दूसरी बगावत के बाद कम होगी उद्धव की बार्गेनिंग पावर, अब उबरना कितना मुश्किल?

महाराष्ट्र की सियासत में ‘बगावत’ कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन महाविकास अघाड़ी (एमवीए)के गठन के बाद से राज्य ने जो राजनीतिक बगावत हुई है, वो विपक्षी गठबंधन के भीतर के सारे समीकरण बदल कर रख दिए हैं. पहले एकनाथ शिंदे और फिर अजीत पवार की बगावत ने न सिर्फ शिवसेना और एनसीपी को तोड़ा, बल्कि महाविकास अघाड़ी के भीतर शक्ति संतुलन को भी पूरी तरह उलट दिया है. 

सत्ता और शिवसेना को गंवाने के बाद उद्धव ठाकरे ने शिवसेना (यूबीटी) बनाई और 2024 में काफी मशक्कत के बाद 9 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रहे, लेकिन अब दूसरी बगावत ने उद्धव की राजनीति ही पूरी तरह से छीन ली. शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद उद्धव से अलग हो गए हैं और एकनाथ शिंदे के साथ हाथ मिला लिया है. 
महाराष्ट्र में इस ‘दूसरी बगावत’ ने उद्धव ठाकरे की पूरी सियासी जमीन ही खींच ली है. इसके चलते उद्धव ठाकरे की सियासत पर संकट ही नहीं बल्कि सियासी ग्रहण लगता दिख रहा है. इस बार बगावत ने महाविकास अघाड़ी में उद्धव ठाकरे के सियासी बार्गेनिंग पावर को कर दिया है. 

डैमेज कन्ट्रोल का दांव भी हो गया फेल

लोकसभासांसदों के बागी रुख को देखते हुए उद्धव ठाकरे ने शुक्रवार को भले ही उनकी आलोचना की थी, लेकिन शनिवार को उन्हें मनाने की आखिरी कोशिश की. उद्धव ने निंबालकर के करीबी सांसद कैलास पाटिल और विधायक वरुण सरदेसाई को उनके पास भेजा. संदेश यह था कि पुरानी बातों को भूलकर फिर से साथ काम करते हैं. 

निंबालकर, शिवसेना (UBT) सांसद संजय राउत और अन्य नेताओं के बयानों से बेहद नाराज थे,  उन्होंने साफ कहा कि उन्हें उद्धव से कोई शिकायत नहीं है, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों के कारण वे शिंदे के ऑफर पर विचार किए हैं. इसके बाद रविवार की शाम को वह शिंदे गुट के नेताओं के साथ धाराशिव के लिए रवाना हो गए. 
शिवसेना (यूबीटी) छोड़ने के बाद अपने गांव गोवर्धन वाड़ी में कार्यकर्ताओं के साथ बंद कमरे में बैठक के बाद ही निंबालकर ने कहा कि विपक्ष में रहकर अपने सियासी दुश्मनों से लड़ना अब मुमकिन नहीं है, क्योंकि उन्हें सत्ताधारी भाजपा का समर्थन हासिल है. निंबालकर ने कहा कि सत्ता या पैसे के लालच में शिंदे जी के साथ नहीं जा रहा, बल्कि अपने राजनीतिक अस्तित्व और क्षेत्र के विकास के लिए यह फैसला लिया हूं. ऐसे में साफ है कि उद्धव ठाकरे के साथ रहते हुए उनके नेताओं को अपना सियासी भविष्य नहीं दिख रहा है. 

लोकसभा में कमजोर पड़े उद्धव ठाकरे

गठबंधन की राजनीति भावनाओं से नहीं, बल्कि ‘संख्या बल’ के ठोस आंकड़ों से चलती है. पहली बगावत में उद्धव ठाकरे ने अपने अधिकांश विधायक खोए, जिससे सत्ता हाथ से निकल गई और सियासत भी खिसक गई. कांग्रेस और शरद पवार के साथ मिलकर उद्धव ठाकरे ने दोबारा से अपनी सियासी जमीन को तैयार किया, लेकिन अब 9 में से 6 लोकसभा सांसदों की बगावत ने उद्धव ठाकरे को पूरी तरह हिलाकर रख दिया. 

उद्धव ठाकरे की पार्टी में हुई बगावत ने महाविकास अघाड़ी का ढांचा पूरी तरह हिल गया. महाराष्ट्र की सियासत में कांग्रेस के बाद उद्धव की पार्टी के पास सांसद थे, लेकिन शिंदे के ऑपरेशन टाइगर ने उन्हें सियासी हाशिए पर पहुंचा दिया है. इस टूट-फूट के चलते उद्धव ठाकरे की सियासी ताकत कमजोर पड़ी है, दिल्ली की राजनीति में भी उनका प्रभाव कम होगा. शिवसेना (यूबीटी) के 3 सांसद ही रह गए हैं. इस कारण से उद्धव ठाकरे अब सहयोगियों के सामने अड़ियल रुख नहीं अपना सकते. 

