गुजरात तो केवल झांकी है, पिक्चर अभी बाकी है! कुछ और राज्यों में बदलाव कर सकती है भाजपा

भाजपा नेतृत्व ने तीन माह में अपने तीन राज्यों के मुख्यमंत्री बदलकर भावी राजनीतिक तैयारियों के लिए बड़े बदलाव के संकेत दिए हैं। जल्दी ही कुछ और राज्यों में भी बदलाव हो सकता है। दरअसल, पार्टी नेतृत्व को जो फीडबैक मिल रहा है वह उतना अच्छा नहीं है, जिसकी वह उम्मीद कर रहा था। ऐसे में कमजोर विपक्ष के बावजूद भी पार्टी की रणनीतिक चिंता बरकरार है और वह उनको समय रहते हल कर लेना चाहती है।

भाजपा नेतृत्व ने तीन महीनों में उत्तराखंड, कर्नाटक और अब गुजरात के मुख्यमंत्री बदले हैं। उत्तराखंड में अगले साल की शुरुआत में चुनाव हैं और पार्टी रणनीति के अनुसार वहां पर पुराने नेतृत्व के साथ जरूरी चुनावी तैयारियां नहीं कर पा रही थी। ऐसे में वहां पर तो एक साल में तीन मुख्यमंत्री बदले गए हैं। कर्नाटक में भी पार्टी ने अपने सबसे बड़े नेता बीएस येद्दुरप्पा को बदल दिया है ताकि भविष्य की मजबूत जमीन तैयार की जा सके। अब गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन कर साफ कर दिया है कि वह अपनी भावी रणनीति को लेकर बेहद संजीदा है और इसमें किसी तरह की हीला हवाली के पक्ष में नहीं है।

सूत्रों के अनुसार, भाजपा नेतृत्व की असली चिंता 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले होने वाले विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। पार्टी उनमें अपना प्रदर्शन मजबूत रखना चाहती है, ताकि 2024 की मजबूत बुनियाद खड़ी हो सके। विभिन्न स्थानों से पार्टी ने जो फीडबैक हासिल किया है उसके अनुसार कोरोना काल के दौरान लोगों की दिक्कतें बढ़ी है। मौजूदा राज्यों के नेतृत्व को लेकर यह नाराजगी कहीं कम तो कहीं ज्यादा है। इसका विपरीत असर चुनाव पर पड़ सकता है। ऐसे में पार्टी नए नेताओं के साथ नई तैयारियों के जरिए जनता के बीच जाना चाहती है और उसका विश्वास बहाल रखना चाहती है।

सूत्रों के अनुसार, पार्टी की समीक्षा में जिन राज्यों की रिपोर्ट अच्छी नहीं है उनमें मध्य प्रदेश, हरियाणा और त्रिपुरा जैसे राज्य शामिल है, जहां उसकी अपनी सरकार हैं। इनमें मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी को चुनाव में जाना पड़ेगा। त्रिपुरा में नेतृत्व पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं और पार्टी की दिक्कतें कम नहीं हो पा रही है। हरियाणा में भी कमोबेश यही स्थिति है। वहां के सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर भाजपा ने गैर जाट राजनीति को आगे बढ़ाया है, लेकिन नेतृत्व को लेकर दिक्कत है बनी हुई है।

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