मेरे दो मुसलमान भाई मारे गए हैं’.. बंगाल की ‘घुसपैठिया’ पॉलिटिक्स पर’ प्रहार

मतुआ सेक्ट को मानने वालों की आबादी लगभग 3 करोड़ है और 50 से 70 सीटों पर उलटफेर कर सकते हैं। मोदी का ओराकांडी जाना ममता के कथित मुस्लिम तुष्टीकरण पर प्रहार था। बीजेपी को इस जवाबी गोलबंदी का मौका दीदी ने 2008 में ही दे दिया था। बांग्लादेशी शरणार्थी और घुसपैठिए के बीच फर्क की यही नीति शायद इस विधानसभा चुनाव का नतीजा तय कर दे। आजादी के बाद से ही जातीय या सांप्रदायिक राजनीति करने वालों के लिए पश्चिम बंगाल की सरजमीं बंजर साबित हुई। यहां के मुसलमान राजनीति की मुख्य धारा में रहे। या तो वामदलों के साथ या कांग्रेस के साथ। फुरफुरा शरीफ के अब्बास सिद्दिकी या किसी मौलाना की तकरीर से कोई खास फर्क नहीं पड़ा। कम्युनिस्ट विचारधारा के कारण हिंदू मतों में भी जातीय बिखराव नहीं था। पर 2007-8 के आस-पास हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति पश्चिम बंगाल में भी पंचायत स्तर पर घुस गई। इसकी प्रतिक्रिया में मुसलमान स्थानीय स्तर पर गोलबंद होने लगे।

​मेरे दो मुसलमान भाई मारे गए हैं..

2007 में बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कट्टर वामपंथ का चोला फेंक नव उदारवाद का आत्मघाती प्रयोग किया। टाटा और सलेम ग्रुप को सिंगूर और नंदीग्राम में फैक्ट्री लगाने की जगह दी। 32 साल से निर्णायक मौके की तलाश कर रही ममता ने किसानों की जमीन लौटाने के लिए जबर्दस्त आंदोलन छेड़ दिया। अगले ही साल हुए पंचायत चुनाव में नंदीग्राम और सिंगूर में टीएमसी की जीत हुई। पहली बार मुसलमान वोटों का बड़ा हिस्सा मेनस्ट्रीम राजनीति से अलग होकर ममता के पाले में आ गया। ममता के 16 दिनों के प्रदर्शन के बाद टाटा ने नैनो कार की फैक्ट्री सिंगूर से हटाने का ऐलान कर दिया। ये अक्टूबर का महीना था। ममता बनर्जी ने जब तालियों की गड़गड़ाहट के बीच भाषण शुरू किया तो एक अलग मुद्दा उभर कर सामने आ गया। एक रोड एक्सीडेंट में दो युवाओं की मौत हुई थी। ममता ने मंच से कहा – हमारे दो मुसलमान भाई आज सुबह मारे गए हैं। वो हमारे समर्थक थे। इसे एक्सीडेंट बताने की कोशिश की जा रही है लेकिन ये सीपीएम का षडयंत्र है।

इसने सबको चौंका दिया। पर ममता को आगे का रास्ता साफ दिखाई दे रहा था। सूबे का 27 परसेंट वोट बैंक सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के रास्ते टीएमसी की झोली में गिरने के लिए तैयार था। एक साल पहले ही जस्टिस राजिंदर सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि पश्चिम बंगाल का मुसलमान गुजरात के मुसलमान से भी पिछड़ा हुआ है। इससे पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को बेचैनी सी हुई। 2006 से 2008 के बीच तीन घटनाओं ने मुसलमान वोट का नया ठिकाना खोज दिया। सच्चर कमेटी रिपोर्ट, जमीन अधिग्रहण और रिजवानुर रहमान की संदिग्ध मौत। 30 साल के कंप्यूटर टीचर रिजवान ने उद्योगपति अशोक तोडी की बेटी से शादी की और कुछ दिनों बाद ही उसकी लाश रेलवे लाइन पर मिली। कहा जाता है कि पुलिस ने उस पर तलाक देने का दबाव बनाया था।

