चीन संग 15 देश कहते रहे हो जाओ शामिल, पर मोदी ने पकड़ी अलग राह, क्‍यों सही साबित हुआ फैसला?

नई दिल्‍ली: मोदी सरकार की पॉलिसी के चलते भारत बड़े नुकसान से बचा है। एक नई रिपोर्ट में भारत के RCEP से बाहर निकलने के फैसले को एकदम सही बताया गया है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की रिपोर्ट में यह बात कही गई है। उसने बताया है कि इस ट्रेड ग्रुप में शामिल होने से भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता था। ऐसा खासतौर से चीन के साथ हो सकता था। इससे देश के उद्योगों, खासकर छोटे और मध्‍यम उद्योगों (MSME) को भी नुकसान होने की आशंका थी।

भारत 2019 में रीजनल इकनॉमिक कॉम्प्रिहेंसिव पार्टनरशिप (RCEP) से बाहर हो गया था। उसे चिंता थी कि इससे व्यापार असंतुलन बढ़ेगा। स्थानीय उद्योगों को नुकसान होगा। RCEP एक बड़ा मुक्त व्यापार समझौता है। इसमें 10 ASEAN देश और 6 व्यापारिक भागीदार – चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और भारत (जो शामिल नहीं हुआ) शामिल हैं। ये देश मिलकर दुनिया की 30% GDP और दुनिया की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं।

क्‍यों शाम‍िल न होने का फैसला सही?

GTRI की रिपोर्ट अजय श्रीवास्तव और अभिजीत दास ने लिखी है। इसमें कहा गया है कि भारत के व्यापार और ढांचागत चुनौतियों के कारण उसे RCEP में शामिल नहीं होना चाहिए। रिपोर्ट में कई मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है:

व्यापार घाटा: FTA के बाद से ASEAN, दक्षिण कोरिया और जापान के साथ भारत का व्यापार घाटा बहुत बढ़ गया है। 2007-09 और 2020-22 के बीच ASEAN के साथ यह 302.9%, दक्षिण कोरिया के साथ 164.1% और जापान के साथ 138.2% बढ़ा है।

चीन का व्यापार: वित्त वर्ष 2023-24 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 85 अरब डॉलर है। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि RCEP से स्थिति और खराब हो सकती थी। इसकी वजह से चीनी सामान दूसरे सदस्य देशों के रास्ते भारत के बाजारों में आसानी से पहुंच सकते थे।

MSME को खतरा: अगर टैरिफ-मुक्त आयात की अनुमति मिलती तो भारत के छोटे उद्योगों को बड़े चीनी उद्योगों से मुकाबला करने में मुश्किल हो सकती थी। इससे घरेलू उद्योगों को नुकसान हो सकता था।

निर्यात में कम लाभ: भारत का RCEP के 15 देशों में से 13 के साथ पहले से ही FTA है। ये देश न्यूजीलैंड और चीन को छोड़कर हैं। रिपोर्ट में तर्क दिया गया है कि इससे निर्यात के नए अवसर बहुत कम मिलते क्योंकि पिछले पांच वर्षों में चीन को भारतीय निर्यात में गिरावट आई है।

दावों को गलत क‍िया साब‍ित

GTRI की स्टडी उन दावों को चुनौती देती है जो कहते हैं कि RCEP में शामिल होने से भारत को ग्‍लोबल वैल्‍यू चेन (GVC) में शामिल होने में मदद मिलती। ASEAN, जापान और दक्षिण कोरिया के साथ लंबे समय से FTA होने के बावजूद भारत GVC में एक बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर नहीं पाया है। इसकी वजह धीमा पोर्ट क्लीयरेंस और ईज-ऑफ-डूइंग-बिजनेस रैंकिंग कम होना जैसे मुद्दे हैं।

नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने हाल ही में सुझाव दिया था कि भारत को बड़े व्यापार क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए RCEP में शामिल होने पर फिर से विचार करना चाहिए। हालांकि, रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है कि ये फायदे जोखिमों से ज्यादा नहीं हो सकते हैं, खासकर कृषि और MSME जैसे कमजोर क्षेत्रों के लिए।

यह स्टडी FTA और बढ़े हुए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के बीच संबंधों के बारे में मिलजुले साक्ष्य भी दिखाती है। FDI को अक्सर RCEP में शामिल होने का एक बड़ा कारण बताया जाता है।

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