Ram Navami 2021- जब श्री राम के वंशजों के घर हुई स्वर्ण की वर्षा…

सूर्य वंश में जिस प्रकार इक्ष्वाकु, अजमीढ़ आदि राजा बहुत प्रसिद्ध हुए हैं, उसी प्रकार महाराज रघु भी बड़े प्रसिद्ध पराक्रमी, धर्मात्मा और भगवद्भक्त राजा हुए हैं। इन्हीं के नाम से ‘रघुवंश’  प्रसिद्ध हुआ। इन्होंने अपने पराक्रम से समस्त पृथ्वी को अपने अधीन कर लिया था। चारों दिशाओं में दिग्विजय करके वह समस्त भूमिखंड के एक छत्र सम्राट हुए। वह प्रजा को बिल्कुल कष्ट नहीं देते थे, राज्य कर भी बहुत कम लेते थे और विजित राजाओं को भी केवल अधीन बनाकर छोड़ देते थे। उनसे किसी प्रकार का कर वसूल नहीं करते थे।

ऋषि कुमार से भेंट की कथा
एक बार महाराज रघु दरबार में बैठे हुए थे कि इनके पास कौत्स नामक एक स्नातक ऋषि कुमार आए। अपने यहां स्नातक को देखकर महाराज ने उनका विधिवत स्वागत-सत्कार किया और पूजा की। ऋषि कुमार ने विधिवत उनकी पूजा ग्रहण की और कुशल पूछा। थोड़ी देर के बाद जब ऋषि कुमार चलने लगे तो महाराज ने कहा, ‘‘ब्राह्मण! आप कैसे पधारे और बिना अपना कुछ अभिप्राय बताए लौटकर क्यों जा रहे हैं?’’

ऋषि कुमार ने कहा, ‘‘राजन! मैंने आपके दान की ख्याति सुनी है। आप अद्वितीय दानी हैं। मैं एक प्रयोजन से आपके पास आया था, परन्तु मैंने सुना है कि आपने यज्ञ में अपना समस्त वैभव दान कर दिया है। यहां आकर मैंने प्रत्यक्ष देखा कि आपके पास अर्घ्य देने के लिए भी कोई धातु का पात्र नहीं है और आपने मुझे मिट्टी के पात्र से अर्घ्य दिया है, अत: अब मैं आपसे कुछ नहीं कहता।’’

राजा ने कहा, ‘‘नहीं ब्राह्मण! आप मुझे अपना अभिप्राय बताइए, मैं यथासाध्य उसे पूरा करने की चेष्टा करूंगा।’’

स्नातक ने कहा, ‘‘राजन, अपने गुरु के यहां रह कर वेदों का अध्ययन करने के बाद मैंने उनसे गुरु दक्षिणा के लिए प्रार्थना की। उन्होंने कहा, तुम्हारी सेवा से संतुष्ट हूं, मुझे और कुछ भी दक्षिणा नहीं चाहिए।’’

गुरु जी के ऐसा कहने पर भी मैं बार-बार उनसे गुरु दक्षिणा के लिए आग्रह करता ही रहा। तब उन्होंने झल्लाकर कहा, ‘‘अच्छा तो चौदह कोटि स्वर्ण मुद्राएं लाकर हमें दो। मैं इसलिए आपके पास आया था।’’

तैयारी कुबेर पर आक्रमण की
महाराज  ने कहा, ‘‘ब्राह्मण! मेरे हाथों में धनुष-बाण के रहते हुए कोई विद्वान ब्रह्मचारी ब्राह्मण मेरे यहां से विमुख जाए तो मेरे राजपाट, धन-वैभव को धिक्कार है। आप बैठिए, मैं कुबेर लोक पर चढ़ाई करके उनके यहां से धन लाकर आपको दूंगा।’’

महाराज ने सेना को सुसज्जित होने की आज्ञा दी। बात की बात में सेना सज गई। निश्चय हुआ कि कल प्रस्थान होगा। तभी प्रात:काल कोषाध्यक्ष ने आकर महाराज से निवेदन किया, ‘‘महाराज रात्रि में स्वर्ण की वर्षा हुई और समस्त कोष स्वर्ण मुद्राओं से भर गया है।’’

महाराज ने जाकर देखा कि सर्वत्र स्वर्ण मुद्राएं भरी हैं। वहां जितनी स्वर्ण मुद्राएं थीं, उन सबको महाराज रघु ने ऊंटों पर लदवा कर ऋषि कुमार के साथ भेजना चाहा।

जब ऋषि कुमार ने देखा कि ये मुद्राएं तो नियत संख्या से बहुत अधिक है, तब उन्होंने राजा से कहा, ‘‘महाराज मुझे तो गुरु दक्षिणा के लिए केवल चौदह कोटि मुद्राएं ही चाहिए। इतनी मुद्राओं का मैं क्या करूंगा।’’

महाराज ने कहा, ‘‘ब्रह्मण ये सब आपके ही निमित्त आई हैं, आप ही इन सबके अधिकारी हैं, आपको ये सब मुद्राएं लेनी ही होंगी। आपके निमित्त आए हुए द्रव्य को भला मैं कैसे रख सकता हूं?’’

ऋषि कुमार ने बहुत मना किया, परन्तु महाराज मानते ही नहीं थे। अंत में ऋषि को जितनी आवश्यकता थी वह उतना ही द्रव्य लेकर अपने गुरु के यहां चले गए। शेष जो धन बचा, वह सब ब्राह्मणों को दान में दे दिया गया।

ऐसा दाता पृथ्वी पर कौन होगा, जो इस प्रकार याचिका के मनोरथ पूर्ण करे। अंत में महाराज अपने पुत्र अज को राज्य देकर तपस्या करने वन में चले गए। अज के पुत्र महाराज दशरथ हुए जिन्हें साक्षात परब्रह्म परमात्मा श्री रामचंद्र जी के पिता होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

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