दीदी का यू-टर्न

2008 के पंचायत चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने बीजेपी से नाता तोड़ लिया था। इसके साथ ही घुसपैठियों को लेकर उनकी नीति ने भी यू-टर्न लिया। इस दो उदाहरण से समझते हैं। 15 सितंबर, 2003 को दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े तरुण विजय की किताब कम्युनिस्ट आतंकवाद का लोकार्पण था। ममता ने अपने संबोधन में कहा – आप लोग सच्चे देशभक्त हैं। अगर आपका एक प्रतिशत समर्थन भी हमें बंगाल में मिल जाए तो फासिस्ट सरकार को उखाड़ फेकेंगे। इसके अगले साल 2004 के चुनाव में ममता अपनी पार्टी की अकेली सांसद थी। उन्होंने चार अगस्त को लोकसभा में कार्यस्थगन प्रस्ताव लाकर बांग्लादेशी घुसपैठियों पर चर्चा कराने की मांग की। स्पीकर धुर कम्युनिस्ट सोमनाथ चटर्जी थे जिन्हें हराकर दीदी पहली बार 1984 में संसद पहुंची थी। उन्होंने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसके बाद गुस्से से लाल ममता ने वेल में जाकर स्पीकर के चेयर पर रखे कागजात हवा में उछाल दिए। नरेंद्र मोदी ने 2014 की रैलियों में इसे जमकर उछाला। 7 मई, 2014 के दिन मोदी ने कहा.. अकेली शेरनी तो पार्लियामेंट में आग लगा रही थी.. अब घुसपैठियों का मुद्दा कहां चला गया ?

ममता ‘बानो’ से ‘बेगम’ तक का सफर

एक बार यू-टर्न लेने के बाद ममता पीछे मुड़ कर नहीं देखी। 2009 के लोकसभा चुनाव में इसका फायदा। टीएमसी को 19 सीटें मिली और ममता देश की रेल मंत्री बनीं। सितंबर, 2009 में रेल मंत्रालय ने हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और उर्दू में एक विज्ञापन छापा। इसमें कहा गया कि ममता बनर्जी ईद के मौके पर दो योजनाओं की शुरुआत करेंगी – कोलकाता में अल्पसंख्यक बहुत इलाके में नर्सिंग ट्रेनिंग कॉलेज और रेल लाइन का दोहरीकरण। लेकिन सबका ध्यान खींचा विज्ञापन में दीदी की तस्वीर ने। ममता ने अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर ऐसे बांधा जो हिजाब जैसा लग रहा था।

अभी तक संघ या बीजेपी ममता के खिलाफ उतनी आक्रामक नहीं हुई थी क्योंकि वो दीदी के रास्ते वामपंथ के सफाए का इतंजार कर रही थीं। लेकिन संघ से अलग हुई संस्था हिंदू समहति ने दीदी को ममता बानो कहना शुरू कर दिया।

इसके अगले साल 2010 में टीएमसी ने कोलकाता नगर निगम पर कब्जा जमाया। जीत के बाद ठीक बाद पार्क सर्कस में इफ्तार का आयोजन किया गया। इसे कोलकाता के इतिहास में सबसे खर्चीला इफ्तार माना जाता है। फिर बारी बुद्धदेब की विदाई की आई। 2011 में पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के बाद ममता ने इमामों और मुअज्जिनों को हर महीने पैसा देना शुरू कर दिया। 2012 में राज्य सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए अलग अस्पताल की योजना भी बनाई पर भारी विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया। बीजेपी को मानो ममता के सत्ता में आने का ही इंतजार था। 2011 के बाद राज्या में पांव जमाने के लिए बीजेपी के सामने सिर्फ टीएमसी थी। बारी थी दीदी के मुस्लिम तुष्टीकरण पर चौतरफा प्रहार करने की। किसे पता था 2021 में नंदीग्राम के संग्राम में ममता के सारथी रहे सुवेंदु अधिकारी से ही पश्चिम बंगाल की सीएम को सबसे बड़ी चुनौती मिलेगी। नंदीग्राम में वोटिंग के दिन सुवेंदु ने कहा कि बेगम तो सभी बूथों पर एजेंट भी नहीं जुटा पाईं, इनका बस चले तो बंगाल को मिनी पाकिस्तान बना दें।

​घुसपैठियों पर राजनीति और सीएए का वार

भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों की सही संख्या बता पाना मुश्किल है। 2016 में किरण रिजिजू ने राज्यसभा में कहा था कि लगभग 2 करोड़ से ज्यादा बांग्लादेशी भारत में हैं। पिछले साल गृह राज्य मंत्री किशन रेड्डी ने अपने एक बयान में कहा कि अगर सबको नागरिकता दी जाए तो आधा बांग्लादेश खाली हो जाएगा। दरअसल ये बयान 2019 में लागू नागरिकता संशोधन कानून के बाद आया जिसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, ईसाई, पारसी और जैन धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता दी जाएगी। अब ये पक्का नहीं कहा जा सकता कि बांग्लादेश से आए मुसलमानों की संख्या कितनी है और इनमें से कितने पश्चिम बंगाल में रह रहे हैं। अनुमान के मुताबिक इनकी संख्या एक करोड़ है। हां एक बात जरूर है कि पिछले कुछ दशकों में मुर्शिदाबाद के बाद मालदा और उत्तर दिनाजपुर मुस्लिम बहुल हुए हैं।

