अब चीन की दादागिरी होगी कम! अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया का नया गठजोड़ ‘ऑकस’ कैसे है भारत के लिए गुड न्यूज

ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन की दादागिरी कम करने और उसकी घेराबंदी के लिए नया त्रिपक्षीय सुरक्षा गठबंधन ऑकस (एयूकेयूएस) की घोषणा की है। भले ही इन तीन देशों के इस नए गठजोड़ में भारत नहीं है, मगर ऑकस का ऐलान एक ओर जहां भारत के लिए गुड न्यूज है तो चीन के लिए खतरे की घंटी। वैश्विक सुरक्षा संबंधी घटनाक्रमों को देखते हुए भारत के आशावान होने की सबसे बड़ी वजह है कि इस नए त्रिपक्षीय सुरक्षा गठजोड़ से चीन की दादागिरी कम करने में मदद मिलेगी और हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन कायम हो सकेगा। 

ऑकस से ये देश अपने साझा हितों की रक्षा कर सकेंगे और परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बियां हासिल करने में ऑस्ट्रेलिया की मदद करने समेत रक्षा क्षमताओं को बेहतर तरीके से साझा कर सकेंगे। इस गठबंधन के तहत तीनों राष्ट्र संयुक्त क्षमताओं के विकास करने, प्रौद्योगिकी को साझा करने, सुरक्षा के गहन एकीकरण को बढ़ावा देने और रक्षा संबंधित विज्ञान, प्रौद्योगिकी, औद्योगिक केंद्रों और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत करने पर सहमत हुए।

टीओआई के मुताबिक, सुरक्षा त्रिपक्षीय गठबंधन यानी कि ऑकस एक तरह से चीन को कड़ा संदेश होगा। यह मुख्य रूप से हिंद प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया की क्षमताओं में इजाफा करेगा और क्षेत्र में ड्रैगन को काबू में रखने में वैश्विक प्रयासों में मददगार साबित होगा। ऑकस ऑस्ट्रेलिया की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाएगा, जो इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत क्षेत्र) में भारत के करीबी रणनीतिक साझेदारों में से एक बन गया है। दूसरी बात यह कि नए त्रिपक्षीय गठबंधन से क्वाड की क्षमताओं में वृद्धि होने की संभावना है, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया दोनों सदस्य हैं। ऑकस के तहत ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बियों की ताकत मिलेगी।

क्वाड एक सुरक्षा समूह नहीं है, इसलिए यह ऑकस क्वाड में सुरक्षा एंगल जोड़ता है। फिलहाल, क्वाड और ऑकस समानांतर ट्रैक पर चलेंगे, मगर ऐसी संभावना है कि भविष्य में ये दोनों मर्ज हो जाएंगे। इस तरह से भविष्य में भारत इस ग्रूप का सदस्य हो जाएगा और फिर चीन को घेरने में भारत भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। यहां बताना जरूरी है कि क्वाड महज एक कूटनीतिक कवायद का मंच है। क्वाड का अर्थ ‘क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग’ है, इसके अंतर्गत चार देश भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका आते हैं। 

ऑकस की पहले बड़ी पहल के तहत अमेरिका और ब्रिटेन की मदद से ऑस्ट्रेलिया परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों का एक बेड़ा बनाएगा, जिसका मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता को बढ़ावा देना है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने इस अवसर पर कहा कि ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका स्वाभाविक सहयोगी हैं। हम भले ही भौगोलिक आधार पर अलग हों, लेकिन हमारे हित और मूल्य साझे हैं। उन्होंने कहा कि नई साझेदारी का मकसद मिलकर काम करना और हिंद-प्रशांत की सुरक्षा एवं स्थिरता को संरक्षित रखना है। मॉरिसन ने कहा कि अगले 18 महीनों में तीनों देश सर्वश्रेष्ठ मार्ग तय करने के लिए मिलकर काम करेंगे। बाइडन ने व्हाइट हाउस से कहा कि तीनों देश 20वीं सदी की तरह 21वीं सदी के खतरों से निपटने की अपनी साझा क्षमता को बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि हमारे राष्ट्र और हमारे बहादुर बल 100 से अधिक वर्षों से कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं।

बीते कुछ समय में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की धमक बढ़ी है। सुपरपावर बनने की उसकी चाहत ने इस क्षेत्र के संतुलन को बिगाड़ दिया है। ऐसे में उस पर लगाम कसने के लिए ऐसे समूहों की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही थी। क्वाड के बाद ऑकस के ऐलान से चीन की टेंशन बढ़ेगी। क्योंकि ऑकस में शामिल देश भारत के काफी करीबी पार्टनर हैं और इनमें से दो तो क्वाड के भी सदस्य हैं।

चीन को लगी है मिर्ची
ऑकस की घोषणा के बाद से ही चीन बौखला गया है और इस पर सख्त ऐतराज जताया है। चीन ने तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वह इस समझौते पर करीबी नजर रखेगा, जो क्षेत्रीय स्थिरता को काफी कमजोर कर देगा और हथियारों की होड़ बढ़ाएगा तथा परमाणु अप्रसार की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को नुकसान पहुंचाएगा। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान की यह टिप्पणी हिंद-प्रशांत के लिए अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के एक नया त्रिपक्षीय सुरक्षा गठजोड़ की घोषणा करने के बाद आई है। दिलचस्प है कि 24 सितंबर को वाशिंगटन में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की मेजबानी में क्वाड नेताओं की एक बैठक से हफ्ते भर पहले एयूकेयूएस की घोषणा की गई। 

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