₹25 लाख की सैलरी, मेट्रो सिटीज में ‘मिडिल क्लास’, छोटे शहर में ‘नवाब’

अगर भारत में किसी की सैलरी 20-25 लाख से ऊपर है तो आमतौर पर उसे बेहतर माना जाता है. आज के दौर में 20-25 लाख का पैकेज सुनने में तो बहुत भारी लगता है, लेकिन इसकी असल वैल्यू इस बात पर टिकी है कि आप किस शहर में रहते हैं. अगर आप मुंबई, बेंगलुरु या गुड़गांव जैसे ‘मेट्रो सिटी’ में हैं, तो ये पैसे देखते ही देखते खत्म हो जाते हैं और आपके महीने का आखिरी हफ्ता सैलरी का इंतजार करने में बीतता है. 

मेट्रो सिटीज में एक अच्छे इलाके में घर का किराया ही आपकी जेब खाली कर देता है और ऊपर से स्कूल की फीस, कार की ईएमआई और घर के दूसरे खर्चे, वहां आप कमाते तो बहुत हैं, लेकिन बचा नहीं पाते.
वहीं दूसरी तरफ, अगर आप इसी सैलरी के साथ इंदौर, जयपुर, लखनऊ या चंडीगढ़ जैसे किसी छोटे शहर में हैं, तो आप एक अच्छी लाइफस्टाइल मेंटेन कर सकते हैं और साथ में बचत भी. इन शहरों में ₹20-25 हजार में आप शहर के सबसे शानदार इलाके में रह सकते हैं. घर से ऑफिस की दूरी इतनी कम होती है कि आपके पास परिवार के लिए और अपनी सेहत के लिए भरपूर वक्त बचता है. छोटे शहर में रहने वाला व्यक्ति अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा निवेश कर पाता है, जिससे उसकी संपत्ति तेजी से बढ़ती है.

शहर के साथ कैसे बदलता है गणित?

एक दौर था जब भारत में साल के ₹20-25 लाख सालाना कमाना एक बहुत बड़ी बात मानी जाती है. सरकारी आंकड़ों की मानें तो इतना कमाने वाला इंसान देश के ‘टॉप 1%’ रईसों में शामिल हो जाता है. लेकिन अब जानकारों का कहना है कि ये आंकड़ा पूरी कहानी नहीं बताता.
चार्टर्ड अकाउंटेंट नितिन कौशिक ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है. उन्होंने ‘टॉप 1%’ वाले टैग को एक “आंकड़ों का भ्रम” बताया है. उनका तर्क है कि जब हम राष्ट्रीय औसत (national average) निकालते हैं, तो हम शहर, वहां के खर्चों और इलाके के हिसाब से बंटी अमीरी को नजरअंदाज कर देते हैं.’

नेशनल एवरेज के साथ दिक्कत

कागज पर तो सालाना ₹22 लाख की कमाई एक ‘विनिंग नंबर’ यानी बहुत बड़ी रकम लगती है. लेकिन कौशिक कहते हैं कि असलियत में मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में रहने वाले शख्स के लिए यह इनकम उसे “मिडिल क्लास” होने का ही एहसास कराती है. जब आप इसमें से 30% इनकम टैक्स काट देते हैं, और फिर महंगे किराए, बच्चों की भारी-भरकम स्कूल फीस, आने-जाने का खर्च और महंगाई को जोड़ते हैं, तो ₹22 लाख की सैलरी की ताकत बहुत कम रह जाती है. भारत के इन बड़े आर्थिक केंद्रों में आपका मुकाबला देश के औसत कमाने वालों से नहीं, बल्कि बड़े बिजनेस परिवारों, पुश्तैनी रईसों और भारी-भरकम निवेश करने वालों से होता है. 

