GST में बड़े सुधार की सिफारिश, चार की जगह सिर्फ ये दो टैक्स स्लैब होंगे, लेकिन 40% का नया स्लैब किसके लिए?

वस्तु एवं सेवा कर (GST) में लंबे समय से इंतज़ार किए जा रहे बदलाव की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है. GST दरों के आंकलन के लिए बनी मंत्रियों की समिति (GoM) ने टैक्स स्लैब की संख्या घटाने पर सहमति जताई है. 21 अगस्त को हुई बैठक में यह तय हुआ कि मौजूदा चार दरों – 5%, 12%, 18% और 28%, की जगह अब सिर्फ दो प्रमुख स्लैब होनी चाहिए. अगर GoM की सिफारिशों को सरकार की मंजूरी मिली तो इससे ज्यादातर वस्तुएं 5% और 18% GST के दायरे में आ जाएंगी. इसे GST 2.0 कहा जा रहा है, जिसका उद्देश्य टैक्स प्रणाली को सरल  बनाना है.

GST में संभावित सुधारों के बाद जो वस्तुएं 12% टैक्स स्लैब में आती थीं, उनमें से 99% को 5% पर लाया जाएगा. इसी तरह, लगभग 90% वस्तुएं जो 28% पर थीं, अब 18% स्लैब में आ जाएंगी. हालांकि तंबाकू और कुछ लग्जरी उत्पादों के लिए 40% का नया टैक्स स्लैब लाया जा सकता है. लग्जरी कारों को भी इसी श्रेणी में लाने का सुझाव दिया गया है.
सरकार का कहना है कि इस बदलाव से उपभोक्ताओं को बड़ी राहत मिलेगी. रोजमर्रा की वस्तुएं, जैसे दवाइयां, पैक्ड फूड, कपड़े, जूते और घरेलू सामान सस्ते होंगे. वहीं टीवी, फ्रिज और अन्य बड़े घरेलू उपकरण 28% से घटकर 18% पर आ जाएंगे. माना जा रहा है कि इससे मध्यमवर्गीय परिवारों को सीधा फायदा होगा.

बैठक में स्वास्थ्य और जीवन बीमा को GST से छूट देने पर भी चर्चा हुई. अगर यह प्रस्ताव पास हो जाता है तो इंश्योरेंस प्रीमियम पर टैक्स नहीं देना पड़ेगा. हालांकि, इससे सरकार की आय में हर साल लगभग 9,700 करोड़ रुपये की कमी हो सकती है. कई राज्यों ने यह भी कहा कि बीमा कंपनियों को यह राहत ग्राहकों तक ज़रूर पहुंचानी चाहिए, न कि प्रीमियम को पहले जैसा ही बनाए रखना चाहिए.
यह बैठक बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की अध्यक्षता में हुई, जिसमें उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और केरल के मंत्री शामिल थे. अब इन सिफारिशों को GST काउंसिल के पास भेजा जाएगा, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण करती हैं. काउंसिल की अगली बैठक में इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा.
अगर यह बदलाव लागू हो जाता है तो 2017 में GST लागू होने के बाद यह सबसे बड़ा सुधार होगा. सरकार को उम्मीद है कि इससे कारोबारियों के लिए टैक्स प्रणाली का पालन करना आसान होगा और उपभोक्ताओं पर टैक्स का बोझ भी कम होगा.

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