पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (Shahbaz Sharif) और सेनाध्यक्ष फील्ड मार्शल आसिम मुनीर (Asim Munir) परेशान हैं. जिस अमेरिका की ‘जी हुजूरी’ में जमीन-आसमान एक कर दिया था, उसी ने जमीन पर ला पटका है. जिस डॉनल्ड ट्रंप (Donald Trump) को खुश करने के लिए नोबेल पीस प्राइज से लेकर ईरान के साथ जंग में मध्यस्तता तक का दांव खेला. उसी ने हमारे ‘प्यारे पड़ोसी’ को 440 वॉल्ट का ऐसा झटका दिया है कि दर्द सहा भी ना जाए और किसी से कहा भी ना जाए. पाकिस्तान (Pakistan) को मिले इस अमेरिकी दर्द का नाम है ‘अब्राहम अकॉर्ड’
अमेरिकी प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप ने ‘अब्राहम अकॉर्ड’ नाम का जो जिन्न बोतल से निकाला है, उसने मुस्लिम जगत की जियोपॉलिटिक्स हिलाकर रख दी है. सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, वेस्ट एशिया के कई मुस्लिम देश हैरान-परेशान हैं कि क्या करें और क्या ना करें.
सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं सऊदी अरब और कतर जैसे देश भी टेंशन में हैं. टेंशन की बात भी है क्योंकि प्रेसिडेंट ट्रंप इन देशों से ‘अब्राहम अकॉर्ड’ पर साइन करने का ‘अनिवार्य अनुरोध ‘ (Mandatory Request) कर रहे हैं.
डॉनल्ड ट्रंप ने हाल ही में अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक ऐसी पोस्ट लिखी, जिसने कूटनीति के गलियारों में हड़कंप मचा दिया. ट्रंप ने साफ-साफ कहा कि सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों के लिए इस समझौते पर दस्तखत करना चाहिए. इस पर साइन करने का मतलब है कि इन देशों ने इजरायल को मान्यता दे दी.
हालांकि, पाकिस्तान ने ‘अब्राहम अकॉर्ड’ पर साइन करने से मना कर दिया है. सऊदी अरब के अखबार ‘अरब न्यूज’ ने लिखा कि पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ ने कहा कि पाकिस्तान ऐसे किसी भी समझौते का हिस्सा नहीं बनेगा, जो उसके मूल उसूल के खिलाफ हो. माने, पाकिस्तान को इजरायल से दोस्ती कबूल नहीं है.
लेकिन पाकिस्तान के लिए यह आसान नहीं है. क्योंकि कहने को तो ‘अब्राहम अकॉर्ड’ एक ‘शांति समझौता’ है. मगर जरूरी नहीं कि जो चीज जैसी दिखे, असल में भी वैसी ही हो. इस बात को पाकिस्तान से बेहतर भला कौन समझ सकता है. ट्रंप की बात ना मानी तो डॉलर की इमदाद रुकने और प्रतिबंधों का डर है. अगर मान लो तो देश के भीतर ही तख्तापलट और बर्बादी का रास्ता खुलता है. कुल मिलाकर ‘आगे कुआं, पीछे खाई’ वाली हालात.
ये सारी बातें पढ़कर अगर आपका सिर भी चकरा गया तो आइये आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर यह पूरा माजरा क्या है और क्यों शहबाज़ शरीफ सरकार अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने की कगार पर खड़ी है.
आखिर ‘अब्राहम अकॉर्ड’ क्या बला है?
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सीधे सरल अंदाज में कहें तो अब्राहम अकॉर्ड इजरायल और मुस्लिम देशों के बीच दुश्मनी खत्म कर दोस्ती की नई इबारत लिखने का एक अमेरिकी प्रोजेक्ट है. इसकी शुरुआत साल 2020 में डॉनल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान हुई थी.
‘अब्राहम’ नाम के पीछे की कहानी
यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों, तीनों ही मजहबों के लोग पैगंबर अब्राहम (हजरत इब्राहिम) को अपना पूर्वज मानते हैं. इसी धार्मिक जुड़ाव को भुनाने और दुनिया को ‘शांति’ का संदेश देने के लिए ट्रंप ने इस समझौते का नाम ‘अब्राहम अकॉर्ड’ रखा था.
