अल-नीनो चौखट पर… भारत में पड़ेगी प्रचंड गर्मी, इन देशों में पड़ेगा सूखा

वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया को चेतावनी दी है कि साल 2026 में एक बेहद शक्तिशाली अल-नीनो घटना बनने वाली है. यह रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज सबसे मजबूत अल-नीनो में से एक साबित हो सकता है. कई अंतरराष्ट्रीय जलवायु मॉडल और अमेरिका के NOAA जैसे प्रमुख मौसम संगठन अब इसकी पुष्टि कर रहे हैं कि मई-जुलाई 2026 तक अल-नीनो बनने की 82 प्रतिशत संभावना है. दिसंबर 2026 तक यह 96 प्रतिशत पक्का माना जा रहा है. 

कुछ पूर्वानुमान तो यह भी कह रहे हैं कि यह 1877 के भयानक अल-नीनो से भी ज्यादा विनाशकारी हो सकता है. इस घटना का असर न सिर्फ समुद्र पर बल्कि पूरी दुनिया के मौसम, कृषि, पानी और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
अल-नीनो एक प्राकृतिक क्लाइमेट साइकिल है जो प्रशांत महासागर के भूमध्य रेखा वाले हिस्से में होता है. सामान्य स्थिति में यहां पूर्वी दिशा से हवाएं चलती हैं जो गर्म पानी को पश्चिम की ओर धकेलती रहती हैं. लेकिन जब अल-नीनो बनता है तो ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या उल्टी दिशा में चलने लगती हैं. 
नतीजतन प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में गर्म पानी जमा हो जाता है. यह गर्म पानी हवा के रुख को बदल देता है. पूरी पृथ्वी पर मौसम का पैटर्न बदल जाता है. अल-नीनो आमतौर पर हर 2 से 7 साल में आता है और 9 से 12 महीने तक रहता है. इसकी ताकत को समुद्र के पानी के तापमान से मापा जाता है. 
अगर तापमान औसत से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ जाए तो उसे सुपर अल-नीनो कहा जाता है. 2015-16 का अल-नीनो आखिरी सुपर अल-नीनो था. अब 2026 में फिर एक मजबूत या सुपर अल-नीनो बनने की आशंका जताई जा रही है. 

दुनिया भर में संभावित मौसम आपदाएं

अल-नीनो का प्रभाव हर जगह अलग-अलग होता है. कुछ जगहों पर भारी बारिश और बाढ़ आएगी तो कुछ जगहों पर लंबा सूखा पड़ेगा… 
• दक्षिण अमेरिका: ब्राजील, पेरू और आसपास के इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ की आशंका.
• ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया: सूखा और जंगल की आग बढ़ सकती है.
• अफ्रीका: दक्षिणी अफ्रीका में सूखा और भुखमरी का खतरा.
• अमेरिका: सर्दियों में दक्षिणी राज्यों में ज्यादा बारिश जबकि उत्तरी हिस्सों में गर्मी.
• तूफान: अटलांटिक महासागर में तूफानों की संख्या कम हो सकती है लेकिन प्रशांत महासागर में बढ़ सकती है.

2026 का अल-नीनो क्यों खास और खतरनाक है?

इस बार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि अल-नीनो पहले से ही गर्म हो चुकी पृथ्वी पर आ रहा है. पिछले कई सालों से समुद्र का तापमान असामान्य रूप से ऊंचा चल रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण ग्लोबल वार्मिंग तेज हो रही है. ऐसे में एक शक्तिशाली अल-नीनो आने से दोनों की प्रभाव बढ़ जाएंगे. 

NOAA के अनुसार, समुद्र की गहराई में पहले से ही बहुत बड़ा गर्म पानी का भंडार बन चुका है जो सतह पर आएगा और अल-नीनो को और मजबूत बनाएगा. कुछ मॉडल्स के मुताबिक नवंबर तक समुद्र का तापमान औसत से 3 डिग्री तक बढ़ सकता है. इससे 2026-2027 में वैश्विक तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है. 
वैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह अल-नीनो सिर्फ मौसमी बदलाव नहीं लाएगा बल्कि पहले से मौजूद सूखा, गर्मी और पानी की कमी की समस्या को और गंभीर बना देगा.

