कल्पना कीजिए… रात के तीन बजे हैं. आप गहरी नींद में हैं. तभी फोन बजता है. उधर से कोई कहता है, “कल से आपकी जरूरत नहीं.”यह कोई हॉरर फिल्म का सीन लग सकता है. थोड़ा सा वैसा ही जैसा The Terminator में मशीनें धीरे धीरे इंसानों पर भारी पड़ने लगती हैं. फर्क बस इतना है कि इस बार कहानी स्क्रीन पर नहीं, हमारी जिंदगी में लिखी जा रही है.
साल 2020 याद है? जब दूर कहीं एक वायरस की खबरें आ रही थीं. लोगों ने कहा, “अरे छोड़ो, हमारे यहां थोड़ी आएगा.” और फिर दुनिया थम गई. स्कूल बंद, ऑफिस बंद, यात्राएं बंद.
अब कुछ टेक एक्सपर्ट कह रहे हैं कि हम फिर उसी तरह के “सब ठीक है” वाले फेज में हैं. लेकिन इस बार खतरा वायरस नहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है. अमेरिका के AI उद्यमी Matt Shumer ने एक लंबा लेख लिखकर लोगों को चेताया है. उनका कहना है, जो बदलाव आने वाला है, वह कोविड से भी बड़ा झटका हो सकता है.
डराने वाली बात? यह बदलाव शुरू भी हो चुका है.
“मैं खुद अपनी नौकरी से हट गया हूं”
मैट शूमर छह साल से AI कंपनी चला रहे हैं. टेक दुनिया के बीच रहते हैं. लेकिन उनका दावा है कि जो हुआ, उसने उन्हें भी हिला दिया.
वे बताते हैं कि पहले AI बस मदद करता था. थोड़ा लिख देता, थोड़ा कोड बना देता. फिर अचानक गति तेज हो गई.
एक दिन उन्होंने AI से कहा,
“मुझे एक ऐप बनाकर दो. ऐसा दिखे, ऐसा काम करे.”
चार घंटे बाद लौटे तो ऐप तैयार था. सिर्फ ड्राफ्ट नहीं. पूरा काम. डिजाइन, फीचर, टेस्टिंग सब. यहां तक कि AI खुद ऐप खोलकर देखता है, बटन क्लिक करता है, गलती ढूंढता है और ठीक करता है.
सुनकर लगता है बढ़ा चढ़ाकर कहा जा रहा है. लेकिन अगर यह सच है, तो सवाल सीधा है. अगर मशीन आपका काम आपसे बेहतर करने लगे तो?
दुनिया बदलने वाले कुछ लोग
आप सोचते होंगे कि AI हजारों लोग बना रहे होंगे. पर सच थोड़ा अलग है.
मैट के अनुसार, दुनिया की दिशा कुछ सौ रिसर्चर तय कर रहे हैं. बड़ी कंपनियों में बैठे ये लोग नए मॉडल ट्रेन करते हैं और अचानक पूरा टेक लैंडस्केप बदल जाता है. इनमें शामिल हैं-
• OpenAI
• Anthropic
• Google DeepMind
मतलब? आप, हम और यहां तक कि टेक में काम करने वाले बहुत से लोग भी बस दर्शक हैं.
“यह भविष्यवाणी नहीं… चेतावनी है”
मैट की सबसे बड़ी बात यह है कि वह कह रहे हैं, “हम अंदाजा नहीं लगा रहे. हमारे साथ यह हो चुका है.”
टेक सेक्टर में लोग देख रहे हैं कि AI “टूल” से “रिप्लेसमेंट” बन रहा है. और अब यह दूसरे क्षेत्रों की ओर बढ़ रहा है.
एक डरावनी टाइमलाइन
अब समय के रथ पर सवार होकर थोड़ा पीछे चलते हैं.
• 2022: AI साधारण गणित में भी गलती करता था.
• 2023: बार एग्जाम पास कर गया.
