दतिया में BJP का नया प्रयोग भी फ्लॉप… कांग्रेस की जीत से नेतृत्व पर उठे सवाल

मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को बड़ा झटका दिया है. 30 जुलाई को हुए मतदान के बाद सोमवार (3 अगस्त) को आए नतीजों में कांग्रेस के घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,056 वोटों से हरा दिया. यह सीट राजेंद्र भारती की सदस्यता रद्द होने के बाद खाली हुई थी. नतीजे आने के बाद अब बीजेपी की रणनीति, उम्मीदवार चयन और स्थानीय संगठन को लेकर सवाल उठने लगे हैं. वहीं, दतिया उपचुनाव में कांग्रेस से मिली हार के बाद मुख्यमंत्री मोहन यादव ने रिएक्शन दिया है. उन्होंने कहा कि बीजेपी जनता के फैसले का सम्मान करती है और आने वाले चुनावों में और मजबूती के साथ मैदान में उतरेगी.

दतिया उपचुनाव में घनश्याम सिंह ने शुरुआत से बढ़त बनाए रखी और मतगणना खत्म होने तक इसे कायम रखा. उन्होंने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,056 वोटों से हराकर जीत दर्ज की. इस जीत के साथ कांग्रेस ने उस सीट को अपने पास बरकरार रखा, जहां पहले भी उसका कब्जा था.
दतिया सीट पर मुकाबला इसलिए भी खास था, क्योंकि यह लंबे समय तक बीजेपी के मजबूत गढ़ों में गिनी जाती रही है. नतीजे आने के बाद बीजेपी के लिए यह हार सिर्फ एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि अपनी चुनावी रणनीति पर विचार करने का मौका बन गई है.

क्यों हुआ था उपचुनाव?

दतिया सीट पर उपचुनाव राजेंद्र भारती की विधानसभा सदस्यता रद्द होने के बाद कराया गया था. धोखाधड़ी के एक मामले में दिल्ली की अदालत से सजा मिलने के बाद उनकी विधायकी चली गई थी. इसके बाद खाली हुई सीट पर 30 जुलाई को मतदान हुआ. कांग्रेस ने इस बार भी घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा, जबकि बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा की जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया.
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने नरोत्तम मिश्रा को हराया था. इसके बाद उपचुनाव में बीजेपी ने अपने पुराने चेहरे पर भरोसा जताने के बजाय नया उम्मीदवार उतारा. पार्टी को उम्मीद थी कि आशुतोष तिवारी के जरिए वह सीट वापस हासिल कर लेगी, लेकिन नतीजा उसके पक्ष में नहीं आया.ऐसे में अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि क्या उम्मीदवार बदलने का फैसला बीजेपी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ. हालांकि, नरोत्तम मिश्रा ने चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में हिस्सा लिया था.

अपने मजबूत बूथ पर भी पीछे रही BJP

दतिया उपचुनाव में एक आंकड़े की काफी चर्चा हो रही है. नरोत्तम मिश्रा के बूथ नंबर-121 पर भी बीजेपी पीछे रही. यहां कांग्रेस को 291 वोट मिले, जबकि बीजेपी को 264 वोट मिले. इस नतीजे ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या बीजेपी अपने पुराने समर्थकों को पूरी तरह एकजुट नहीं कर पाई. चुनाव के नतीजे आने के बाद भीतरघात की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं. राजनीतिक विश्लेषक रिजवान अहमद सिद्दीकी का मानना है कि टिकट बदलना हार की एक बड़ी वजह रहा, वहीं बीजेपी ने अपने सबसे मजबूत स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा नहीं जताकर रणनीतिक गलती भी की. हालांकि, इस पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.

दतिया उपचुनाव को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व की बड़ी चुनावी परीक्षा माना जा रहा था. इससे पहले बीजेपी श्योपुर उपचुनाव भी हार चुकी है. ऐसे में लगातार दूसरे उपचुनाव में मिली हार ने पार्टी के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है. विपक्ष अब इन नतीजों को सरकार के खिलाफ माहौल के तौर पर पेश करने की कोशिश करेगा. कांग्रेस इस जीत को जनता के भरोसे का संकेत बता रही है, जबकि बीजेपी के सामने अब हार की वजहों की समीक्षा करने की चुनौती है.

लोकतंत्र में जनता का फैसला स्वीकार: सीएम मोहन यादव

भोपाल में दतिया उपचुनाव के नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए मोहन यादव ने कहा कि चुनाव लोकतंत्र का अहम हिस्सा हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपनी बात जनता के सामने रखी, अब जनता ने जो फैसला दिया है, उसे पार्टी स्वीकार करती है. उन्होंने कहा कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी को इस बार 1,700 वोट ज्यादा मिले हैं. साथ ही उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता का भरोसा ही सबसे महत्वपूर्ण होता है.
सीएम मोहन यादव ने बीजेपी के हालिया चुनावी प्रदर्शन का जिक्र करते हुए कहा कि विधानसभा चुनाव के बाद हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी ने मध्य प्रदेश की सभी 29 सीटों पर जीत दर्ज की थी. उन्होंने इसे बीजेपी के लिए बड़ी उपलब्धि बताया.

2028 के चुनाव से पहले बड़ा संदेश

दतिया का नतीजा भले ही विधानसभा के समीकरण नहीं बदलेगा, लेकिन राजनीतिक संदेश जरूर देगा. यह चुनाव दिखाता है कि किसी भी सीट पर सिर्फ पुराने रिकॉर्ड के भरोसे जीत तय नहीं होती. उम्मीदवार का चयन, स्थानीय समीकरण और कार्यकर्ताओं की सक्रियता चुनावी नतीजों में बड़ी भूमिका निभाते हैं.
2028 के विधानसभा चुनाव से पहले दतिया का फैसला दोनों दलों के लिए अहम संकेत माना जा रहा है. कांग्रेस इस जीत को अपने बढ़ते प्रभाव के तौर पर पेश करेगी, वहीं बीजेपी को अपनी रणनीति पर नए सिरे से काम करना होगा.

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