हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्थिति को अभेद्य बनाने और चीन की नौसैनिक दादागिरी को रोकने के लिए भारत सरकार ने एक बेहद बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के सबसे दक्षिणी छोर पर स्थित ग्रेट निकोबार द्वीप के विकास को लेकर रक्षा मंत्रालय ने बड़ा रणनीतिक बदलाव किया है.
सरकार ने ग्रेट निकोबार में ₹13,000 करोड़ की लागत से एक नए ग्रीनफील्ड ‘डुअल-यूज़’ (सैन्य और नागरिक उपयोग) हवाई अड्डे के निर्माण को हरी झंडी दे दी है. पिछले काफी समय से चर्चा में रहे भारतीय नौसेना के मौजूदा एयरफील्ड ‘आईएनएस बाज़’ के विस्तार की योजना को आधिकारिक तौर पर रद्द कर दिया गया है.

आईएनएस बाज़ हवाई पट्टी की लंबाई को अब वर्तमान 4,500 फीट से आगे नहीं बढ़ाया जाएगा. इसके बजाय, पूरा ध्यान और निवेश इसी द्वीप पर स्थित चिंगेन (Chingen) नामक स्थान पर एक बिल्कुल नए और विशाल हवाई अड्डे को विकसित करने पर केंद्रित किया जाएगा.
यह नया एयरपोर्ट न केवल भारतीय नौसेना और वायुसेना के लड़ाकू विमानों व मालवाहक विमानों के संचालन के लिए रणनीतिक बेस बनेगा, बल्कि इससे इस द्वीप पर नागरिक उड्डयन और पर्यटन को भी एक नई उड़ान मिलेगी.
क्यों रद्द हुआ INS बाज के विस्तार का प्लान?
ग्रेट निकोबार के कैंपबेल बे में स्थित आईएनएस बाज नौसैनिक हवाई स्टेशन साल 2012 से लगातार चालू है. शुरुआती दिनों में इसकी रनवे की लंबाई महज 3500 फीट थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 4500 फीट किया गया था. सरकार की मूल योजना के तहत इस रनवे को 10000 फीट तक बढ़ाने का प्रस्ताव था, ताकि यहां से Su-30MKI जैसे लड़ाकू विमान और पी-8आई जैसे समुद्री निगरानी विमान आसानी से उड़ान भर सकें. लेकिन जब रक्षा मंत्रालय और पर्यावरण विशेषज्ञों ने जमीन पर इसका विस्तृत सर्वेक्षण किया, तो कई बड़ी बाधाएं सामने आईं.
आईएनएस बाज़ के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर भूमि अधिग्रहण और पेड़ों की कटाई करनी पड़ती. समुद्र में बड़े स्तर पर ड्रेजिंग (मिट्टी की खुदाई) की आवश्यकता थी. द्वीप की भौगोलिक बनावट और हवाई नेविगेशन के लिहाज से भी यहां कई प्राकृतिक रुकावटें थीं.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यदि आईएनएस बाज़ का विस्तार किया जाता, तो वहां की स्थानीय आदिवासी आबादी, दुर्लभ वनस्पतियों और वन्यजीवों पर इसका बेहद गंभीर और विनाशकारी प्रभाव पड़ता. भविष्य के विस्तार की संभावनाएं भी वहां बेहद सीमित थीं.

इन्हीं तमाम पर्यावरण, सामाजिक और तकनीकी कारणों को देखते हुए सरकार ने इस योजना को रोक दिया. आईएनएस बाज से करीब 30 किलोमीटर दक्षिण में गैलाथिया बे (Galathea Bay) के पास स्थित चिंगेन को नए ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के लिए चुना.
ग्रेट निकोबार का ₹81,000 करोड़ का ‘महा-प्रोजेक्ट’
यह बुनियादी ढांचा परियोजना पिछले कुछ दिनों से देश में भारी राजनीतिक बयानबाजी का केंद्र भी बनी हुई थी. कुछ दिनों पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दावा किया था कि भारतीय नौसेना पिछले 5 वर्षों से आईएनएस बाज के विस्तार की मांग कर रही है, लेकिन सरकार उनकी इस मांग की अनदेखी कर रही है.
उन्होंने कहा था कि यदि सरकार आईएनएस बाज का विस्तार करती है, तो विपक्ष इसका पूरा समर्थन करेगा. रक्षा मंत्रालय के इस नए खुलासे ने साफ कर दिया है कि सरकार नौसेना की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं कर रही है, बल्कि पर्यावरण को सुरक्षित रखते हुए एक अधिक आधुनिक और बड़ा विकल्प तैयार कर रही है.
चिंगेन में बनने वाला यह ₹13,000 करोड़ का डुअल-यूज़ एयरपोर्ट वास्तव में केंद्र सरकार के ‘ग्रेट निकोबार द्वीप समूह विकास कार्यक्रम’ का एक हिस्सा है. सरकार इस पूरे द्वीप के कायाकल्प के लिए कुल ₹81,000 करोड़ के चार बड़े प्रोजेक्ट्स पर एक साथ काम कर रही है. इन चार महा-परियोजनाओं में शामिल हैं…
• एक विशाल अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (ICTP), जो वैश्विक व्यापार का मुख्य केंद्र बनेगा.
• चिंगेन में बनने वाला यह कंबाइंड-यूज़ (मिलिट्री और सिविल) ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा.
• इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर को निर्बाध बिजली देने के लिए एक विशाल पावर प्लांट का निर्माण.
• एक आधुनिक टाउनशिप (शहरी इलाका) का विकास.
चीन की ‘रग’ पर भारत का हाथ: क्यों बेहद खास है यह लोकेशन?
भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से देखा जाए तो ग्रेट निकोबार द्वीप भारत का आखिरी छोर है, लेकिन यह वैश्विक महासागर की सबसे महत्वपूर्ण ‘चेकपोस्ट’ पर स्थित है. यह प्रस्तावित हवाई अड्डा और बंदरगाह दुनिया के सबसे संवेदनशील और व्यस्त समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ मलक्का के बिल्कुल मुहाने पर स्थित हैं. मलक्का को चीन की सबसे कमजोर नस या उसकी ‘दुखती रग’ माना जाता है.
चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए पूरी तरह इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर है. चीन द्वारा आयात किए जाने वाले कुल कच्चे तेल का लगभग 80 प्रतिशत और उसकी कुल एलएनजी का लगभग 70 प्रतिशत इसी संवेदनशील मलक्का जलमार्ग से होकर गुजरता है.पूरी दुनिया के कुल ऊर्जा व्यापार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा और वैश्विक कंटेनर परिवहन का आधा हिस्सा इसी क्षेत्र से पार होता है.
चिंगेन में 10,000 फीट से बड़ा रनवे बनने के बाद, भारतीय नौसेना और वायुसेना यहां अपने सबसे घातक लड़ाकू विमानों, लड़ाकू जहाजों और ड्रोन को स्थायी रूप से तैनात कर पाएगी. संकट या युद्ध की स्थिति में भारत यहां से पूरी स्ट्रेट ऑफ मलक्का की नाकेबंदी करने की क्षमता हासिल कर लेगा, जिससे चीनी नौसेना का हिंद महासागर में प्रवेश करना पूरी तरह नामुमकिन हो जाएगा. यह ₹13,000 करोड़ का एयरपोर्ट आने वाले समय में भारत की सुरक्षा का सबसे मजबूत किला साबित होने वाला है.
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