दुनिया तेजी से जलवायु संकट की ओर बढ़ रही है. अब गर्मी और सूखा अलग-अलग नहीं, बल्कि एक साथ मिलकर बहुत खतरनाक रूप ले रहे हैं. नई वैज्ञानिक स्टडी के अनुसार, अगर मौजूदा नीतियों में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ तो सदी के अंत तक दुनिया की करीब 28 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 260 करोड़ लोग इस दोहरे संकट की चपेट में आ जाएंगे. यह खतरा आज के मुकाबले पांच गुना ज्यादा हो जाएगा.
पिछले 20 सालों में गर्मी और सूखे की ऐसी घटनाएं पहले से दोगुनी हो चुकी हैं. 2001 से 2020 के बीच औसतन हर साल चार बार ऐसा हुआ जब तेज गर्मी और सूखा साथ आए. अगर यही स्थिति रही तो 2090 तक ये घटनाएं साल में 10 बार तक हो सकती हैं. हर बार कई हफ्तों तक चल सकती हैं. यह कोई साधारण मौसम की समस्या नहीं है, बल्कि लाखों-करोड़ों लोगों की जिंदगी, खेती और स्वास्थ्य पर सीधा हमला है.
कैसे बढ़ता है यह दोहरा खतरा?

गर्मी और सूखा एक-दूसरे को और मजबूत बनाते हैं. जब तेज गर्मी पड़ती है तो जमीन से नमी तेजी से सूख जाती है. इससे फसलें मुरझा जाती हैं. नदियां-तालाब सूखने लगते हैं. जंगल में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है. खाद्य कीमतें बढ़ती हैं. पानी की कमी हो जाती है. सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जो खुले में काम करते हैं – किसान, मजदूर और निर्माण कार्य करने वाले लोग. उनके लिए यह जीवन-मृत्यु का सवाल बन जाता है.
सबसे ज्यादा प्रभावित कौन होंगे?
इस संकट की सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो देश सबसे कम ग्रीनहाउस गैस छोड़ते हैं, वे ही सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. गरीब, उष्णकटिबंधीय देश और छोटे द्वीप राष्ट्र इस डबल अटैक से सबसे ज्यादा जूझेंगे. जहां अमीर देशों में एसी, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और पानी के वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध हैं. वहीं गरीब इलाकों में न तो ठंडक के साधन हैं और न ही पर्याप्त पानी. 2030 तक 6.6% आबादी प्रभावित होगी, जो 2090 तक बढ़कर 28% हो जाएगी.
स्टडी कैसे की गई?
वैज्ञानिकों ने 8 अलग-अलग जलवायु मॉडलों पर आधारित 152 सिमुलेशन का अध्ययन किया. उन्होंने गर्मी और सूखे की घटनाओं को उन दिनों के रूप में परिभाषित किया जब तापमान बहुत ऊंचा हो और साथ में कम से कम मध्यम सूखा भी हो. यह अध्ययन प्रतिष्ठित जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुआ है.
पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है. अगर दुनिया पेरिस समझौते जैसे जलवायु वादों को पूरी तरह लागू करे तो इस खतरे को काफी हद तक रोका जा सकता है. ऐसे में 2090 तक प्रभावित लोगों की संख्या घटकर 18% (लगभग 170 करोड़) रह सकती है. यानी सही नीतियां और कार्रवाई से करोड़ों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं.
गर्मी-सूखे का यह डबल अटैक अब सिर्फ पर्यावरण की समस्या नहीं रह गया है. यह खेती, पानी, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और असमानता से जुड़ा गहरा संकट है. अगर हम अभी ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाली पीढ़ियां बेहद कठिन और खतरनाक दुनिया में जीने को मजबूर होंगी. समय अब भी है, लेकिन बहुत कम है.
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