इस समझौते से क्या बदल गया
इस समझौते से पहले मुस्लिम देशों के बीच दशकों से ये परंपरा चली आ रही थी कि जब तक फिलिस्तीन का विवाद नहीं सुलझता और उसे एक आजाद मुल्क का दर्जा नहीं मिलता, तब तक कोई भी अरब या मुस्लिम देश इजरायल को मान्यता नहीं देगा. लेकिन अब्राहम अकॉर्ड ने इस नीति को कूड़ेदान में डाल दिया. इसके तहत बिना फिलिस्तीन मुद्दे के हल के ही मुस्लिम देशों ने इजरायल से व्यापार, रक्षा और डिप्लोमैटिक संबंध बहाल करना शुरू कर दिया.
अब तक किसने किए दस्तखत
साल 2020 में सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और बहरीन ने इजरायल से हाथ मिलाया. इसके बाद मोरक्को और सूडान भी इस फेहरिस्त में शामिल हो गए. साल 2025 में कजाकिस्तान ने भी इस ग्रुप का दामन थाम लिया.
ट्रंप की ‘हंटर डिप्लोमेसी’, सऊदी-पाकिस्तान की मुसीबत
सवाल उठता है कि ट्रंप इस समय सऊदी अरब और पाकिस्तान के पीछे लट्ठ लेकर क्यों पड़ गए हैं? इसके पीछे वाशिंगटन की एक सोची-समझी क्रोनोलॉजी है. जिसे हम कुछ आसान पॉइंट्स के जरिए समझने की कोशिश करते हैं.
ईरान की घेराबंदी और नया फ्रेमवर्क
इस समय अमेरिका और ईरान के बीच पर्दे के पीछे यानी बैकचैनल बातचीत का दौर चल रहा है. ट्रंप और उनके सबसे भरोसेमंद रिब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम का मानना है कि अगर वेस्ट एशिय में ईरान के प्रभाव को हमेशा के लिए बेअसर करना है, तो सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे बड़े सैन्य ताकत वाले देशों को इजरायल के पाले में लाकर खड़ा करना होगा. पाकिस्तान तो वैसे भी परमाणु संपन्न देश है.
खुलकर धमकी भरा लहजा
ट्रंप अब घुमा-फिराकर बात नहीं कर रहे हैं. अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने साफ कर दिया है कि अगर सऊदी और पाकिस्तान इस शांति प्रस्ताव को ठुकराते हैं, तो इसके “गंभीर परिणाम” (Severe Repercussions) होंगे. ट्रंप इसे एक ‘फायदे का सौदा’ बताकर बेच रहे हैं, जहां अमेरिकी मदद के बदले इजरायल को स्वीकार करना ही एकमात्र शर्त है. लिंडसे ग्राहम ने X पर लिखा,
“सऊदी अरब और दूसरों के लिए: अब नए मिडिल ईस्ट के भविष्य के लिए हिम्मत दिखाने का समय है. मुझे उम्मीद है, जैसा कि प्रेसिडेंट ट्रंप ने कहा है, आप असल में अब्राहम अकॉर्ड में शामिल होंगे, जिससे अरब-इजरायली लड़ाई असरदार तरीके से खत्म हो जाएगी. अगर आप प्रेसिडेंट ट्रंप के बताए रास्ते पर चलने से मना करते हैं, तो इसका हमारे आने वाले रिश्तों पर बुरा असर पड़ेगा और यह शांति प्रस्ताव नामंजूर हो जाएगा. इसके अलावा, इतिहास इसे एक बड़ी गलती मानेगा.”
गृह युद्ध के डर से कांपते शरीफ-मुनीर
पाकिस्तान के लिए ट्रंप का यह ‘अनिवार्य’ फरमान किसी डरावने सपने जैसा है. पाकिस्तान अगर इस पर साइन करता है, तो वह किसी डिप्लोमैटिक जीत का हिस्सा नहीं बनेगा, बल्कि खुद अपने ही बुने चक्रव्यूह में ऐसा फंसेगा कि उसका बच निकलना नामुमकिन हो जाएगा. इसके पीछे 3 सबसे बड़ी वजहें हैं,
1- आवाम की बगावत का डर:
पाकिस्तान की राजनीति और अवाम में फिलिस्तीन के मुद्दे को लेकर बेहद कड़ा और भावुक रुख है. पाकिस्तान के हरे रंग के पासपोर्ट पर आज भी साफ अक्षरों में लिखा है:
“यह पासपोर्ट इजरायल को छोड़कर दुनिया के सभी देशों के लिए वैध है.”