• 2024: सॉफ्टवेयर लिखने लगा.
• 2025: इंजीनियर कहने लगे, “ज्यादातर कोड अब AI करता है.”
• 2026: नए मॉडल आए और पुरानी टेक पुरानी लगने लगी.
यह लाइन सीधी नहीं, तेज चढ़ाई जैसी है.
“मैंने AI ट्राय किया था… बेकार लगा”
बहुत लोग यही कहते हैं. लेकिन समस्या यह है कि अधिकतर लोग फ्री वर्जन इस्तेमाल करते हैं. जो असल टेक से काफी पीछे होता है.
इसे ऐसे समझिए…अगर कोई आज फ्लिप फोन चलाकर बोले कि “स्मार्टफोन बेकार हैं”, तो बात थोड़ी अजीब लगेगी.
जो लोग पैसे देकर एडवांस टूल इस्तेमाल कर रहे हैं, वे ज्यादा घबराए हुए भी हैं और ज्यादा तैयार भी.
वकील, डॉक्टर, फाइनेंस… कोई सुरक्षित नहीं?
मैट ने अपने एक वकील दोस्त का उदाहरण दिया. वह AI को गंभीरता से नहीं ले रहा था.
लेकिन एक बड़ी लॉ फर्म का मैनेजिंग पार्टनर रोज घंटों AI इस्तेमाल कर रहा है. उसका कहना है,
“यह ऐसे है जैसे मेरे पास तुरंत जूनियर वकीलों की टीम हो.”
अब सोचिए. अगर जूनियर की जरूरत ही कम हो जाए तो नए वकील कहां जाएंगे?
किन नौकरियों पर सबसे पहले असर?
यह सूची सुनकर थोड़ा झटका लग सकता है.
1. लीगल काम: कॉन्ट्रैक्ट पढ़ना, केस समरी बनाना, ड्राफ्ट तैयार करना.
2. फाइनेंस: डेटा एनालिसिस, रिपोर्ट, निवेश नोट्स.
3. राइटिंग: मार्केटिंग, रिपोर्ट, पत्रकारिता तक.
4. सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग: जहां पहले हजारों कोडर चाहिए थे, अब कम लोग काफी हो सकते हैं.
5. मेडिकल एनालिसिस: स्कैन पढ़ना, रिपोर्ट समझना.
6. कस्टमर सपोर्ट: अब बॉट सिर्फ “हेलो” नहीं कहते, समस्या हल करते हैं.
सबसे डरावनी लाइन शायद यह है: जो काम स्क्रीन पर होता है, वह सुरक्षित नहीं.
क्या क्रिएटिविटी भी खतरे में?
पहले कहा जाता था कि मशीन में भावनाएं नहीं होतीं. निर्णय नहीं ले सकती.
अब नए मॉडल “जजमेंट” दिखाने लगे हैं. यानी सिर्फ सही जवाब नहीं, सही विकल्प चुनना.
क्या वे इंसानी भरोसा पूरी तरह बदल देंगे? कहना जल्दबाजी होगी. लेकिन लोग पहले ही AI से सलाह लेने लगे हैं.
AI खुद को बना रहा है!
यह बात थोड़ी साइंस फिक्शन जैसी लगती है. OpenAI ने बताया कि उनके एक मॉडल ने खुद के ट्रेनिंग प्रोसेस में मदद की. यानी मशीन अगली मशीन बनाने में शामिल है.
Dario Amodei का कहना है कि एक से दो साल में AI खुद अगली पीढ़ी तैयार कर सकता है. इसे रिसर्चर “इंटेलिजेंस एक्सप्लोजन” कहते हैं. बोले तो बस नाम ही काफी है.
आधी एंट्री लेवल नौकरियां खत्म?
डारियो अमोदेई की भविष्यवाणी है कि 1 से 5 साल में AI 50% एंट्री लेवल व्हाइट कॉलर जॉब खत्म कर सकता है.