गठबंधन में उद्धव ठाकरे की घटी सियासत

2019 में जब महाविकास अघाड़ी बनी थी, तब उद्धव ठाकरे इस गठबंधन में निर्विवाद रूप से केंद्र में थे. वह मुख्यमंत्री बने और शिवसेना ड्राइविंग सीट पर थी, लेकिन चार साल में लगातार दूसरी बार हुई बगावतों ने उद्ध ठाकरे की राजनीति के पूरी तरह से हिलाकर रख दिया है. इसके चलते राज्य में अब कांग्रेस को फ्रंट फुट पर आने का मौका मिल गया. 
राष्ट्रीय पार्टी होने के नाते कांग्रेस अब महाराष्ट्र में खुद को ‘बड़े भाई’ की भूमिका में देख रही है. कांग्रेस के इस आक्रामक रुख के कारण उद्धव ठाकरे के लिए महा विकास अघाड़ी के अंदर अपनी सियासी अहमियत को बचाए रखना मुश्किल हो गया है. इतना ही नही मुंबई और कोंकण जैसे इलाके में अपनी राजनीतिक के बचाए रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा. 

उद्धव कैसे बचाए रख पाएंगे राजनीति

सियासत में पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न उसकी सबसे बड़ी पूंजी होती है. चुनाव आयोग के द्वारा मूल ‘शिवसेना’ नाम और ‘तीर-कमान’ का सिंबल एकनाथ शिंदे गुट को सौंपे जाने के बाद उद्धव ठाकरे को अपनी नई पहचान ‘मशाल’ के साथ जमीन पर उतरना पड़ा था. हालांकि, जनता के एक वर्ग में उनके प्रति सहानुभूति जरूर थी, जिसके बदौलत ही 9 लोकसभा सीटें जीतने में सफल रहे, लेकिन उनमें से 6 सांसदों को तोड़ लिए जाने के बाद अब उद्धव ठाकरे लिए अपनी राजनीति को बचाए रखने की चुनौती खड़ी हो गई है. 
उद्धव का पारंपरिक काडर और वोट बैंक नए सिंबल पर किसी तरह ट्रांसफर हुआ था, लेकिन अब दूसरी बगावत के बाद उद्धव की राजनीति दोबारा से जीरो पर खड़ी हो गई है. इस बार की बागवत ने बार्गेनिंग टेबल पर उद्धव की स्थिति को पहले से भी ज्यादा कमजोर कर दिया है. महाराष्ट्र की सियासत में बालासाहेब ठाकरे के सियासी वारिस के तौर पर शिंदे खुद को स्थापित कर रहे हैं, जिसके चलते ही उद्धव के लिए सियासी चुनौती खड़ी हो गई. ऐसे में उद्धव कैसे राजनीति बचाए कर रख पाएंगे? 

उद्धव का एक-एक कर ध्वस्त होता दुर्ग

शिवसेना की असली ताकत हमेशा से मुंबई, ठाणे, और कोंकण के तटीय इलाके रहे हैं. पहली बगावत के बाद इन क्षेत्रों के विधायकों, नगरसेवक और जमीनी स्तर के नेता शिंदे के साथ जा चुके हैं. फंड और बूथ मैनेजमेंट संभालने वाले कद्दावर नेता भी पाला बदल चुके हैं. इस तरह से जब आपकी अपनी जमीन पर ही सियासी घेराबंदी हो रही हो, तो आप सहयोगियों से राज्य स्तर पर बड़ी रियायतों की मांग नहीं कर सकते.

उद्धव ठाकरे ने पहली बगावत में ठाणे और कोंकण को गंवाया और अब सांसदों की बगावत ने मुंबई की राजनीति में उनकी नींव को हिलाकर रख दिया है. बीएमसी के चुनाव हारने और अब लोकसभा सांसदों की बागवत ने उद्धव ठाकरे के गढ़ माने जाने वाले मुंबई में भी सिमटती रही. मुंबई उत्तर-पूर्व से लोकसभा सांसद संजय पाटिल भी उद्धव का साथ छोड़कर शिंदे के साथ चले गए, जो उद्धव के लिए बड़ा झटका है. मुंबई की सियासत में उद्धव ठाकरे सिमटते जा रहे हैं. 

उद्धव की खत्म होगी बार्गेनिंग पावर

महाराष्ट्र की राजनीति को लंबे समय तक बालासाहेब ठाकरे ने अपने हिसाब से चला. सूबे में शिवसेना का अपना सियासी मुकाम हुआ करता था, लेकिन चार साल में दो बार पार्टी में टूट-फूट हो जाने से सियासी टेंशन बढ़ गई है. उद्धव ठाकरे को एक के बाद एक सियासी झटका लग रहा है, जो उनके लिए सियासी टेंशन का सबब बन गया है. 
बार्गेनिंग पावर हमेशा इस बात से तय होती है कि आपके पास दूसरा विकल्प क्या है. अगर बातचीत टूटती है,तो आप कहां जाएंगे. उद्धव ठाकरे के लिए बीजेपी के साथ वापस जाने के सारे रास्ते वैचारिक और राजनीतिक रूप से बंद हो चुके हैं. कांग्रेस और शरद पवार इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि उद्धव ठाकरे के पास महाविकास अघाड़ी में बने रहने के अलावा कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं है.

सियासत में जब सहयोगियों को पता हो कि आपके पास जाने के लिए कोई और दरवाजा नहीं है, तो वे अपनी शर्तें ज्यादा मजबूती से थोपते हैं. महाराष्ट्र की राजनीति में फिलहाल उद्धव की सियासत ऐसी जगह पर खड़ी हो गई है, जहां से उभरना मुश्किल हो गया है. हालांकि, उद्धव ठाकरे की बार्गेनिंग पावर पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन यह अब उनके व्यक्तिगत रसूख के बजाय इस बात पर टिकी है कि वह जमीन पर कितनी ‘सहानुभूति’ को ‘वोट’ में बदल पाते हैं? 

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