जिस सचिन वझे के सहारे अर्नब-कंगना को तंग किया गया, क्या उसी के जरिये मुकेश अंबानी को भी निशाने पर लिया गया?

उद्योगपति मुकेश अंबानी के मुंबई स्थित घर-एंटीलिया के बाहर विस्फोटक लदी गाड़ी किसने खड़ी की और उसका मकसद क्या था, ऐसे सवालों के जवाब राष्ट्रीय जांच एजेंसी ही दे सकती है, लेकिन कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिनके जवाब मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार को देने हैं, जैसे हिरासत में मौत के मामले में निलंबन के बाद नौकरी छोड़ चुके सहायक पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वझे पर इतनी मेहरबानी दिखाने की जरूरत क्यों थी और राज्य के सारे महत्वपूर्ण और खासकर विरोधियों को सबक सिखाने वाले मामले उसे ही क्यों सौंपे जा रहे थे? सचिन वझे को हिरासत में मौत के एक मामले में 2004 में निलंबित किया गया। जब उसे तीन साल तक अपनी बहाली होती नहीं दिखी तो उसने पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और फिर शिवसेना में शामिल हो गया। कोरोना महामारी और महाविकास अघाड़ी सरकार उसके लिए काम की साबित हुई।

नौकरी छोड़ चुके सहायक पुलिस इंस्पेक्टर सचिन वझे पर ठाकरे सरकार मेहरबान

महामारी में पुलिस कर्मियों की कमी का हवाला देकर उसे फिर से नौकरी पर ले लिया गया। यह काम इसके बावजूद किया गया कि वह हिरासत में मौत के मामले से बरी नहीं हुआ था। कायदे से बहाली के बाद भी उसे महत्वपूर्ण काम नहीं सौंपा जाना चाहिए था, लेकिन उद्धव ठाकरे की सरकार ने मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच में उसकी तैनाती का रास्ता साफ किया। इसके बाद उसे सारे बड़े मामले सौंपे जाने लगे। रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार करने के लिए उसकी सेवाएं ली गईं। टीआरपी घोटाले की जांच भी उसे सौंपी गई। कंगना रनोट-रितिक रोशन का मामला भी उसके हवाले किया गया। अन्य हाई-प्रोफाइल मामले भी उसके पास पहुंचते रहे। अनुमान लगाइए कि ऐसा किसके इशारे पर हुआ होगा?

अंबानी के घर के बाहर कार में जिलेटिन की छड़ें रखने का काम या तो वझे ने किया या उसके गुर्गों ने

एंटीलिया के बाहर विस्फोटक पाए जाने के मामले में भी सचिन वझे की एंट्री पाई गई। वह विस्फोटक लदी गाड़ी के मालिक मनसुख हीरेन को जानता था। मनसुख की मानें तो उनकी गाड़ी चोरी हो गई थी। कुछ दिनों बाद उनका शव पानी में मिला। कहा गया कि उन्होंने आत्महत्या की है। फिर पता चला कि वह तो अच्छे तैराक थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने बताया कि उनके मुंह में कपड़े ठूंसे गए थे और शरीर पर चोट के निशान भी थे। मतलब उनकी हत्या की गई। किसने की? संदेह है कि सचिन वझे या फिर उसके इशारे पर उसके लोगों ने। अब तो यह संदेह भी उभर आया है कि मुकेश अंबानी के घर के बाहर कार में जिलेटिन की छड़ें रखने का काम भी या तो खुद सचिन वझे ने किया या फिर उसके इशारे पर उसके गुर्गों ने। अभी किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता, क्योंकि इस कांड के तार तिहाड़ जेल से बरामद एक मोबाइल फोन से भी जुड़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि इस मोबाइल का इस्तेमाल आतंकी तहसीन अख्तर कर रहा था और उसी ने गुमनाम से आतंकी संगठन जैश उल हिंद की ओर से अंबानी को वह धमकी भरा पत्र लिखा, जो जिलेटिन लदी गाड़ी में पाया गया। यह भी पता चल रहा कि जिलेटिन भरी गाड़ी चोरी ही नहीं हुई थी और उसका उपयोग सचिन वझे पहले से ही कर रहा था। कहानी बड़ी रहस्यमय है। पता नहीं रहस्य की परतें कब खुलेंगी, लेकिन शिवसेना की ओर से सचिन वझे की तरफदारी हैरान करती है।

सचिन वझे के सहारे मुकेश अंबानी को परेशान करने की कोशिश हो रही थी?

महाराष्ट्र सरकार ने शर्मिंदगी से बचने के लिए सचिन वझे को निलंबित भले कर दिया हो, लेकिन शिवसेना के नेता उसकी तारीफ के पुल बांधने में लगे हुए हैं। शिवसेना सांसद संजय राउत को यह रास नहीं आया कि जिलेटिन कांड की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआइए करने लगी, लेकिन उनकी आपत्ति के बावजूद जरूरी यही है कि मनसुख की हत्या की भी जांच यही एजेंसी करे। सचिन वझे की तरफदारी संजय राउत के साथ खुद उद्धव ठाकरे भी कर रहे हैं। उनकी शिकायत है कि विपक्ष सचिन को ओसामा बिन लादेन की तरह पेश कर रहा है। जिसे खुद उनकी सरकार ने निलंबित किया हो, उसे किस रूप में पेश किया जाए? यह सवाल भी कई सवाल खड़े करता है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस सचिन वझे के सहारे अर्नब गोस्वामी और कंगना रनोट को तंग किया गया, क्या उसी के जरिये मुकेश अंबानी को भी परेशान करने की कोशिश हो रही थी? क्या यह संभव है कि यह काम सचिन वझे अपनी मर्जी से कर रहा हो? पता नहीं सच क्या है, लेकिन यह सबको पता है कि राहुल गांधी मुकेश अंबानी को लांछित करने में जुटे हुए हैं।

मुंबई पुलिस के साथ महाराष्ट्र सरकार की फजीहत

एक अर्से से राहुल गांधी किन्हीं अज्ञात कारणों से अंबानी-अदाणी को खलनायक साबित करना चाह रहे हैं। कहना कठिन है कि सचिन वझे की गिरफ्तारी से इन कारणों का निवारण हो सकेगा या नहीं, लेकिन यह कहने में कठिनाई नहीं कि मुंबई पुलिस के साथ महाराष्ट्र सरकार की जमकर फजीहत हो रही है। वैसे तो इसके लिए वही दोषी हैं, लेकिन यदि पुलिस सुधार लागू हो गए होते तो शायद ऐसी खतरनाक अंधेरगर्दी देखने को नहीं मिलती। जितना यह सही है कि राज्य सरकारें पुलिस सुधार लागू करने के लिए इच्छुक नहीं, उतना ही यह भी कि केंद्र सरकार भी इन सुधारों को अपनाने के लिए तैयार नहीं। नि:संदेह बीते छह सालों में मोदी सरकार ने कई उल्लेखनीय काम किए हैं, लेकिन पुलिस सुधार के मोर्चे पर कुछ नहीं किया गया। इसी का नतीजा है कि सचिन वझे जैसे लोग पुलिस की बदनामी का कारण बन रहे हैं। नौकरी छोड़ राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर चुके सचिन वझे की बहाली यह और अच्छे से बताती है कि राज्य सरकारें पुलिस सुधार क्यों नहीं करना चाहतीं? अच्छा हुआ कि वह गिरफ्तार हो गया, लेकिन कल्पना करें कि यदि वह एनआइए के हत्थे नहीं चढ़ता तो क्या होता?

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