मकर संक्रांति से शुरू होंगे शुभ कार्य, पढ़ें पौराणिक कथा 


Makar Sankranti Katha: मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का वध कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था. तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा…


मकर संक्रांति आज 14 जनवरी को मनाई जाएगी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन को नए फल और नए ऋतु के आगमन के लिए मनाया जाता है. जब सूर्य देव मकर राशि पर प्रवेश करते हैं तब मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है. इस दिन लाखों श्रद्धालु गंगा और अन्य पावन नदियों के तट पर स्नान और दान, धर्म करते हैं.

हिंदू धार्मिक मान्यतों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन भगवान विष्णु ने पृथ्वी लोक पर असुरों का वध कर उनके सिरों को काटकर मंदरा पर्वत पर गाड़ दिया था. तभी से भगवान विष्णु की इस जीत को मकर संक्रांति पर्व के तौर पर मनाया जाने लगा. आइए जानते हैं मकर संक्रांति की कथा…

मकर संक्रांति की पौराणिक कथा:

मकर संक्रांति की पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान सूर्यदेव धनु राशि से निकल कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं. मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं. इसलिये यह कहा जाता है कि मकर में प्रवेश कर सुर्य देव अपने पुत्र से मिलने जाती हैं.

राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान किया और अपने अश्व को विश्व –विजय के लिये छोड़ दिया. इंद्र देव ने उस अश्व को छल से कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया . जब कपिल मुनि के आश्रम में राजासगर के साठ हजार पुत्र युद्ध के लिये पहुंचे और उनको अपशब्द कहा ,तब कपिल मुनि ने श्राप देकर उन सबको भस्म कर दिया. राजकुमार अंशुमान, राजा सगर के पोते, ने कपिल मुनि के आश्रम में जाकर उनकी विनती की और अपने बंधुओं के उद्धार का मार्ग पूछा. तब कपिल मुनि ने बाताया कि इनके उद्धार के लिये गंगा जी को धरती पर लाना होगा.

राजकुमार अंशुमान ने प्रतिज्ञा की कि उनके वंश का कोई भी राजा चैन से नहीं रहेगा जब तक गंगा जी को धरती पर ना ले आये. उनकी प्रतिज्ञा सुनकर कपिल मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया. राजकुमार अंशुमान ने कठिन तप किया और उसी में अपनी जान दे दी. भागीरथ राजा दिलीप के पुत्र और अंशुमान के पौत्र थे.
राजा भागीरथ ने कठिन तप करके गंगा जी को प्रसन्न किया और उन्हें धरती पर लाने के लिये मना लिया. उसके पश्चात, भागीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की जिससे कि महादेव गंगा जी को अपने जटा में रख कर, वहां से धीरे-धीरे गंगा के जल को धरती पर प्रवाहित करें. भागीरथ के कठिन तपस्या से महादेव प्रसन्न हुए और उन्हें इच्छित वर दिया. इसके बाद गंगा जी महादेव के जटा में समाहित होकर धरती के लिये प्रवाहित हुई. भागीरथ ने गंगा जी को रास्ता दिखाते हुए कपिल मुनि के आश्रम गये, जहां पर उनके पूर्वजों की राख उद्धार के लिये प्रतीक्षारत थी.


गंगा जी के पावन जल से भागीरथ के पूर्वजों का उद्धार हुआ. उसके बाद गंगा जी सागर में मिल गयी. जिस दिन गंगा जी कपिल मुनि के आश्रम पहुंची उस दिन मकर संक्रांति का दिन था. इस कारण से मकर संक्रांति के दिन श्रद्धालु गंगासागर में स्नान और कपिल मुनि की आश्रम के दर्शन के लिये एकत्रित होते हैं.
मकर संक्रांति के दिन हीं भगवान विष्णु ने असुरों का अंत किया था एवं उन असुरों के सिरों को मंदार पर्वत में दबा दिया था. इस तरह से यह मकर संक्रांति का दिन बुराइयों और नकारात्मकता को खत्म करने का दिन कहा गया है.

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