हरिद्वार कुंभ में मिलने का वादा…त्रिशूल, चिमटा समेटने लगे नागा संन्यासी; अब कढ़ी पकौड़ी का इंतजार

अंतिम अमृत स्नान पूरा होने के साथ ही अखाड़ों में अब विदाई का दौर आरंभ हो गया। छावनी में कढ़ी पकौड़ी की परंपरागत पंगत के बाद सभी साधु-महात्मा एक दूसरे से विदा लेकर काशी रवाना हो जाएंगे। अचला सप्तमी के बाद अलग-अलग अखाड़ों में कढ़ी पकौड़ी होगी। सबसे पहले शैव अखाड़े के संन्यासी विदाई लेंगे। उसके बाद अनी एवं उदासीन अखाड़ों के साधु-संत विदा होंगे। हालांकि, अखाड़ों की धर्मध्वजा महाशिवरात्रि के बाद ही छावनी से उतारी जाएगी। अब सभी अखाड़ों की अगली मुलाकात दो साल बाद हरिद्वार अर्द्धकुंभ में होगी।

धूनी के साथ जमीन पर गड़ा चिमटा उखाड़ा

सोमवार को तीसरे स्नान के बाद से नागा संन्यासियों ने अपना समान एकत्र करना शुरू कर दिया। निरंजनी, महानिर्वाणी एवं जूना अखाड़े के बाहरी पटरी पर पिछले 22 दिनों से धूनी रमाए नागा संन्यासी अपना सामान समेटने लगे। धूनी के साथ जमीन पर गड़ा चिमटा उखाड़कर उसे कपड़े से बांध लिया। त्रिशूल एवं तलवार भी बक्से में रख ली।

कढ़ी-पकौड़ी के बाद धूनी भी कर देंगे ठंडी

निरंजनी अखाड़ा के नागा संन्यासी महेंद्र पुरी के मुताबिक, कढ़ी-पकौड़ी के बाद धूनी भी ठंडी कर देंगे। पिछले करीब एक माह से श्रद्धालुओं को आशीष बांट रहे नागा संन्यासी अब यहां से जाने के लिए ट्रक, ट्रैक्टर एवं वाहनों के बंदोबस्त मेंं लगे हैं। उनका कहना है कि अचला सप्तमी तक अधिकांश संन्यासी यहां से चले जाएंगे। अनी अखाड़े के संन्यासी धूना तपस्या पूरी करके के साथ ही त्रिजटा स्नान को यहां ठहरेंगे। इसके बाद वह भी यहां से रवाना हो जाएंगे।

नए बने नागाओं को काशी में मिलेगा प्रमाण पत्र

जिन नागाओं की दीक्षा कुंभ नगरी में हुई है, उनको अखाड़ों का प्रमाण पत्र काशी से मिलेगा। इसके साथ ही नए बने महामंडलेश्वर, महंत समेत रमता पंच के सदस्यों को भी मोहर छाप काशी से ही नई बनवानी पड़ेगी।। महाकुंभ के साथ ही उनके पुराने सभी प्रमाण पत्र भी रद हो जाते हैं। अब इनको नए सिरे से बनवाया जाएगा।

वैष्णव संत करेंगे त्रिजटा स्नान

वैष्णव परंपरा के संत यहां त्रिजटा स्नान तक ठहरेंगे। श्रीकृष्ण मंगल सनातन विचार मंच के डाॅ. विश्वनाथ निगम का कहना है कि माह भर तक स्नान न कर पाने वालों के लिए त्रिजटा स्नान विशेष फलदायी होता है। फाल्गुन मास की तृतीया तिथि पर त्रिजटा स्नान का मुहूर्त माना जाता है। तमाम वैष्णव संत भी इस स्नान के लिए खास तौर से प्रयाग आते हैं। इस वर्ष महाकुंभ होने की वजह से वह यहां रहकर ही त्रिजटा स्नान करेंगे। इसके बाद ही उनकी यहां से रवानगी होगी हालांकि मेले का औपचारिक समापन शिवरात्रि के आखिरी स्नान पर्व के बाद होगा।

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