अगर यह सच हुआ, तो सबसे ज्यादा झटका किसे लगेगा?
• नए ग्रेजुएट
• एमबीए
• लॉ स्टूडेंट
• कॉर्पोरेट में एंट्री करने वाले
यानी वही रास्ता, जिसे अब तक “सेफ करियर” कहा जाता था.
भारतीयों को क्यों डरना चाहिए?
अब सवाल सबसे जरूरी. “यह सब अमेरिका में होगा… हमें क्या?” गलतफहमी मत पालिए.
भारत दुनिया का बैक ऑफिस रहा है. आईटी, बीपीओ, सपोर्ट, डेटा, अकाउंटिंग.
अगर कंपनियां AI से वही काम सस्ते और तेज कर लें तो?
• कॉल सेंटर घट सकते हैं
• जूनियर एनालिस्ट कम हो सकते हैं
• कंटेंट रोल्स घट सकते हैं
और भारत में एंट्री लेवल जॉब पहले ही कम हैं.
बच्चों को क्या सिखाएं?
पुराना फॉर्मूला था- अच्छे नंबर मतलब- अच्छा कॉलेज मतलब सुरक्षित नौकरी. अब यह रास्ता सबसे ज्यादा जोखिम वाला हो सकता है.
नई दुनिया में जरूरी होगा-
• जिज्ञासा
• जल्दी सीखना
• टेक के साथ काम करना
• बदलने की क्षमता
डिग्री से ज्यादा “एडैप्ट करने की ताकत” काम आएगी.
डर ही कहानी नहीं है
अब एक अच्छी खबर. AI सिर्फ नौकरियां नहीं लेगा. मौके भी देगा. मिसाल के तौरपर,
• हमेशा ऐप बनाना चाहते थे? अब कर सकते हैं.
• किताब लिखना चाहते थे? मदद मिल सकती है.
• नई स्किल सीखना? 24 घंटे उपलब्ध ट्यूटर.
आसान भाषा में कहें तो ज्ञान पहले कभी इतना सस्ता नहीं था.
तो करें क्या?
घबराएं नहीं. लेकिन आंख बंद भी न रखें. बस कुछ आसान कदम उठाएं, जैसे की,
1. AI इस्तेमाल शुरू करें: सिर्फ मजे के लिए नहीं. काम में.
2. रोज एक घंटा प्रयोग करें, नई चीज ट्राय करें.
3. सेविंग बढ़ाएं, थोड़ी वित्तीय सुरक्षा जरूरी है.
4. रिश्ते बनाएं, ट्रस्ट मशीन से धीमे बदलता है.
5. ईगो छोड़ें, सीखने में शर्म कैसी?
आने वाला बड़ा सवाल
कल्पना कीजिए… 2027 में एक “डिजिटल देश” बन जाए. 5 करोड़ AI दिमाग. हर एक नोबेल विजेता से ज्यादा स्मार्ट. ना सोते हैं, ना थकते. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह कितना बड़ा खतरा होगा?
लेकिन दूसरी तरफ…
• कैंसर का इलाज जल्दी मिल सकता है
• नई दवाएं बन सकती हैं
• विज्ञान तेज दौड़ सकता है
यानी स्वर्ग और संकट दोनों साथ.
असली खतरा क्या है?
शायद AI नहीं. शायद हमारी लापरवाही. कोविड में सबसे बड़ी गलती क्या थी? “देखेंगे जब होगा.” यहां भी वही रवैया भारी पड़ सकता है.
और अंत में….
यह कोई फैशन ट्रेंड नहीं है. दुनिया की सबसे अमीर कंपनियां इसमें खरबों लगा रही हैं. अगले 2 से 5 साल थोड़ा चकराने वाले हो सकते हैं.
फायदा किसे होगा? जो जल्दी समझे. जो जल्दी सीखे. जो जल्दी बदले.
भविष्य दरवाजा खटखटा नहीं रहा. हो सकता है… वह कुंडी घुमा चुका हो.
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