नीम का तेल बना सुरक्षा कवच, कई गांवों में अब तक एक भी कोरोना संक्रमित नहीं

आदिवासी समाज में कई बरसों से नीम के तेल का इस्तेमाल बीमारियों के इलाज में होता आ रहे हैं।

देश में कोरोना संकट रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इस महामारी को रोकने लोग कई तरह की चीजों का उपयोग कर रहे हैं। यहां तक इसे खत्म करने का भी दावा कर रहे हैं। पिछले एक साल से हल्दी, काढ़ा, सेंधा नमक, प्याज आदि चीजों को कोविड से लड़ने का कवच बताया जा रहा है। यहां तक की लोग गोमूत्र का सेवन भी कर रहे हैं। इस बीच झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले से एक खबर सामने आई हैं। यहां आदिवासी बहुल गांवों में कोरोना का एक भी केस अबतक सामने नहीं आया है। दरअसल यहां बड़ी संख्या में लोग नीम का तेल इस्तेमाल कर रहे हैं। यह उनके लिए सैनिटाइजर का काम कर रहा है। आदिवासी समाज में कई बरसों से नीम के तेल का इस्तेमाल बीमारियों के इलाज में होता आ रहे हैं। खासतौर पर यह संक्रमण से बचाव करता है। ऐसे में गांववासी कोविड से बचने इसका उपयोग कर रहे हैं। लोग घर से बाहर निकलने से पहले शरीर में इसे लगा लेते हैं।

गांव वालों का कहना है कि नीम का तेल उनके शरीर को वायरस से बचाने के लिए एक तरह का सुरक्षा कवच है। कुमारडुंगी प्रखंड के पंचाभोया गांव के हर घर में नीम का तेल मिलता है। जब कोई शख्स गांव से बाहर जाता है तो अपने शरीर में नीम का तेल लगा लेता है। गांव के रहने वाले अंकुरा बागे ने कहा कि आजतक कोई भी व्यक्ति कोरोना संक्रमित नहीं हुआ है। इस गांव के लोगों ने अतिरिक्त सुरक्षा के लिए गांव के अंदर से गुजरने वाली सड़कों के दोरों छोर को बंद कर दिया है। बागे ने बताया कि दूसरे राज्य से लौट रहे लोगों के लिए सात दिन की क्वारंटाइन की व्यवस्था गांव के बाहर की गई है।

ग्रामीण दियुरी सह जड़ी-बूटी विशेषज्ञ बीरबल बागे का कहना है कि नीम के पत्ते और बीज में कई औषधीय गुण होते हैं। कोविड महमारी में मैंने खुद को संक्रमण से बचाने के लिए नीम के छिलकों को पीसकर काढ़ा बनाकर पीना शुरू किया है। मैं नीम के बीज का तेल सैनिटाइजर के रूप में इस्तेमाल करता हूं।

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