जब 6 साल पुराने अपने ही फैसले को त्रुटिपूर्ण बताकर सुप्रीम कोर्ट ने बदला, समझें पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एडहॉक कर्मचारियों को स्थायी करने पर एडहॉक के रूप में दी गई सेवा को वरिष्ठता में नहीं गिना जाएगा। यह वरिष्ठता स्थायी करने के दिन से ही मिलेगी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने सरकारी अधिकारियों को वरिष्ठता देने के मुद्दे पर छह वर्ष पूर्व (2015) दिए गए अपने ही निर्णय को निरस्त कर उसे त्रुटिपूर्ण करार दिया है। इसके आधार पर 2018 में दिए गए इलाहाबाद व उत्तराखंड उच्च न्यायालयों के दो फैसलों को भी रद्द कर दिया।

शीर्ष अदालत इस फैसले से दोनों राज्यों के ग्रामीण अभियंता सेवाओं में 1985 में एडहॉक आधार नियुक्त हुए रहे सैकड़ों सहायक इंजिनियर प्रभावित हुए हैं। इन्हें 1989 में स्थायी किया गया था। न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ और एम.आर. शाह की पीठ ने यह फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकार की 22 मार्च 2016 की वरिष्ठता सूची को निरस्त कर दिया और 2001 की सूची को बहाल कर दिया जो बिना एडहॉक सेवा की गणना किए बनाई गई थी।

नियम की अनदेखी : अदालत ने कहा कि इस मामले में अदालतों ने यूपी में एडहॉक नियुक्तियों का नियमन (सेवा आयोग के अधीन पद) नियम- 1979 के नियम-7 पर विचार ही नहीं किया है। नियम-7 कहता है कि नियमों के अनुसार की गई नियुक्ति/चयन के दिन से ही वरिष्ठता की गणना होगी। पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय ने नरेंद्र कुमार त्रिपाठी (2015) निर्णय में इस नियम पर विचार नहीं किया और एडहॉक सेवा की गणना का आदेश दे दिया। इसके आधार पर दोनों उच्च न्यायालय ने 2018 में अपने फैसले दे दिए।

नियम लागू नहीं : अदालत ने स्पष्ट किया कि इससे पूर्व संविधान पीठ के फैसले, जिसमें यह व्यवस्था दी गई कि उन लोगों को वरिष्ठता दी जा सकती है जिनकी प्रमोशनल पोस्ट पर एडहॉक नियुक्ति उचित प्राधिकरण (सेवा आयोग) के साथ पूरे परामर्श और मंजूरी साथ की गई है। इस मामले में यह फैसला लागू नहीं होगा। इस मामले में चयन 1979 के नियमों के तहत एक चयन समिति बनाकर किया गया था और बाद में राज्यपाल के आदेश पर 1985 एडहॉक नियुक्त कर दिए गए। इस दौरान न तो सेवा आयोग से परामर्श किया गया और न ही मंजूरी ली गई। ऐसे में उन्हें नियमों के अनुसार एडहॉक नियुक्तियां नहीं माना जा सकता। इस कारण अधिकारियों को वरिष्ठता में एडहॉक सेवा का लाभ नहीं दिया जाएगा।

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