नितिन कौशिक का कहना है, “जैसे ही आप अपने घर से बाहर कदम रखते हैं, आपकी खरीदारी की ताकत (Purchasing Power) कम होने लगती है.” उन्होंने दिल्ली, गोवा और सिक्किम जैसे राज्यों का उदाहरण देते हुए बताया कि भारत में अमीरी की परिभाषा हर राज्य में कैसे बदल जाती है.’

कहां है ‘टॉप 1%’ अमीरों की सबसे ऊंची दीवार?

राज्यवार आय के आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि देश के ‘टॉप 1%’ क्लब में शामिल होने के लिए हर राज्य की अपनी अलग कीमत है. कुछ ‘सुपर-रिच’ राज्यों में तो यह आंकड़ा नेशनल एवरेज से कहीं ज्यादा ऊपर है. छोटा राज्य होने के बावजूद गोवा इस लिस्ट में सबसे ऊपर है. यहां रिटायरमेंट के बाद बसने वाले रईस लोग, बड़े बिजनेसमैन और दूसरे घर (Second Home) खरीदने वाले अमीरों की वजह से इनकम का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया है. यहां ₹45 लाख सालाना कमाने वाला ही टॉप 1% में गिना जाता है.
राजनीति और व्यापार का केंद्र होने के कारण दिल्ली की अर्थव्यवस्था वेतनभोगी पेशेवरों के बजाय बड़े व्यापारियों के इर्द-गिर्द घूमती है. यही कारण है कि यहां अमीरों की लिस्ट में आने के लिए कम से कम ₹42 लाख की सालाना आय जरूरी है. इस लिस्ट में सिक्किम का नाम थोड़ा चौंकाने वाला है, लेकिन इसके पीछे एक खास वजह है. सिक्किम के मूल निवासियों को धारा 10(26AAA) के तहत इनकम टैक्स से छूट मिली हुई है. टैक्स न भरने की वजह से उनकी पूरी कमाई ‘इन-हैंड’ होती है, जिससे उनकी खर्च करने की ताकत और आय का स्तर काफी ऊपर चला जाता है.

भारत के वे राज्य जो सबसे ज़्यादा नौकरियां पैदा करते हैं जैसे कि आईटी (IT), मैन्युफैक्चरिंग और बैंकिंग सेक्टर, वहां ‘टॉप 1%’ अमीरों की लिस्ट में जगह बनाने के लिए बहुत ज़्यादा कमाई की ज़रूरत पड़ती है.
• महाराष्ट्र (₹35 लाख)
• कर्नाटक (₹32 लाख)
• तमिलनाडु (₹32 लाख)
• गुजरात (₹30 लाख)
इन राज्यों में बड़ी संख्या में कॉर्पोरेट प्रोफेशनल्स रहते हैं, जिन्हें बहुत अच्छी सैलरी मिलती है, जिसकी वजह से यहां औसत आय का स्तर काफी ऊपर चला गया है. यहां ‘टॉप 1%’ का हिस्सा बनने के लिए आमतौर पर आपको कंपनी के किसी बहुत बड़े पद (सीनियर लीडरशिप रोल) पर होना पड़ता है या फिर सैलरी के अलावा कमाई के कुछ और रास्ते (जैसे साइड बिजनेस या इन्वेस्टमेंट) ढूंढने पड़ते हैं.
असल में, बड़े शहरों में पैसा कैसे खर्च होता है पता ही नहीं चलता, क्योंकि वहां की लाइफस्टाइल महंगी है. वहां आप भीड़ का हिस्सा हैं. लेकिन छोटे शहरों में वही पैसा आपको लग्जरी देता है, सुकून देता है और एक रसूख वाली जिंदगी देता है. तो खेल सिर्फ सैलरी के आंकड़ों का नहीं है, बल्कि उस शहर का है जहां आप रह रहे हैं. क्योंकि एक जगह आप सिर्फ ‘गुजर-बसर’ कर रहे हैं और दूसरी जगह आप वाकई ‘जी’ रहे हैं.

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