ट्रंप के टैरिफ से ज्यादा खतरा तो भारत की स्टील इंडस्ट्री को खुद ‘स्टील’ से है!

भारत की स्टील इंडस्ट्री पर आज दो तरफा संकट मंडरा रहा है. एक तरफ अमेरिका जैसे देश टैरिफ की दीवार खड़ी कर रहे हैं. 30 जुलाई को अमेरिका ने भारत समेत 7 देशों पर 25% इम्पोर्ट टैरिफ लगा दिया. दूसरी तरफ खुद भारत की स्टील कंपनियां ज़रूरत से ज़्यादा उत्पादन कर रही हैं. नतीजा ये है कि नुकसान का तीर बाहर से नहीं, अंदर से आ रहा है.

रेलवे, मेट्रो, एक्सप्रेसवे, डिफेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर में स्टील की मांग बनी हुई है. 2030 तक भारत की स्टील डिमांड 180 मिलियन टन तक पहुंच सकती है. यानी मांग की कमी नहीं है. लेकिन ओवरसप्लाई और चीनी स्टील की बाढ़ बाज़ार का खेल बिगाड़ रही है.
 “दूसरों से क्या लड़ेंगे साहब, जब अपनों से ही हारने का डर हो!”
चीन की डंपिंग और स्टील की सुनामी
चीन दुनियाभर में स्टील ओवरप्रोडक्शन का बड़ा गुनहगार है. उसके पास दुनिया की 54% स्टील प्रोडक्शन कैपेसिटी है. लेकिन घरेलू मांग कम होने की वजह से वो सस्ता स्टील दुनियाभर में डंप करता है. अमेरिका और यूरोप इसे रोकने के लिए टैरिफ और एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगा चुके हैं.

अब जब चीन के लिए अमेरिका का रास्ता बंद हो रहा है, तो उसका सस्ता स्टील भारत जैसे देशों में खपाने की कोशिश तेज़ हो सकती है. वर्ल्ड स्टील एसोसिएशन के मुताबिक अप्रैल-जून 2024 के दौरान भारत का स्टील इम्पोर्ट 23% बढ़कर 20 लाख टन पहुंच गया -इसमें बड़ी हिस्सेदारी चीन की रही.
भारत की पॉलिसी अभी भी उदार बनी हुई है. कई सेगमेंट में टैरिफ कम हैं या नहीं हैं. ऐसे में चीनी स्टील के लिए भारत ‘ओपन मार्केट’ बनता जा रहा है.

घरेलू ओवरसप्लाई का संकट
अब जरा भारत की तरफ रुख करें. देश में इस वक्त स्टील की डिमांड है, लेकिन कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में भारी निवेश करके प्रोडक्शन कैपेसिटी काफी बढ़ा दी है. भारत सरकार के इस्पात मंत्रालय के मुताबिक 2023-24 में भारत का स्टील प्रोडक्शन 140 मिलियन टन रहा, जबकि डिमांड उससे कुछ कम यानी करीब 136 मिलियन टन के आसपास थी.
ऐसे में कंपनियों के पास दो ही रास्ते बचते हैं -या तो कीमत गिराएं और बेचें, या नुकसान झेलें. और हुआ वही. अप्रैल-जून तिमाही में टॉप स्टील कंपनियों के मार्जिन गिर गए हैं. एक्सपोर्ट मार्केट में पहले से टैरिफ का टेंशन है, और घरेलू मार्केट में ओवरसप्लाई ने कमर तोड़ दी है.
 वो कहते हैं ना कि “जब ज़रूरत से ज़्यादा हो जाए, तो नेकी भी बोझ लगने लगती है.”

अमेरिका का 50% टैरिफ: नुकसान या मौका?
अब बात अमेरिका के टैरिफ की. अमेरिका ने दो किश्तों में भारत पर 50% इम्पोर्ट टैरिफ लागू कर दिया. इसका मकसद घरेलू इंडस्ट्री को बचाना और चीन की डंपिंग को रोकना है. भारत सरकार अभी इस पर आधिकारिक विरोध नहीं जताया है, लेकिन एक्सपोर्टर्स की चिंता जायज़ है. अमेरिका भारत का तीसरा सबसे बड़ा स्टील एक्सपोर्ट मार्केट है.
हालांकि कुछ एक्सपर्ट मानते हैं कि अगर अमेरिका चीन से और ज़्यादा दूरी बनाता है, तो भारत के लिए वहां क्वालिटी स्टील सप्लाई करने का मौका बन सकता है.
बाज़ार में अगर कुर्सी खाली हो, तो समझो किस्मत दरवाज़ा खटखटा रही है.

भारत को क्या करना चाहिए?
हालात काबू में लाए जा सकते हैं बशर्तें कुछ जरूरी कदम उठा लिये जाएं.
1. चीनी स्टील पर टैरिफ और मॉनिटरिंग बढ़े: DGTR (Directorate General of Trade Remedies) को चीनी कंपनियों की डंपिंग पर कड़ा एक्शन लेना होगा. एंटी-डंपिंग ड्यूटी की समीक्षा और कुछ सेगमेंट में टैरिफ रीसेट करना ज़रूरी है.
2. ओवरसप्लाई पर नियंत्रण: नए निवेश के साथ-साथ कंपनियों को मांग के आंकड़ों के हिसाब से विस्तार करना होगा. वरना खुद की बनाई स्टील से खुद का ही घाटा होगा.

3. एक्सपोर्ट मार्केट को डायवर्सिफाई करना: सिर्फ अमेरिका पर निर्भर रहने की जगह, भारत को अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण एशिया जैसे मार्केट में पक्की पकड़ बनानी होगी.
4. गुणवत्ता और वैल्यू एडिशन पर फोकस: सिर्फ रॉ मटीरियल बेचने की जगह अब समय है प्रोसेस्ड स्टील, स्टील कंपोनेंट्स और हाई-ग्रेड मटीरियल का एक्सपोर्ट बढ़ाने का.

स्टील सिर्फ मटीरियल नहीं, आत्मनिर्भर भारत की रीढ़ है

सरकार की “नेशनल स्टील पॉलिसी” का लक्ष्य 2030 तक 300 मिलियन टन प्रोडक्शन और 180 मिलियन टन खपत तक पहुंचना है. लेकिन ये तभी होगा जब डंपिंग, टैरिफ और ओवरसप्लाई की तिकड़ी को समय रहते संभाल लिया जाए.
क्योंकि स्टील इंडिया में सिर्फ मटीरियल नहीं है, ये आत्मनिर्भर भारत का हिस्सा है. 

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