इतिहास के सबसे भयानक अल-नीनो

1877 का अल-नीनो अब तक का सबसे विनाशकारी माना जाता है. उस समय भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका के कई हिस्सों में भयंकर सूखा पड़ा. फसलें पूरी तरह नष्ट हो गईं. भारत में भी बड़े पैमाने पर अकाल पड़ा और लाखों लोग भूख से मारे गए. 1982-83, 1997-98 और 2015-16 के अल-नीनो भी बहुत शक्तिशाली थे.
2023-24 वाला अल-नीनो भी सूखा, बाढ़ और रिकॉर्ड गर्मी के लिए जिम्मेदार रहा. 2026 का अल-नीनो अगर सुपर कैटेगरी में पहुंचा तो इन सभी से ज्यादा प्रभाव डाल सकता है क्योंकि आज दुनिया पहले से ज्यादा गर्म है. 

भारत पर अल-नीनो का प्रभाव

भारत में अल-नीनो का सबसे ज्यादा असर मानसून पर पड़ता है. मजबूत अल-नीनो के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर होता है. नतीजतन देश के कई हिस्सों में बारिश कम हो जाती है. खासकर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार में बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ जाती हैं क्योंकि वायुमंडल में नमी और अस्थिरता बढ़ जाती है. ये राज्य पहले से ही अल-नीनो प्रभावित क्षेत्र माने जाते हैं. 
कृषि पर सबसे बड़ा खतरा होगा. चावल, गेहूं, दालें और अन्य फसलों का उत्पादन घट सकता है. दक्षिण-पूर्व एशिया और भारत में मानसून कमजोर होने से सूखा पड़ने की आशंका बढ़ जाएगी. किसानों को पानी की कमी, बढ़ती गर्मी और फसल खराब होने का सामना करना पड़ सकता है. चावल और पाम ऑयल उत्पादन में कमी आने से खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं.

कृषि, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य पर असर

अल-नीनो के दौरान वैश्विक खाद्य उत्पादन प्रभावित होता है. 2026 में अगर फसलें कम हुईं तो दुनिया भर में अनाज की कमी हो सकती है. गरीब देशों में भुखमरी बढ़ेगी. पानी की कमी से पेयजल संकट गहराएगा. हीटवेव बढ़ने से स्वास्थ्य समस्याएं जैसे हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और बीमारियां बढ़ेंगी.

मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियां भी फैल सकती हैं क्योंकि मच्छरों के लिए अनुकूल मौसम बनेगा. मछली पालन और समुद्री उद्योग भी प्रभावित होंगे. कोरल ब्लीचिंग से समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचेगा.
वैज्ञानिकों का कहना है कि मानवीय गतिविधियों से हो रही ग्लोबल वार्मिंग अल-नीनो को और खतरनाक बना रही है. पहले अल-नीनो अकेले आता था लेकिन अब यह वार्मिंग के ऊपर सवार होकर और ज्यादा विनाश फैला रहा है. भविष्य में ऐसे मजबूत अल-नीनो और भी बार-बार आ सकते हैं. 
हालांकि अल-नीनो बनना लगभग तय है लेकिन इसकी एक्सट्रीम ताकत अभी अनिश्चित है. NOAA के अनुसार बहुत मजबूत श्रेणी में पहुंचने की संभावना अभी 37 प्रतिशत ही है. गर्मियों में हवाओं के रुख पर निर्भर करेगा कि यह कितना मजबूत बनेगा. वैज्ञानिक लगातार सैटेलाइट, बुऑय और कंप्यूटर मॉडल से निगरानी कर रहे हैं.

सावधानी ही बचाव है

2026 का अल-नीनो एक बड़ी चुनौती बनने वाला है. यह सिर्फ मौसम नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा, पानी, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है. अगर हम समय रहते तैयारी कर लें तो नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है. वैज्ञानिक लगातार नजर रखे हुए हैं और नियमित अपडेट जारी कर रहे हैं. आम लोगों को भी जागरूक रहना चाहिए और सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए.

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