विधानसभा उपचुनाव का महाभारत किसकी नाव डूबेगी सिंधिया की या कमलनाथ की.


अशोक नगर के राजपुर में कमलनाथ की 11 अक्तूबर को जनसभा थी। कमलनाथ के पहुंचने के पहले पंडाल खचाखच भर गया। जनता ने जोरदार अभिवादन किया। कमलनाथ गदगद हैं। उन्हें लग रहा है कि मध्यप्रदेश की पीठ में घुसे खंजर का बदला लेकर जै जै कमलनाथ बना देगी। दूसरा दृश्य भी है। महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर चंबल के कार्यकर्ताओं को संदेश दे रहे हैं कि पूरे गांव में संदेश भेज देना। यह चुनाव महाराज का है। यह उपचुनाव नहीं महाराज के मान-सम्मान का चुनाव है। लोग कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को उनकी गद्दारी का सबक सिखाएं। मध्यप्रदेश का उपचुनाव कुछ इसी तरफ आगे बढ़ रहा है कि जीते तो जै जै कमलनाथ, हारे तो डूबे महाराज।

ज्योतिरादित्य सिंधिया 10 अक्तूबर को जनसभा में थे। वहां उन्हें बताना पड़ रहा था कि ज्योतिरादित्य सिंधिया आपका था, आपका है और आपका रहेगा। पहले जिस सिंधिया की एक आवाज पर तालियों की गडगड़ाहट से जनसभा गूंज जाती थी, अब उसी सिंधिया के बार-बार वहीं अंदाज दिखाने, मंच से ताली के प्रोत्साहन के बाद इस जनसभा में बमुश्किल उस तरह की तालियों की गडगड़ाहट सुनाई पड़ी। हां, सिंधिया से ज्यादा भीड़ राज्य के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की जनसभा में न केवल दिखाई दी, बल्कि उन्होंने तालियां भी बटोरी। खैर यह चुनाव का मौसम है। सब चलता है।

उपचुनाव नहीं महासंग्राम है

मध्यप्रदेश की 28 सीटों का उपचुनाव नहीं, महासंग्राम है। मध्यप्रदेश चुनाव कवरेज में गए मीडिया कर्मियों का भी कहना है कि चुनाव कमलनाथ बनाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का फ्लेवर लिए हुए है। कमलनाथ और कांग्रेस की टीम ज्योतिरादित्य सिंधिया को गद्दार बता रही है। कमलनाथ अपनी जनसभा में अपनी डेढ़ साल की सरकार के कदम बता रहे हैं। वहीं सिंधिया कमलनाथ की डेढ़ साल की सरकार के कदमों की आलोचना कर रहे हैं।

भिंड के राजकुमार को कमलनाथ की डेढ़ साल की सरकार पर हमला जरा कम ठीक लग रहा है। राजकुमार का कहना है कि अभी तो कमलनाथ सरकार का कामकाज देखा जाना था। वह कुछ कर पाते कि इससे पहले सरकार गिर गई। राजकुमार कहते हैं कि सिंधिया ने पीठ में छूरा भोंका। क्योंकि वह मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। राजकुमार कहते हैं कि हिंदुस्तान का इतिहास इस तरह के लोगों को जल्दी माफ नहीं कर पाता। अनिल मिश्रा का कहना है कि यह राजनीति है। ग्वालियर चंबल संभाग में स्व. माधव राव सिंधिया का कद था। ज्योतिरादित्य सिंधिया का एक कद है। इसका फायदा भाजपा को मिलेगा।

दोनों तरफ से पूरी तैयारी

मध्यप्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा के सामने सबसे बड़ी चुनौती शिवराज सिंह चौहान की सरकार बनाए रखने की है। यह तभी संभव है जब भाजपा कम से कम उपचुनाव की 16 सीटें जीत ले। इसके लिए शिवराज सिंह चौहान ने भी ऐड़ी चोटी का जोर लगाया है। केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर लगातार क्षेत्र से अपडेट ले रहे हैं। राज्यसभा सांसद, वरिष्ठ नेता विनय सहस्रबुद्धे लगातार उपचुनाव पर निगाहें गड़ाए हैं। उपचुनाव की घोषणा हो जाने के बाद राज्य के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने भी राजनीतिक पहल तेज कर दी है।

दूसरी तरफ कमलनाथ, जीतू पटवारी, चुनाव प्रबंधन की कला में माहिर दिग्विजय सिंह समेत अन्य ने भी रणनीति में काफी धार दी है। कमलनाथ ने कई सर्वे एजेंसियों से लेकर चुनाव प्रचार एजेंसियों की सहायता ली है। उपचुनाव की रणनीति से लेकर मुद्दों पर खास ध्यान रखकर आगे बढ़ रहे हैं। टिकट बंटवारे में भी कमलनाथ ने पूरी पारदिर्शता बरती है और उन्हीं की चली है। कमलनाथ के लिए मध्यप्रदेश की राजनीति में खुद को स्थापित करने का यह सबसे बड़ा अवसर है।

भाजपा के लिए सिर दर्द

भाजपा के लिए अपने नेताओं को मनाना, उन्हें चुनाव प्रचार में उत्साह के साथ उतारना बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। उपचुनाव में ग्वालियर चंबल संभाग में सिंधिया के साथ भाजपा में गए सभी नेताओं को टिकट मिला है। इसके अलावा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए नेताओं को भी तवज्जो मिली है।

पार्टी के सूत्रों की माने तो इसके कारण कई भाजपा नेताओं में खासी नाराजगी है। विधानसभा चुनाव में नंबर दो पर आए भाजपा के नेताओं के सामने अपना राजनीतिक करियर दिखाई दे रहा है। माना जा रहा है कि भाजपा को इस भितरघात को रोकने में काफी जोर लगाना पड़ रहा है। कमलनाथ की उम्मीद भी इस भितरघात पर कुछ हद तक टिकी है।

जीते तो जै जै कमलनाथ, हारे तो डूबे महाराज

कांग्रेस और भाजपा के कई नेता इस उपचुनाव को ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए अहम मान रहे हैं। केपी सिंह भी। सिंधिया के लिए उपचुनाव करो या मरो जैसा है। सिंधिया के भाषण, उनके मैराथन प्रयास से भी इसी तरह के संकेत मिलते हैं। हालांकि भाजपा के नेताओं का कहना है कि अब वह हमारे नेता हैं। उनका मान-सम्मान और अपमान सब हमारा है। इसलिए पार्टी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। लेकिन राजनीति में नतीजा काफी मायने रखते हैं। उपचुनाव में अपने क्षेत्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह नतीजा काफी असर डालेगा। अभी वह केवल राज्यसभा सांसद हैं। अगर नतीजा ठीक नहीं आया तो आगे उनके करियर और भाजपा में मान-सम्मान में इसका फ्लेवर दिखाई दे सकता है।

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