डिप्लोमेटिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ से जुड़े रोहित शर्मा कहते हैं,
जरा सोचकर देखिए कि जिस देश की जनता सुबह से शाम तक इजरायल के खिलाफ नारे लगाती हो, वहां की शहबाज शरीफ सरकार अचानक इजरायल के दूतावास को इस्लामाबाद में खोलने की मंजूरी दे दे तो क्या होगा. पाकिस्तान की कट्टरपंथी धार्मिक पार्टियां और लाखों की भीड़ सड़कों पर उतर आएगी. सेना के लिए भी इस गुस्से को संभालना नामुमकिन हो जाएगा और देश सीधे गृहयुद्ध (Civil War) की आग में झुलस जाएगा.
पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार पहले ही हाथ खड़े कर चुके हैं कि
जब तक टू-स्टेट सॉल्यूशन के तहत स्वतंत्र फिलिस्तीन नहीं बनता, उनका मुल्का किसी भी सूरत में इजरायल कबूल नहीं करेगा.
2. ईरान से सीधी दुश्मनी का डर:
पाकिस्तान का पड़ोसी देश ईरान, इजरायल का सबसे बड़ा दुश्मन है. पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमा विवाद, बलूच उग्रवाद और सुरक्षा को लेकर पहले ही छत्तीस का आंकड़ा रहता है. ऐसे में अगर पाकिस्तान, अमेरिकी और इजरायली खेमे (Abraham Accords) में जाकर बैठ जाता है, तो ईरान इसे अपनी पीठ में छुरा घोंपने जैसा मानेगा.
डिप्लोमेटिक थिंक टैंक ‘इंडिया मैटर्स’ से जुड़े रोहित शर्मा कहते हैं,
ईरान इसे अपने खिलाफ एक सीधी घेराबंदी समझेगा, जिसके बाद पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा हमेशा के लिए धधक उठेगी. कंगाली के इस दौर में पाकिस्तान एक और नया मोर्चा खोलने की हैसियत में बिल्कुल नहीं है.
3. कश्मीर मुद्दे पर ‘सेल्फ-गोल’ और सऊदी से दूरी:
पाकिस्तान हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर और फिलिस्तीन के मुद्दे को एक तराजू में तौलता आया है. वह दुनिया से कहता है कि दोनों ही जगहें ‘मुस्लिम अवाम के अधूरे एजेंडे’ हैं.
अगर पाकिस्तान खुद फिलिस्तीन के मुद्दे पर समझौता करके इजरायल को अपना दोस्त मान लेता है, तो भारत के खिलाफ कश्मीर मुद्दे पर राग अलापने का उसका ‘नैतिक अधिकार’ (Moral Ground) हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. दुनिया कहेगी कि जब आपने फिलिस्तीन छोड़ दिया, तो कश्मीर पर आपका रोना कैसा?
ऊपर से, सऊदी अरब खुद इस समझौते पर साइन करने से लगातार हिचक रहा है. सऊदी का स्टैंड क्लियर है कि जब तक फिलिस्तीनियों को उनका हक नहीं मिलता, वह इजरायल को मान्यता नहीं देगा. सऊदी खुद को मुस्लिम वर्ल्ड का लीडर मानता है. ऐसे में अगर पाकिस्तान सऊदी से पहले घुटने टेक देता है, तो वह पूरे मुस्लिम ब्लॉक में लीडर तो छोड़िए, ‘गद्दार’ की तरह अलग-थलग पड़ जाएगा.
पैर पर कुल्हाड़ी मारने वाली हालत
डॉनल्ड ट्रंप अच्छी तरह जानते हैं कि पाकिस्तान इस समय इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) के कर्ज और सऊदी की खैरात के भरोसे ही अपनी सांसें ले रहा है. इसी कंगाली की दुखती रग पर ट्रंप ने पैर रख दिया है.
अब पाकिस्तान के सामने अजीब सी हालत है. अगर अमेरिका की बात नहीं मानता तो भूखों मरने की नौबत आ सकती है, और अगर बात मान लेता है तो मुल्क के अंदर ही लाशें बिछने का खतरा है. शहबाज शरीफ के लिए यह वाकई अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा साबित होने वाला है.
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