महावतार बाबाजी दिव्यता का अनुभव आज भी हिमालय में होता है.

स्वामी केवलानंद हिमालय में महावतार बाबाजी के साथ कुछ समय रहे थे। उन्होंने बताया है कि बाबाजी अपने शिष्यों के साथ पर्वतों में एक स्थान से दूसरे स्थान को भ्रमण करते रहते हैं। उनकी छोटी सी शिष्य मंडली में दो अत्यंत उन्नत अमेरिकी शिष्य भी हैं। किसी स्थान पर कुछ समय बिताने के बाद बाबाजी कहते हैं- ‘डेरा डंडा उठाओ’। वे अपने पास एक डंडा रखते हैं। उनका यह आदेश अपनी मंडली के साथ तत्क्षण किसी दूसरे स्थान पर पहुंचने का संकेत होता है।

महावतार बाबाजी के बारे में पहली बार तब पता चला, जब सन 1946 में परमहंस योगानंद की विख्यात पुस्तक ‘आटोबायोग्राफी आफ अ योगी’ का पहला संस्करण छपा। इस पुस्तक का अब तक देश-विदेश की 50 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। हिंदी में अनूदित पुस्तक का नाम है- ‘योगी कथामृत’। पुस्तक के तैंतीसवें अध्याय में परमहंस जी ने बाबाजी के बारे में लिखा है- ‘बद्रीनाथ के आसपास के उत्तरी हिमालय के पहाड़ आज भी लाहिड़ी महाशय के गुरु बाबाजी की जीवंत उपस्थिति से पावन हो रहे हैं, जनसंसर्ग से दूर निर्जन प्रदेश में रहने वाले ये महागुरु शताब्दियों से, शायद सहस्राब्दियों से अपने स्थूल शरीर में वास कर रहे हैं।

बहुत कम लोगों को पता है कि दक्षिण भारत की फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत ने महावतार बाबाजी पर एक फिल्म भी बनाई है। परमहंस योगानंद के अनुसार महावतार बाबाजी की आध्यात्मिक अवस्था मानवी आकलन शक्ति से परे हैं। इसका अर्थ है कि वे आध्यात्मिक रूप से ईश्वरतुल्य हैं। उनकी योगेश्वर्य की कल्पना नहीं की जा सकती। वे आज भी उन अध्यात्म पथ पर पूर्ण मनोयोग से आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे साधकों को आशीर्वाद देते हैं, जो उन्हें सहायता के लिए पुकारते हैं। लाहिड़ी महाशय अर्थात महान संत श्यामा चरण लाहिड़ी महाशय, महावतार बाबाजी के 19वीं शताब्दी के शिष्य थे। महावतार बाबाजी से दीक्षा लेकर लाहिड़ी महाशय ने लुप्त क्रिया योग का पुनरुद्धार किया। अर्थात महावतार बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय को क्रिया योग को योग्य लोगों तक पहुंचाने का दिव्य माध्यम बनाया।

पुस्तक में महावतार बाबाजी के बारे में स्वामी केवलानंद की बातें भी रखी गई हैं। स्वामी केवलानंद हिमालय में महावतार बाबाजी के साथ कुछ समय रहे थे। उन्होंने बताया है कि बाबाजी अपने शिष्यों के साथ पर्वतों में एक स्थान से दूसरे स्थान को भ्रमण करते रहते हैं। उनकी छोटी सी शिष्य मंडली में दो अत्यंत उन्नत अमेरिकी शिष्य भी हैं। किसी स्थान पर कुछ समय बिताने के बाद बाबाजी कहते हैं- ‘डेरा डंडा उठाओ’। वे अपने पास एक डंडा रखते हैं। उनका यह आदेश अपनी मंडली के साथ तत्क्षण किसी दूसरे स्थान पर पहुंचने का संकेत होता है।

यह भी अद्भुत है कि बाबाजी की इच्छा होती है तभी उन्हें कोई पहचान पाता है। विभिन्न भक्तों को थोडे़ से परिवर्तन के साथ भिन्न-भिन्न रूपों में उन्होंने दर्शन दिए हैंै- कभी दाढ़ी- मूंछ के साथ, तो कभी दाढ़ी-मूंछ के बिना। उनकी अक्षय देह के लिए आहार की आवश्यकता नहीं पड़ती, इसलिए वे शायद ही कुछ खाते हैं। लेकिन जब वे शिष्यों को दर्शन देते हैं, तब लौकिक शिष्टाचार के रूप में कभी-कभी फल या चावल की खीर स्वीकार कर लेते हैं।

परमहंस योगानंद ने ‘आटोबायोग्राफी आॅफ अ योगी’ में लिखा है कि केवलानंद जी बताया था कि एक रात बाबाजी के शिष्य वैदिक होम के लिए जल रही विशाल अग्नि ज्वालाओं को घेर कर बैठे थे। अचानक महावतार बाबाजी ने एक जलती लकड़ी उठा ली और अग्नि के पास ही बैठे एक शिष्य के नंगे कंधे पर उससे हल्का सा प्रहार किया। वहां बैठे लाहिड़ी महाशय ने कहा- यह तो क्रूरता है गुरुदेव।

बाबाजी ने कहा- ‘अपने पिछले कर्मों के फलस्वरूप तुम्हारी आंखों के सामने वह पूरा जलकर राख हो जाता तो क्या वह तुम्हें अच्छा लगता?’ इन शब्दों के साथ ही बाबाजी ने शिष्य के आहत कंधे पर अपना आरोग्यकारी वरदहस्त रखा रखा और कहा- ‘आज रात मैंने तुम्हें पीड़ादायक मृत्यु के हाथों से मुक्त कर दिया है। अग्निदाह की थोड़ी सी पीड़ा अनुभव करने से तुम्हारा कर्मभोग मिट गया है।’

कहा जाता है कि महावतार बाबाजी ईश्वर की खोज कर रहे भक्तों के प्रति अत्यंत कृपालु हैं। महावतार बाबाजी के बारे में परमहंस योगानंद जी की अत्यंत उन्नत शिष्या दया माता ने अपनी पुस्तक ‘वनली लव’ (केवल प्रेम) में लिखा है कि जब वे द्वारहाट (जिला- अल्मोड़ा, उत्तराखंड) से कुछ किलोमीटर दूर महावतार बाबाजी की गुफा में गई थीं तो लौटते हुए रात को पास के एक डाक बंगले में रुकी थीं। वहां ध्यान करते समय महावतार बाबाजी का जो दर्शन किया उसे इस प्रकार लिखा है- कउस रात मैं सो न सकी।

जैसे ही मैं ध्यान में बैठी कि अचानक संपूर्ण कमरा सुनहरे प्रकाश से जगमगा उठा। फिर वह प्रकाश चमकीला नीला हो गया, और एक बार फिर हमारे प्रिय बाबाजी की उपस्थिति का आभास होने लगा। इस बार उन्होंने कहा- मेरी बच्ची, यह जान लो कि मुझे खोजने के लिए भक्तों को इस स्थान पर आने की आवश्यकता नहीं है। जो कोई भी मुझमें विश्वास करते हुए और मुझे पुकारते हुए गहन भक्ति भाव के साथ अपने अंतर में जाएगा, उसे मेरा प्रत्युत्तर प्राप्त होगा।’ दया माता को महावतार बाबाजी ने बताया कि वे केवल और केवल प्रेम हैं। उनका पूरा स्वरूप ही प्रेम है-दिव्य प्रेम।

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