घाटी में कामयाब हो गए आतंकी? हिंदू-सिख कर्मचारी मांग रहे ट्रांसफर, कश्मीर से पलायन की भी तैयारी

कश्मीर घाटी में बीते कुछ दिनों में गैर-मुस्लिमों पर आतंकवादी हमले बढ़ने से केंद्र शासित प्रदेश के अल्पसंख्यकों में भय का माहौल है। एक तरफ केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार विस्थापितों को बसाने की बात कर रही है, लेकिन आतंक की नई लहर के चलते दोबारा पलायन शुरू हो गया है। अध्यापकों और कारोबारियों तक पर हुए हमलों से दहशत में आए सिख और कश्मीरी पंडित समुदाय के लोग जम्मू लौट रहे हैं, जहां गैर-मुस्लिमों की बहुलता है। शिक्षकों समेत अन्य सरकारी कर्मचारी जम्मू लौट रहे हैं और कुछ ने घाटी से बाहर ट्रांसफर की मांग की है। इसके अलावा कई तो सुरक्षा की बढ़ती चिंताओं की वजह से काम पर ही नहीं आ रहे हैं।

श्रीनगर में शिक्षा विभाग में कनिष्ठ सहायक सुशील शुक्रवार अचानक जम्मू लौट आए। उन्होंने कहा, “हम कश्मीर से बाइक पर भागे हैं।” श्रीनगर में एक सिख महिला प्रिंसिपल और एक कश्मीरी हिंदू शिक्षक की हत्या के बाद ऐसी स्थिति बनी है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुशील ने बताया,  “जब हम कश्मीर की सड़कों पर चलते हैं तो हमें एक ही ख्याल आता है कि जो कोई भी हमारी तरफ देख रहा है, वो हमें गोली मार देगा।”

बिना नींद की कट रही रातें
जम्मू लौटने वालों के लिए सुरक्षा सर्वोपरि चिंता है। सिद्धार्थ रैना (बदला हुआ नाम) सिर्फ दो साल के थे, जब उनका परिवार 1990 में एक लाख से अधिक पंडितों के साथ 1990 में कश्मीर छोड़ दिया था। सिद्धार्थ शुक्रवार को अपनी पत्नी के साथ अनंतनाग से जम्मू के लिए रवाना हुए। उन्होंने इसे “नींद रहित और भयावह रात” करार दिया है।

उन्होंने कहा, “मैं पूरी रात सो नहीं पाया और अगले ही दिन सुबह जम्मू के लिए निकल गया। सद्भाव और शांति के ढीले-ढाले बयान हैं। सुरक्षा का कोई आश्वासन नहीं दिया गया है। अगर वे शिक्षकों के पास जा सकते हैं और उनके पहचान पत्र देखकर उन्हें मार सकते हैं, तो मेरे जैसे कश्मीरी पंडित कर्मचारियों की सुरक्षा की गारंटी कौन देगा।” 

सरकार को करनी होगी कर्चमारियों के सुरक्षा की चिंता
सुशील ने कहा कि उनके मुस्लिम सहयोगी मददगार थे, लेकिन यह सरकार को सोचना है कि क्या अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारी ऐसी परिस्थितियों में सुरक्षित महसूस कर सकते हैं। उन्होंने कहा, “अल्पसंख्यक समुदाय के शिक्षक घाटी के दूर-दराज के पहाड़ी इलाकों में तैनात हैं। वे जम्मू लौटने के अलावा क्या कर सकते हैं?”

सरकार ने रिवर्स माइग्रेशन से किया इनकार
जम्मू-कश्मीर सरकार ने पीएम पैकेज के तहत घाटी में तैनात अल्पसंख्यक समुदाय के कर्मचारियों के किसी भी ‘रिवर्स माइग्रेशन’ से इनकार किया। जम्मू-कश्मीर राहत और पुनर्वास आयुक्त अशोक पंडिता ने कहा, “हमने कश्मीर संभागीय आयुक्त को इसकी जानकारी दी है। घाटी के सभी उपायुक्तों को उनके संबंधित जिलों में सुरक्षित सरकारी आवास में रहने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग की है।”

हालांकि, उनके दावों के उलट जमीनी सबूत बताते हैं कि कई लोग लौट रहे हैं। जम्मू में नगरोटा के पास प्रवासी कश्मीरी पंडितों की बस्ती के एक दुकान मालिक रमेश कुमार ने कहा कि पीएम पैकेज के तहत कश्मीर में तैनात कई कर्मचारी वापस आ गए हैं। उन्होंने कहा, “मैं आज कम से कम 30 से मिला हूं क्योंकि वे 2-3 महीने बाद खरीदारी करने आए थे। उन्होंने कहा कि वे घाटी से भाग गए।”

परिवार की चिंता के कारण भी लौट रहे लोग
पुलवामा में वित्त विभाग का एक कर्मचारी शनिवार दोपहर अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ लौटा। उन्होंने कहा, “मैं वापस नहीं आना चाहता था, लेकिन जम्मू में मेरे माता-पिता ने जोर देकर कहा कि जब तक स्थिति सामान्य नहीं हो जाती, तब तक हम कुछ दिनों के लिए आएं।” उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर यह बात कही है।

एक अन्य प्रवासी कश्मीरी पंडित ने कहा कि उनका बेटा अपनी पत्नी और दो नाबालिग बच्चों के साथ कुपवाड़ा छोड़ दिया है। उन्होंने कहा, “वे शाम तक यहां पहुंच रहे हैं। वर्तमान परिस्थितियों में बहुत कम लोग वहां रह सकते हैं।  खासकर तब, जब वे सुरक्षित आवास के बाहर किराए के स्थान पर रह रहे हों।” उन्होंने भी नाम नहीं छापने का अनुरोध करते हुए यह कहा।

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