शनिवार को पीपल की पूजा क्यों की जाती है, जानिए क्या है इसके पीछे का रहस्य ?

 हिन्दू धर्म में पीपल वृक्ष का बड़ा ही महत्व हैं। हिंदू दर्शन की मान्यता है इसके पत्ते-पत्ते में देवता का वास रहता है। विशेषकर विष्णु का।

अथर्ववेद और छंदोग्य उपनिषद में इस वृक्ष के नीचे देवताओं का स्वर्ग बताया गया है। श्रीमद्भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:’ यानी मैं वृक्षों में पीपल हूं।

पीपल के मूल में ब्रह्मा जी, मध्य में विष्णु जी व अग्र भाग में भगवान शिव जी साक्षात रूप से विराजित हैं। स्कंदपुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान श्री हरि और फलों में सभी देवताओं का वास है।

क्यों की जाती है पीपल की पूजा?

एक पौराणिक कथा के अनुसार लक्ष्मी और उसकी छोटी बहन दरिद्रा विष्णु के पास गई और प्रार्थना करने लगी कि हे प्रभो! हम कहां रहें? इस पर विष्णु भगवान ने दरिद्रा और लक्ष्मी को पीपल के वृक्ष पर रहने की अनुमति प्रदान कर दी। इस तरह वे दोनों पीपल के वृक्ष में रहने लगीं।

विष्णु भगवान की ओर से उन्हें यह वरदान मिला कि जो व्यक्ति शनिवार को पीपल की पूजा करेगा, उसे शनि ग्रह के प्रभाव से मुक्ति मिलेगी। उस पर लक्ष्मी की अपार कृपा रहेगी।

शनि के कोप से ही घर का ऐश्वर्य नष्ट होता है, मगर शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करने वाले पर लक्ष्मी और शनि की कृपा हमेशा बनी रहेगी।

इसी लोक विश्वास के आधार पर लोग पीपल के वृक्ष को काटने से आज भी डरते हैं, लेकिन यह भी बताया गया है कि यदि पीपल के वृक्ष को काटना बहुत जरूरी हो तो उसे रविवार को ही काटा जा सकता है।

गीता में पीपल की उपमा शरीर से की गई है। ‘अश्वत्थम् प्राहुख्‍ययम्’ अर्थात अश्वत्‍थ (पीपल) का काटना शरीर-घात के समान है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी पीपल प्राणवायु का केंद्र है। यानी पीपल का वृक्ष पर्याप्त मात्रा में कार्बन डाई ऑक्साइड ग्रहण करता है और ऑक्सीजन छोड़ता है।

संस्कृत में को ‘चलदलतरु’ कहते हैं। हवा न भी हो तो पीपल के पत्ते हिलते नजर आते हैं। ‘ पात सरिस मन डोला’- शायद थोड़ी-सी हवा के हिलने की वजह से तुलसीदास ने मन की चंचलता की तुलना पीपल के पत्ते के हिलने की गति से की गई है।
डॉ0 विजय शंकर मिश्र:

पीपल वृक्ष का पूजन करने से कई तरह के लाभ प्राप्त होते है आइये जानते है क्या है यह लाभ –

पीपल की पूजा के लाभ

अमावस्या तिथि पर पीपल के वृक्ष में स्वयं भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी का वास होता है। इसलिए इस तिथि पर पीपल पूजा से गरीबी दूर हो सकती है।

स्कंद पुराण में बताया गया है कि पीपल की जड़ में विष्णु, तने में केशव, इसकी शाखाओं में भगवान नारायण, पत्तों में भगवान श्रीहरि और फलों में सभी देवी-देवताओं हमेशा निवास करते हैं।

पीपल की पूजा करने से मनुष्यों के हजारों पापों का नाश हो सकता है। पद्मपुराण के अनुसार पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु बढ़ती है।

पीपल को जल चढ़ाने से कुंडली के सभी दोष शांत होते हैं और दुर्भाग्य से मुक्ति मिल सकती है।

पीपल में पितरों का वास माना जाता है। इसमें सब तीर्थों का भी निवास होता है। इसीलिए मुंडन आदि पवित्र संस्कार पीपल के नीचे करवाने की परंपरा है।

शनि की साढ़ेसाती या ढय्या से बचने के लिए हर शनिवार पीपल को जल चढ़ाकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।

शाम को पीपल के नीचे दीपक जलाने से अक्षय पुण्य मिलता है। बड़ी-बड़ी परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है। पीपल के पेड़ के नीचे वैसे तो रोजाना सरसों के तेल का दीपक जलाना अच्छा काम है। यदि किसी कारणवश ऐसा संभव न हो तो शनिवार की रात को पीपल के नीचें दीपक जरूर जलाएं।

पीपल के तने पर सफेद कच्चा सूत लपेटने से सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है।

पीपल का पेड़ ही एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो कभी कार्बन डाईआक्साइड नहीं छोड़ता वह 24 घंटे आक्सीजन ही छोड़ता है इसलिए इसके पास जाने से कई रोग दूर होते हैं और शरीर स्वस्थ रहता है।

अमावस्या और शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे हनुमान जी की पूजा-अर्चना करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ करने से पेरशानियां दूर होती हैं।

रविवार को पीपल पर जल चढ़ाना निषेध है। शास्त्रों के अनुसार रविवार को पीपल पर जल चढ़ाने से घर में दरिद्रता आती है।

पीपल के वृक्ष को कभी काटना नहीं चाहिए। ऐसा करने से पितरों को कष्ट मिलते हैं आैर वंशवृद्धि में रुकावट आती है। किसी विशेष काम से विधिवत नियमानुसार पूजन करने व यज्ञादि पवित्र कामों के लक्ष्य से पीपल की लकड़ी काटने पर दोष नहीं लगता।

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