आपने भी लिया है लोन तो ध्यान दें, मोरेटोरियम पर आज सुप्रीम कोर्ट लेने वाला है फैसला

लोन मोरेटोरियम मामले में आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाला है. जस्टिस अशोक भूषण की अगुवाई वाली बेंच ने 17 दिसंबर को इस मामले की सुनवाई के दौरान अपना फैसला सुरक्षित रखा था. कोरोना वायरस महामारी के मद्देनज़र लोन लेने वाले लोगों को राहत देते हुए भारतीय रिज़र्व बैंक ने पिछले साल मोरेटोरियम का ऐलान किया था. इसके तहत 1 मार्च 2020 से 31 मई 2020 के बीच लोगों को टर्म लोन की EMI देने से छूट मिली थी. बाद में इस अवधि को 31 अगस्त 2020 तक के लिए बढ़ा दी गई थी.

केंद्र सरकार ने 8 खास श्रेणियों के तहत 2 करोड़ रुपये तक के लोन पर ब्याज माफ करने का फैसला लिया था. इन 8 कैटेगरी में MSME, एजुकेशन, हाउसिंग, कंज्यूमर ड्यूरेबल, क्रेडिट कार्ड, ऑटोमोबाइल, पर्सनल और खपत को शामिल किया गया था. पिछले lसाल 27 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि वो इस फैसले को लागू करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए.

लोन रिस्ट्रक्चरिंग की सुविधा का ऐलान

केंद्रीय बैंक ने एक बार लोन रिस्ट्रक्चरिंग की सुविधा देने का भी ऐलान किया है. इसमें यह भी कहा गया कि कंपनियों द्वारा और व्यक्तिगत स्तर पर लिए गए लोन अगर इस अवधि डिफॉल्ट करते हैं तो उन्हें नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) नहीं घोषित किया जाएगा. केवल उन्हीं लोन अकाउंट को रिस्ट्रक्चरिंग का मौका मिलेगा, जिन कंपनियां या व्यक्तियों का लोन 1 मार्च 2020 तक कम से कम 30​ दिनों के लिए डिफॉल्ट हुआ है. कंपनियों द्वारा लिए गए लोन पर बैंकों के पास रिजॉलुशन के लिए 31 दिसंबर 2020 की डेडलाइन तय की गई ​थी. बैंकों को इसे 30 जून 2021 तक लागू करना है.

व्यक्तिगत लोन के लिए क्या थी रिस्ट्रक्चरिंग की शर्त

व्यक्तिगत लोन के लिए बैंकों के पास 31 दिसंबर 2020 तक रिजॉलुशन शुरू करने का मौका था. रिजॉलुशन करने के 30 दिनों के अंदर इसे लागू भी करने की समयसीमा तय की गई थी. जो लोन अकाउंट स्टैंडर्ड हैं और 1 मार्च 2020 तक 30 दिनों से ज्यादा के लिए डिफॉल्ट नहीं किया है, वो भी रिस्ट्रक्चरिंग के ​लिए योग्य होंगे.

अब नीतियों में ढील देने के मूड में नहीं है आरबीआई

मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, माना जा रहा है कि रिज़र्व बैंक वर्किंग कैपिटल वाले उधारकर्ताओं को ब्याज से राहत देने के लिए बैंकों के अनुरोध को खारिज कर सकता है. आरबीआई अब महामारी के दौरान नीतियों को लेकर लिए गए फैसले को कम करने की दिशा में बढ़ रहा है. इस मामले की जानकारी रखने के तीन लोगों के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति और आगे का रास्ता देखते हुए आरबीआई ऐसे कदम उठा रहा है.

डिविडेंड न देने के फैसले से मजबूत हुई NBFC की स्थिति

आरबीआई ने हाल ही में अपने एक बैंकिंग रिपोर्ट में कहा है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी (NBFC) पर लोन हानि और कम क्रेडिट डिमांड की वजह से बुरा असर पड़ सकता है. चूंकि, अब लोन मोरेटोरियम और एसेट क्लासिफिकेशन में कोई बदलाव नहीं हुआ है, इन एनबीएफसी के एसेट क्वॉलिटी में सुधार हुआ है. हालांकि, कई एनबीएफसी ने क्रेडिट नुकसान के अनुमान के तहत अतिरिक्त व्यवस्था की हैं. आरबीआई ने 2019-20 के लिए बैंकिंग सेक्टर को लेकर एक रिपोर्ट में कहा है कि डिविडेंड ने देने के फैसले से इनका पूंजीगत स्थिति भी बेहतर हुई है.

कम NBFC ग्राहकों ने लिया मोरेटोरियम का लाभ

कुल मिलाकर इस रिपोर्ट में कहा गया है कि NBFC में लोन मोरेटोरियम की सुविधा लेने वाले ग्राहकों की संख्या कम है. दूसरी ओर कॉमर्शियल बैंकों में मोरेटोरियम के तहत कुल बकाया लोन की रकम बहुत ज्यादा है. इससे साफ पता चला है कि इन बैंकों पर एसेट को लेकर कितना दबाव है. इसमें कहा गया कि 31 अगस्त 2020 तक एनबीएफसी में कुल ग्राहकों में से केवल 26.6 फीसदी ने लोन मोरेटोरियम का लाभ लिया. इनके द्वारा दिए गए कुल लोन का करीब 44.9 फीसदी लोन की रकम ही मोरेटोरियम के दायरे में रही.

आरबीआई की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया, ‘एनबीएफसी के लिए लोन में स्थि​रता की वजह से उनके कुल समेकित बैलेंस शीट में गिरावट देखने को मिली है. हालांकि, मैक्रोइकोनॉमिक स्थिति खराब होने और कमजोर मांग ने इनका जोखिम भी बढ़ाया है.’

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