सोनिया, राहुल छोड़िए बस इन चीजों से हो सकता है कांग्रेस का कायापलट

कांग्रेस पार्टी में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। बिहार चुनाव के बाद कांग्रेस में आपसी खींचतान और बढ़ गई है। ऐसे में पार्टी की फजीहत तब और होती है जब कोई नेता कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल खड़े करता है। सोनिया गांधी को कांग्रेस का अंतरिम अध्यक्ष बने हुए एक वर्ष हो गए,लेकिन इस बारे में कुछ पता नहीं कि पार्टी पूर्णकालिक अध्यक्ष चुनने के लिए तैयार है या नहीं ? कुछ कांग्रेसी नेता राहुल गांधी को फिर से अध्यक्ष बनाने की मांग कर रहे हैं। लेकिन इस विचार को पूरजोर समर्थन मिलता नहीं दिख रहा है।कांग्रेस भले ही यह तय न कर पा रही हो कि उसका अगला अध्यक्ष कौन बने,लेकिन उसके तमाम नेता यह उम्मीद पाले हुए हैं कि 2014 और 2019 की लगातार दो पराजयों के बाद भी हम 2024 में सत्ता में आ जाएंगे-ठीक वैसे ही जैसे 2004 में आ गए थे। सवाल है कि क्या यह संभव है ?

पार्टी में के बड़े नेताओं खुले तौर पर खींचतान

कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी स्थिति से बेचैन हैं। 23 वरिष्ठ नेताओं के एक समूह की ओर से पिछले दिनों कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी गई थी। बिहार में सरकार बनाने से विपक्षी महागठबंधन के चूक जाने के बाद इस समूह की ओर से फिर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। कपिल सिब्बल जैसे नेता खुलकर नेतृत्व की कमजोरी पर सवाल उठा रहे हैं। दिक्कत यह है कि जिस लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत हर स्तर पर नेतृत्व चुनने को रामबाण इलाज बताया जा रहा है, उस पर इस समूह के लोग भी पूरी तरह खरे नहीं उतरते। सिब्बल जैसे नेता सरकार रहने पर केंद्रीय मंत्री और न रहने पर सुप्रीम कोर्ट की वकालत के तय ढर्रे पर जिंदगी जीते हैं। संगठन खड़ा करने या उसमें योगदान देने की उनकी कोई भूमिका नजर नहीं आती। लेकिन क्या ऐसी कोई योजना है भी जिसके तहत ऐसे नेताओं के सामने स्पष्ट कार्यभार पेश किया जाए?

युवाओं को मिले ज्यादा तरजीह

कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अब युवाओं पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। कांग्रेस में अकेला गांधी परिवार है जिस पर कार्यकर्ता शर्त लगा सकते हैं कि वह महात्मा गांधी की हत्या करने वाली विचारधारा के सामने समर्पण नहीं करेगा। तमाम कमजोरियों के बावजूद कांग्रेस अब भी देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और ऐसे कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है जो मानते हैं कि राहुल गांधी इतिहास की पुकार हैं। लेकिन क्या किसी नए आर्थिक-सामाजिक कार्यक्रम और जमीनी गतिशीलता के बगैर इस पुकार को एक ठोस जनाधार में बदला जा सकता है? बिल्कुल उसे जनाधार में बदला जा सकता है मगर केवल युवा नेताओं को तरजीह देकर ही कांग्रेस अपनी गाड़ी को रफ्तार दे सकती है।

संगठन में फेरबदल का दिख सकता है बड़ा असर

किसी भी संगठन में कार्यकर्ताओं के जूझने की दो वजहें होती हैं। एक तो विचारधारा, दूसरी स्वार्थ। केंद्र और ज्यादातर राज्यों में सत्ता से बाहर हो चुकी कांग्रेस में कार्यकर्ताओं का निजी स्वार्थ पूरा करने का ज्यादा सामर्थ्य नहीं बचा है और जो कार्यकर्ता विचारधारा की वजह से हैं, उनके सामने भी स्थिति अमूर्त है। जिस नई आर्थिक नीति और उदारीकरण की नीति को कभी कांग्रेस ने शुरू किया था, मौजूदा सरकार उसे ही बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ा रही है। कांग्रेस की ओर से ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ को बढ़ावा देने की चाहे जितनी आलोचना की जाए, मूल नीतियों की न तो कोई समीक्षा की गई है और न उन्हें उलटने का कोई प्रस्ताव ही है। यह सच है कि उसने संगठन में दलित और पिछड़ी जातियों को हाल के दिनों में ज्यादा महत्व दिया है, लेकिन डॉ. आंबेडकर के ‘जाति उच्छेद’ के कार्यक्रम को अपनाने या निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसी मांग करने का साहस उसके पास नहीं है।

गांधी परिवार की निर्भरता

कांग्रेस का गांधी परिवार के बगैर गुजारा नहीं हो सकता, लेकिन आखिर इसका क्या मतलब कि परिवार ही यह तय न कर पाए कि पार्टी की कमान किस सदस्य को सौंपी जाए? क्या इस असमंजस का कारण यह है कि पार्टी नेताओं का एक गुट राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं? जो भी हो, यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि सोनिया गांधी उस वक्त का इंतजार कर रही हैं जब पार्टी के सभी प्रमुख नेता एक स्वर से यह मांग करने लगें कि राहुल गांधी के फिर पार्टी अध्यक्ष बने बगैर कांग्रेस का कोई भविष्य नहीं। इसीलिये लम्बे समय से ये अनिर्णय की स्थितियां बनी हुई रखी जा रही हैं, लेकिन कब तक? मुश्किल यह भी है कि ऐसा होना आसान नहीं, क्योंकि पार्टी की गुटबाजी सबके सामने आ गई है।

हिंदुओं से अलग होती पार्टी

कांग्रेस में एक धड़ा यह भी मानता है कि कांग्रेस अपने मुस्लिम अति तुष्टीकरण के चलते हिंदुओं से अलग हो गई है अतः हिंदुओं का विश्वास जीतना बहुत जरूरी है

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