इस गांव में कोई जाति-धर्म नहीं पूछेगा, भेदभाव पर होगा एक्शन, पंचायत ने जो किया, सरकारें न कर पाईं

महाराष्ट्र के अहिल्यानगर से लगभग 60 किलोमीटर दूर सौंडाला गांव पड़ता है. ग्राम पंचायत कार्यालय में 5 फरवरी को ग्राम सभा की बैठक हुई और दिनकर की इन पंक्तियों को चरितार्थ कर दिया गया. सभा में गांव को “जाति-मुक्त” बनाने और हर तरह के भेदभाव को खत्म करने का प्रस्ताव पास किया गया. इंडियन एक्सप्रेस ने इस खबर को रिपोर्ट किया है.
इस फैसले का असर केवल कागज तक सीमित नहीं है. एक छात्रा गौरी भंड ने अपनी सहेली माहिरा सैय्यद की ओर इशारा करते हुए इंडियन एक्सप्रेस के सोहम शाह को बताया कि पिछले हफ्ते हुए हिंदू धार्मिक पाठ और त्योहार में माहिरा (जो मुस्लिम है) ने भी सबके साथ खाना खाया. बच्चों का कहना है कि ईसाई, मुस्लिम, मराठा, सभी के बराबर अधिकार हैं.

गांव के सरपंच शरद अरगड़े हैं. उनके नेतृत्व में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि मौजे सौंडाला में जाति, धर्म, पंथ या नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा. प्रस्ताव में कहा गया है कि गांव “मानवता धर्म” के सिद्धांत को अपनाएगा. इसके साथ ही सार्वजनिक स्थान, सरकारी सेवाएं, पानी के स्रोत, मंदिर, श्मशान, स्कूल और सार्वजनिक कार्यक्रम सभी के लिए खुले रहेंगे. ग्राम सभा ने यह भी तय किया है कि जातीय तनाव फैलाने वाले सोशल मीडिया पोस्ट पर कार्रवाई की जाएगी.
रिपोर्ट के मुताबिक करीब 2,500 की आबादी वाले इस गांव में 65 प्रतिशत मराठा समुदाय के लोग हैं. लगभग 20 प्रतिशत यानी करीब 60 परिवार अनुसूचित जाति के हैं. इनमें से 15-20 परिवार ईसाई धर्म मानते हैं. गांव में तीन मुस्लिम परिवार भी रहते हैं. सरपंच अरगड़े के मुताबिक पिछले दस साल में यहां कोई अत्याचार का मामला दर्ज नहीं हुआ और यह प्रस्ताव एक एहतियाती कदम है, ताकि समाज में बढ़ती नफरत गांव तक न पहुंचे.
सरकारी स्कूल में टीचर अशोक पंडित बताते हैं कि परीक्षा से पहले सभी बच्चे, जिनमें माहिरा भी शामिल है, स्कूल के सामने स्थित दो मंदिरों में सिर झुकाते हैं. उनका कहना है कि बच्चों में भेदभाव नहीं है, लेकिन आगे पढ़ाई के लिए बाहर जाने पर वे समाज के प्रभाव में आ सकते हैं. इसलिए स्कूल स्तर पर ही भेदभाव खत्म करना जरूरी है.

इससे पहले सितंबर 2024 में इसी ग्राम सभा ने विधवा पुनर्विवाह को बढ़ावा देने के लिए 11 हजार रुपये की सहायता देने का प्रस्ताव पास किया था. नवंबर 2024 में महिलाओं का अपमान करने वाले गाली-गलौज वाले शब्दों पर भी गांव में प्रतिबंध लगाया गया था.

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