23 साल तक सीएम रहे ज्योति बसु ने भी अवैध घुसपैठ की समस्या स्वीकार की थी। 11 अक्टूबर, 1992 में सीपीएम के मुखपत्र गणशक्ति में उन्होंने लिखा – 1979 के बाद से मुसलमान भी भारत में आ रहे हैं। 1977 से 1992 के बीच 235,529 घुसपैठियों की पहचान की गई जिनमें 68,472 हिंदू और 164, 132 मुसलमान थे। हालांकि सीपीआई और सीपीएम ने इन्हें वोट बैंक की तरह पोषित किया। सीपीआई के संगठन यूनाइटेड सेंट्रल रिफ्यूजी काउंसिल (यूसीआरसी) इनकी देखभाल करती थी। यूं कहें वैचारिक चारे के लिए भी इनका इस्तेमाल हुआ। यूसीआरसी कोरिया में साम्राज्यवाद, दुनिया में इंग्लैंड और अमेरिका की दादागीरी जैसे मुद्दे उठाती रही। इसने कभी भी बांग्लादेश में पूर्वी पाकिस्तान के दमन का मुद्दा नहीं उठाया। उदाहरण के लिए यूसीआरसी ने 1952 में पारित प्रस्ताव में कहा – दुनिया रूस और चीन के साथ नाइंसाफी कर रही है, भारत सरकार को भारी उद्योग लगाने के लिए रूस से सामान मंगाना चाहिए।

2014 के कन्फ्यूजन से संभली बीजेपी

मोदी जब पीएम की रेस में शामिल हुए तो बंगाल में उनकी पहली जनसभा 5 फरवरी, 2014 को ब्रिगेड परेड ग्राउंड में थी। मंच पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राहुल सिन्हा भी थे। बीजेपी के स्टेट यूनिट को उम्मीद थी कि ममता पर मोदी जमकर प्रहार करेंगे। लेकिन मोदी ने नरम रुख अपनाया। उन्होंने कहा, दीदी को आप यहां काम करने दीजिए, मुझे वहां काम करने दीजिए। आपके दोनो हाथों में लड्डू होगा। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि ये बंगाल के लोगों के लिए तीसरा लड्डू होगा। सीपीएम ने उसी दिन आरोप लगाया कि बीजेपी और ममता चुनाव बाद हाथ मिलाने वाले हैं। दो हफ्ते बाद ममता ने खुद स्टैंड साफ किया – हम सीपएम, कांग्रेस और बीजेपी तीनों से लड़ेंगे।

बीजेपी के नरम-गरम रवैये से जो नुकसान हो रहा था, उसे दूर करना जरूरी था। 10 अप्रैल 2014 के दिन सिल्लीगुड़ी के माटिगारा में मोदी ने कहा – ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ धोखा किया है और इस पर लगाम लगाने के लिए नई दिल्ली में ‘बड़ा मास्टरजी’ का होना ज़रूरी है। फिर 27 अप्रैल को हुगली की रैली में मोदी बरस पड़े – वामपंथियों ने 34 साल के शासन में उतना नुकसान नहीं किया जितना ममता ने 35 महीने के शासन में किया। जय श्रीराम के नारों के बीच 4 मई को बांकुरा की रैली में सीएए की पटकथा लिख दी गई। मोदी ने कहा – भारत माता को दिल में लिए आने वाले , दुर्गा अष्टमी मनाने वाले को हम यूं ही रहने दें। क्या भारत माता अपने बच्चों को नहीं अपनाएगी। लेकिन जो वोट बैंक वाले जो घुसपैठिए आए हैं, उन्हें जाना ही होगा। गुस्से से तमतमाई ममता ने विवादास्पद प्रतिक्रिया दी – मोदी को कमर में रस्सा बांध कर जेल भेज देना चाहिए।

फिर पीछे मुड़कर नहीं देखी बीजेपी

घुसपैठियों के मुद्दे पर दीदी का रिएक्शन बीजेपी के पक्ष में काम करने लगा। संघ और पश्चिम बंगाल की यूनिट ने इसे मुख्य हथियार बनाकर वार करने शुरू कर दिए। 2017 से 19 के बीच राज्य के जिलों में दंगे हुए। इससे वोटों का ध्रुवीकरण तेजी से होने लगा। वामपंथ खत्म होने के बाद बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग काम करने लगी। उधर धारा 370, 35ए हटाने और तीन तलाक को गैर कानूनी ठहराने वाले कानूनो को असर भी बंगाल में दिखा। इस दौरान सांगठनिक मजबूती और टीएमसी की टूट ने बीजेपी को सांस्कृतिक तौर पर बंगाल में पैठ बनाने में मदद की जिसका नतीजा दो मई को आने वाला है।

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