डॉनल्ड ट्रंप के राज में अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया है. 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ और 25 प्रतिशत पेनल्टी. मुंबई में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में देश के प्रमुख अर्थशास्त्रियों ने इस विषय पर चर्चा की. विशेषज्ञों ने माना कि निकट भविष्य में यह भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती हो सकती है.
कौन से सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर?
UBS की चीफ इंडिया इकॉनमिस्ट तन्वी गुप्ता जैन ने कहा कि यह पेनल्टी किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था पर लगाए गए सबसे बड़े शुल्कों में से एक है. करीब 35 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर अमेरिकी टैरिफ का असर पड़ेगा, जो भारत की GDP का लगभग 0.8% है. 35 अरब डॉलर यानी लगभग 2.9 लाख करोड़ रुपये.
उन्होंने बताया कि कम मुनाफे वाले और लेबर-आधारित सेक्टर जैसे हीरे-जवाहरात, कपड़ा उद्योग, चमड़ा और जूते-चप्पल पर सबसे ज़्यादा खतरा है. इन उद्योगों में लाखों लोग काम करते हैं, इसलिए रोज़गार और आमदनी पर सीधा असर पड़ सकता है. जैन ने यह भी कहा कि अगर यह पेनल्टी इस साल के अंत तक खत्म नहीं हुई, तो इसका असर खपत और निजी निवेश तक पहुंच जाएगा.
क्या भारत को पलटवार करना चाहिए?
जेपी मॉर्गन के चीफ इकॉनमिस्ट डॉ सज्जिद ज़ेड चिनॉय ने साफ कहा कि पलटवार सही हल नहीं है. उन्होंने कहा, “आर्थिक दृष्टि से देखें तो इसका जवाब ‘नहीं’ है. अगर हम मामला बढ़ाएंगे तो हमारा नुकसान ज़्यादा होगा.”
उन्होंने सरकार की तारीफ़ की कि उसने परिपक्व रवैया अपनाया और ट्रेड वॉर (व्यापार युद्ध) से बची. चिनॉय ने सुझाव दिया कि छोटे उद्योगों को बचाने के लिए सरकार को विशेष मदद देनी चाहिए. जैसे लोन गारंटी, टैक्स में राहत और नकदी (liquidity) की सुविधा, ताकि नौकरियों पर असर न पड़े.
नए विकास मॉडल की ज़रूरत
वहीं सिटीबैंक इंडिया के चीफ इकॉनमिस्ट डॉ. समीरन चक्रवर्ती ने लंबी अवधि का नज़रिया पेश किया. उन्होंने कहा कि 50 फीसदी टैरिफ भारत के लिए ‘केवल एक छोटा-सा झटका’ नहीं है, ये आगे चलकर देश के विकास पर असर डाल सकता है. समीरन चक्रवर्ती ने साफ कहा कि भारत के लिए टैरिफ एक बड़ा चैलेंज है जिसका सबसे बड़ा असर रोजगार और छोटे उद्योगों पर पड़ सकता है.
समीरन ने आगे कहा कि अब वैश्वीकरण (globalization) की जगह संरक्षणवाद (protectionism) बढ़ रहा है, इसलिए भारत को अपने विकास मॉडल पर फिर से सोचना होगा. घरेलू मांग को मज़बूत करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, साथ ही निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाए रखना चाहिए.
डॉ. समीरन चक्रवर्ती का कहना है कि अब भारत को अपनी घरेलू मांग को बढ़ाना होगा. अगर वैश्विक बाज़ार भारत के खिलाफ जाते हैं, तो घरेलू उपभोग और निवेश के सहारे इकनॉमी को संभालने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा कि GST में बदलाव जैसी नीतियां पहले आतीं तो परिणाम बेहतर होते. अब ये सब मजबूरी में करना पड़ रहा है, क्योंकि बाहर (अमेरिका) से प्रेशर बढ़ चुका है.
हालांकि उन्होंने GST में कटौती और डायरेक्ट टैक्स सुधारों को निवेश आधारित विकास के लिए सहायक बताया. लेकिन साथ ही कहा कि जब तक बातचीत से राहत नहीं मिलती, तब तक कमजोर सेक्टरों को सहारा देना ज़रूरी है.
सुधार ज़रूरी
चुनौतियों के बावजूद विशेषज्ञों ने कहा कि भारत की बुनियाद मजबूत है. अच्छे मानसून, ग्रामीण मांग में बढ़ोतरी, कंपनियों की बेहतर वित्तीय स्थिति और सरकार का खर्च अर्थव्यवस्था को सहारा देंगे. तन्वी गुप्ता जैन ने अनुमान लगाया कि आने वाले 10 सालों में भारत की विकास दर 6–6.5% रहेगी, जो घरेलू मांग और सेवाओं के निर्यात से बढ़ेगी. लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि इस उम्मीद को सही साबित करने के लिए सरकार को नीतिगत कदम उठाने होंगे, ताकि छोटे उद्योग टिके रह सकें.
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