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन भेजा है कि नियमों में संशोधन किया जाना चाहिए और बिना दस्तावेजों वाले लोगों से स्व-घोषणा पत्र पर्याप्त होना चाहिए.

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