आपने बुलाया है तो आ जाऊँगा लेकिन मेरे पास गाड़ी नहीं है’ – वो मोदी, जो PM नहीं थे लेकिन वचन के पक्के थे

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आज 70 साल के हो गए। देश और दुनिया के सामने जितना कुछ नज़र आता है, वह है सिर्फ एक तस्वीर। तस्वीर में सब कुछ अति उत्तम है लेकिन तस्वीर में सब कुछ इतना बेहतर हुआ कैसे? इसके जवाब पर चर्चा का दायरा सीमित है।

स्टेशन पर अपने पिता के साथ चाय बेचने से लेकर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की कमान संभालने तक… 7 दशकों की यात्रा में ऐसे अनेक मौके आए, जब देश के प्रधानमंत्री के सामने हालात सामान्य नहीं थे। ऐसा ही एक किस्सा है, जब उन्हें एक समाचार समूह से चर्चा में शामिल होने का बुलावा आया और उन्होंने कहा उनके पास गाड़ी नहीं है।  

इससे पहले उनके जीवन के अन्य पहलुओं को जान लेते हैं। नरेन्द्र मोदी अपने बचपन में स्वभाव के बेहद शरारती थे, अक्सर साक्षात्कारों में उन्होंने इस बात का ज़िक्र भी किया है। एक बार मन की बात कार्यक्रम में उन्होंने इस बारे में एक किस्सा भी साझा किया । उन्होंने बताया था कि बचपन में शहनाई वालों को इमली का लालच देकर उनका ध्यान हटाया करते थे।

नरेन्द्र मोदी पढ़ाई में औसत थे पर उन्हें रंगमंच का बहुत ज़्यादा शौक था, उन्होंने कई नाटकों में भी हिस्सा लिया था। बचपन में सभी का कोई न कोई नाम होता है, नरेन्द्र मोदी का भी था। नरेन्द्र मोदी के दोस्त उन्हें ‘नरिया’ कह कर पुकारते थे। उन्हें यह नाम बहुत पसंद नहीं था लेकिन वह इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते थे।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चर्चाओं के लिहाज़ से कितने कुशल हैं, सोशल मीडिया पर मौजूद कई वीडियो क्लिप्स इस बात की तसदीक करती है. साक्षात्कारों से हट कर और प्रधानमंत्री बनने से पहले भी नरेन्द्र मोदी के ऐसे तमाम वीडियो मौजूद हैं, जिनमें उन्होंने अपनी बात पूरी जिम्मेदारी से रखी.

नरेन्द्र मोदी के लिए क्या इन चर्चाओं तक हिस्सा बनने का सफ़र भी बहुत आसान रहा? नहीं। यह संघर्षों से भरा था। संघर्षों से जुड़ा एक बेहद दिलचस्प किस्सा है, जब नरेन्द्र मोदी को एक समाचार चैनल की परिचर्चा में शामिल होने का मौक़ा मिला था। 

90 के दशक का अंत था। टीवी चैनल का दायरा काफी बढ़ चुका था। लोग समझ चुके थे कि यह संचार का एक बड़ा माध्यम बनने वाला है। खासकर राजनीतिक दृष्टिकोण से। समाचार चैनल्स में चर्चाएँ शुरू हो चुकी थीं, हर राजनीतिक दल अपने नेता-प्रवक्ता भेजा करता था। कुल मिला कर ज़िम्मेदारी बस एक होती थी, अपने दल का नज़रिया मज़बूती से रखना।

यह वाकया भी तभी का है। एक चैनल में  एक चर्चा आयोजित कराई गई, जिसमें लगभग हर दल के नेता को बुलावा भेजा गया। भाजपा में विजय मल्होत्रा को निमंत्रण मिला, लेकिन किसी कारणवश कार्यक्रम से कुछ ही समय पहले उनका आना रद्द हो गया। 

चैनल वाले परेशान। अब किसे बुलाएँ BJP से? नामों की खोजबीन शुरू हुई और नरेन्द्र मोदी को बुलावा भेजा गया। अब तक वह ऐसी चर्चाओं की अहमियत बखूबी समझ चुके थे। उस वक्त तक वह एक अच्छे हिन्दी भाषी वक्ता के रूप में स्थापित भी हो चुके थे, लिहाज़ा आने के सवाल पर उन्होंने तुरंत हामी भर दी।

समस्या लेकिन टली नहीं। क्योंकि एक दुविधा थी। स्पष्टवादी मोदी ने तुरंत चैनल को अपनी दुविधा बताई। उन्होंने कहा, “मैं कार्यक्रम में आने के लिए तैयार हूँ लेकिन मेरे पास वाहन नहीं है।” यह तब की बात है, जब नरेन्द्र मोदी 9 अशोका मार्ग स्थित भाजपा कार्यालय के पास अन्य संघ प्रचारकों के साथ रहते थे। 

चैनल की ओर से उनसे कहा गया कि वह टैक्सी से आ सकते हैं, बाद में इसका भुगतान कर दिया जाएगा। लेकिन कार्यक्रम ऑन एयर होने में सिर्फ चंद मिनट का समय शेष था, और नरेन्द्र मोदी की कोई ख़बर नहीं थी। सब इंतज़ार कर ही रहे थे, तभी मोदी मौके पर नज़र आ गए।

नरेन्द्र मोदी जानते थे कि वह किसी दूसरे नेता के स्थान पर आए हैं लेकिन उन्होंने अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाई। यह इकलौती ऐसी घटना नहीं है, जब प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ अपनी बात रखने के लिए परेशानियों का सामना किया हो लेकिन जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटे। 

दूसरा किस्सा जुलाई 2001 में हुई  सम्मेलन का है। पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ भारत आए थे। इस दौरान भी चैनल पर राजनीतिक दलों के नेताओं की ज़रूरत थी। मुश्किल के समय में एक बार फिर समाचार समूह ने नरेन्द्र मोदी से संपर्क किया और इस बार भी उन्होंने निराश नहीं किया।

चर्चा से कुछ देर पहले खूब बारिश होने लगी। सिग्नल न होने की वजह से नरेन्द्र मोदी को कई घंटे इंतज़ार करना पड़ा। क्योंकि वह मौजूद रहने का वादा कर चुके थे, इसलिए काफी देर इंतज़ार करने के बावजूद भी चर्चा में शामिल हुए।

इन दोनों ही घटनाओं में एक बात पूरी तरह समान थी कि नरेन्द्र मोदी हर बुलावे को सहर्ष स्वीकार करते थे। इसके बाद अपने राजनीतिक दल का पक्ष पूरी तैयारी से रखते  थे। वह अपने नज़रिए और पार्टी के एजेंडे दोनों को लेकर कभी भ्रम में नहीं रहे।

साल 2001 में पहली बार गुजरात की कमान संभालने से लेकर 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों तक… काफी कुछ देखने और झेलने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ तक का सफ़र तय किया। फ़िलहाल देश की सत्ताधारी पार्टी के सामने कई चुनौतियाँ हैं लेकिन जनता ने अभी तक इस चेहरे पर पूरा भरोसा जताया है।    

पुस्तक साभार – The Election That Changed India

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