PMFBY: इसलिए किसानों की जगह कंपनियों को मिल रहा पीएम फसल बीमा योजना का लाभ

किसान हितैषी बताने वाले सात राज्यों आंध्र प्रदेश, असम, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं तेलंगाना ने नहीं दिया फसल बीमा योजना में अपने हिस्से का प्रीमियम, पैसा देने के बावजूद भारी नुकसान में किसान

नई दिल्ली. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) का प्रीमियम जमा करने के बाद भी कई राज्यों में किसानों को प्राकृतिक आपदा से खराब हुई फसल के मुआवजे के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है. अव्वल तो कई इंश्योरेंस कंपनियां मुआवजा पूरा नहीं देतीं लेकिन वो भी जब समय पर नहीं मिलता तो किसान कर्ज लेकर खेती करने के लिए मजबूर होते हैं. इसकी बड़ी वजह राज्यों की कार्यशैली है. देश के सात बड़े सूबों ने 2018 से लेकर अब तक कई सीजन में अपने हिस्से का प्रीमियम जमा नहीं किया है. जिसकी वजह से किसान संकट में हैं. केंद्र के पैसे का नुकसान हो रहा है जबकि इंश्योरेंस कंपनियों को डबल फायदा मिल रहा. ऐसा कारनामा करने वाले कांग्रेस (Congress) और बीजेपी (BJP) दोनों के शासन वाले राज्य शामिल हैं, जो इन दिनों अपने आपको सबसे बड़ा किसान हितैषी बताने की कोशिश में जुटे हुए हैं.

केंद्रीय कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) के सचिव रहे सिराज हुसैन ने मीडिया  से बातचीत में कहा, “किसी भी बीमा योजना में जब कंपनी के पास पूरा प्रीमियम नहीं जमा होगा तो वो कैसे क्लेम दे सकता है. इसका सिर्फ और सिर्फ किसानों को नुकसान है. वे अपने हिस्से का प्रीमियम जमा करने के बावजूद फसल खराब होने पर क्लेम नहीं ले पाते. होना तो ये चाहिए कि जब किसान अपना प्रीमियम दे तभी राज्य सरकार भी अपना हिस्सा दे दे, ताकि ऐसी समस्या न आए. हालांकि, जब केंद्र सरकार जीएसटी (GST) में राज्यों की हिस्सेदारी तक नहीं दे रही है तो राज्यों की भी अपनी कुछ फाइनेंशियल मजबूरी हो सकती है.

किसका कितना प्रीमियम

पीएम फसल बीमा योजना (PMFBY) में प्रीमियम के तीन पार्ट किसान, केंद्र और राज्य होते हैं. किसानों को खरीफ फसलों के लिए कुल प्रीमियम का अधिकतम 2 फीसदी, रबी की खाद्य एवं तिलहन फसलों के लिए 1.5 फीसदी एवं कॅमर्शियल व बागवानी फसलों के लिए 5 फीसदी भुगतान करना होता है. प्रीमियम की शेष रकम ‘प्रीमियम सब्सिडी’ के रूप में केंद्र और राज्य सरकार मिलकर देती हैं. मैदानी राज्यों में यह हिस्सा 50-50 फीसदी का होता है. पूर्वोत्तर राज्यों में प्रीमियम सब्सिडी का 90 फीसदी हिस्सा केंद्र और 10 फीसदी स्टेट को देना होता है.

किन राज्यों ने नहीं दी प्रीमियम सब्सिडी

फसल बीमा योजना (Crop Insurance) में जिन राज्यों की  सब्सिडी (Premium Subsidy) का राज्य शेयर लंबित है उनमें आंध्र प्रदेश, असम, गुजरात, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान एवं तेलंगाना शामिल हैं. इन राज्यों को अपने हिस्से का 41 सौ करोड़ रुपये से अधिक बीमा कंपनियों को देना है. तब इनके किसानों को संबंधित सीजन में फसल नुकसान का क्लेम मिल पाएगा.

राज्यों की इस कार्यशैली से कंपनियों को सीधा फायदा

किसान शक्ति संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि अगर राज्य अपनी हिस्सेदारी नहीं देना चाहते तो वो इस स्कीम से अपने को बाहर कर लें और अपने हिसाब से फसल खराब होने पर मुआवजा दें. केंद्र और किसानों (Farmers) का अपना शेयर जमा होने के बाद भी कंपनी मुआवजा नहीं देगी. इस तरह कंपनी फायदे में रहेगी और किसान नुकसान में. केंद्र सरकार का दिया पैसा भी बेकार जाएगा.

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन में मध्य प्रदेश इकाई के अध्यक्ष राहुल राज कहते हैं कि कई राज्यों के हिस्से का पैसा तो 2018 से बाकी है. तब तो कोराना संकट भी नहीं था कि उसकी वजह से कोई फाइनेंशियल संकट का बहाना हो. दरअसल, यह सब एंटी फार्मर माइंडसेट की वजह से होता है और इसका सीधा फायदा बीमा कंपनियों को मिलता है. सभी पक्षों से प्रीमियम आने पर ही उन्हें किसान को मुआवजा देना पड़ता है. कोई एक पक्ष प्रीमियम न जमा करे तो कंपनी का तो फायदा ही फायदा है.

फसल बीमा का असली फायदा इंश्योरेंस कंपनियों को मिल रहा

राज्यों को देना ही होगा अपने हिस्से का पैसा

वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव वी. विजय साई रेड्डी ने केंद्र सरकार से पूछा है कि राज्यों के हालात को देखते हुए क्या कृषि मंत्रालय प्रीमियम की पूरी धनराशि के भुगतान का दायित्य उठाने पर विचार कर रहा है? जवाब में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि इस तरह का कोई प्रस्ताव नहीं है. इस योजना के तहत फसलों और क्षेत्रों के चयन, जोखिम और कार्यान्वयन में राज्य सरकारों की प्रमुख भूमिका है. इसका मतलब साफ है कि राज्यों को अपना हिस्सा देना होगा. हालांकि, रेड्डी का कहना है कि कभी-कभी फसल बीमा योजना में राज्यों का हिस्सा उनके पूरे कृषि बजट का 50 फीसदी होता है.

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