दवाई:’मिसाइल मैन’ के कहने पर डीआरडीई ने ग्वालियर में बनाई थी 2 डीजी ऑक्सी डी ग्लूकोज, अब कोरोना के इलाज में इस्तेमाल

काेराेना वायरस के खात्मे के लिए उपयोग की जा रही 2 डीजी ऑक्सी डी ग्लूकोज काे बनाने का लक्ष्य मिसाइल मैन डॉ. अब्दुल कलाम ने ग्वालियर रक्षा अनुसंधान एवं विकास स्थापना (डीआरडीई) को दिया था। 25 साल पहले इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज(एनमास) कैंसर थेरेपी के लिए इस दवा को बनाने काम शुरू किया गया था, फिर ब्रेन ट्यूमर के लिए इसी मॉलिक्यूल पर जर्मनी ने भी एनमास को प्रोजेक्ट दिया। अब इस दवा का परीक्षण काेराेना मरीजाें पर किया गया और सफलता भी मिल गई।

भारत को इस दवा के बनाने से रोकने के लिए अमेरिका ने रक्षा अनुसंधान विकास संगठन (डीआरडीओ) की 23 लैब को प्रतिबंधित कर अपनी फार्मा इंडस्ट्री से माॅलिक्यूल सप्लाई रुकवा दी थी। भारत में कोरोना के इलाज के लिए प्रभावी दवा के रूप में उपयोग किए जा रहे इस मॉलिक्यूल को सबसे पहले अनुसंधान कर संश्लेषित करने वाले डीआरडीई के सेवानिवृत वैज्ञानिक डॉ. करुणा शंकर पांडे नेे दैनिक भास्कर से खास बातचीत में यह खुलासा किया।

2 डीजी ऑक्सी डी ग्लूकोज मॉलिक्यूल पर काम करते हुए 1996 में जब इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (एनमास) ने एम्स नई दिल्ली एवं केएमआईआर बेंगलुरु में क्लिनिकल ट्रायल के लिए मरीज भर्ती कर लिए गए थे उसी समय यूएस की फार्मा इंडस्ट्री द्वारा मॉलिक्यूल की सप्लाई बंद कर दी जिससे परीक्षण रुक गया। इसी समय डीआरडीओ की डिफेंस रिसर्च काउंसिल (डीअारसी) की मासिक बैठक में संगठन के महानिदेशक डॉ. अब्दुल कलाम के सामने एनमास तत्कालीन डायरेक्टर डॉ. विनय जैन में यह मुद्दा रखा।

पहले ट्रायल में चूहे मरे और उसके बाद अनुसंधान किया तो सफल हो गया फॉर्मूला

डीआरडीई के वैज्ञानिकों ने इस प्रोजेक्ट पर एक साल में मॉलिक्यूल को खोज कर काम शुरू किया। इसके शुरुआती ट्रायल में जब चूहों पर परीक्षण किया गया तो चूहों की मौत हो गई। इसका कारण जब खोजा गया तो पता चला जिस मॉलिक्यूल बेरियम कार्बोनेट को चूहा मारने के लिए उपयोग किया जाता है वह ग्लूकोज से निकला नहीं था। बाद में फिर ग्लूकोज के मूल तत्व का सूक्ष्म संश्लेषण क्रिया कर बेरियम कार्बोनेट को निकाल कर जब परीक्षण किया गया तब परीक्षण पूरी तरह सफल हो गया।

इसके बाद डीआरडीओ ने इस पर आईसीएमआर की मंजूरी लेकर ड्रग कंट्रोलर से भी मंजूरी ली और फिर उसके प्रोसेस पर पेटेंट कराया। भारत में इस मॉलिक्यूल को सबसे पहले डीआरडीई ने 1998 में संश्लेषित कर पैटेंट कराया, जो 2002 में मिला। इस मॉलिक्यूल को बनाने की पेटेंट टीम में डॉ. करुणा शंकर पांडे, डॉ. शशि नाथ दुबे, डॉ. रामामूर्ति वेदनाथ स्वामी एवं इनमास के डॉ. राकेश कुमार शर्मा, डॉ. बीएस द्वारकानाथ शामिल थे।

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